नवीन पटनायक से खुल कर दो-दो हाथ क्यों नहीं करते मोदी

  • 23 फरवरी 2019
नरेंद्र मोदी, नवीन पटनायक, ओडिशा, लोकसभा चुनाव 2019 इमेज कॉपीरइट PTI

लोकसभा चुनावों की तारीख़ जैसे-जैसे नज़दीक आ रही है शिलान्यास करने और लोकलुभावन वायदों की घोषणा से जुड़े प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे भी बढ़ रहे हैं. इस साल अब तक मोदी दो बार ओडिशा का दौरा कर चुके हैं.

ख़ुद पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने इसी महीने गोवा में कार्यकर्ताओं से हुई मुलाक़ात में कहा था, "चुनावों में बाद हम बंगाल और ओडिशा में सरकार बनाएंगे."

15 जनवरी को मोदी बलांगीर में थे, जो पश्चिम ओडिशा का केंद्र माना जाता है. पांच जनवरी को वो बारीपदा में थे जो एक तरह से पूर्वी ओडिशा का केंद्र है.

सिर्फ़ मोदी ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता योगी आदित्यनाथ ने भी कालाहांडी के भवानीपटना और खोर्दा के नाइचुनी में रैलियां की.

अमित शाह भी इस साल चार बार ओडिशा दौरे की योजना बना चुके हैं, हालांकि अब तक वो सिर्फ़ दो बार वहां जा सके हैं.

तीन फ़रवरी को वो पुरी पहुंचे थे. 29 जनवरी को वो कटक के कुलिया गए थे. जनवरी 18 को सालेपुर में उनका कार्यक्रम था लेकिन स्वाइन फ्लू होने के कारण उनका ये दौरा रद्द हो गया.

15 फ़रवरी को अमित शाह संबलपुर में चार लोकसभा सीटों- संबलपुर, बरगढ़, सुंदरगढ़ और ढेंकानाल के लिए बीजेपी कार्यकर्ताओं से बात करने वाले थे. लेकिन पुलवामा हमले के बाद उनकी ये बैठक कैंसल हुई.

अब सवाल ये उठ रहा है कि बीजेपी नेताओं के बार-बार ओडिशा दौरे, आख़िर किस बात की ओर इशारा करते हैं? क्या बीजेपी के लिए ओडिशा की 21 लोकसभा सीटें बेहद अहम हो गई हैं?

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Image caption मोदी बलांगीर में

बीजेपी को ओडिशा से काफ़ी उम्मीदें

वरिष्ठ पत्रकार संदीप साहू बताते हैं कि ओडिशा बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि, "कुछ ही राज्य हैं जहां इसी साल लोकसभा चुनावों के साथ विधानसभा चुनाव भी होने वाले हैं, ओडिशा उनमें से एक है और इस कारण ये महत्वपूर्ण है. यहां कुल 21 लोकसभा सीटें हैं."

वो कहते हैं, "बीजेपी पहले यहां सत्ता में रह चुकी है और इसको मिलने वाले वोटों की तादाद लगातार बढ़ती रही है."

2014 के आम चुनावों में बीजेपी को यहां एक ही सीट मिली थी लेकिन उसका वोट शेयर करीब 20 फ़ीसदी था, वहीं विधानसभा चुनावों में उसके करीब 18 फ़ीसदी वोट मिले थे. 2009 के आम चुनावों में बीजेपी का वोट प्रतिशत 16-17 फ़ीसदी तक था.

इसके मुक़ाबले 2014 आम चुनावों में राज्य की 20 सीटों पर जीत दर्ज़ करने वाली बीजेडी का वोट शेयर 44 फ़ीसदी था. वहीं 2009 में बीजेडी का वोट शेयर 43 फ़ीसदी था.

संदीप साहू कहते हैं, "ऐसे में ज़ाहिर है कि बीजेपी को लगता है कि उनका वोट शेयर और बढ़ेगा."

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वरिष्ठ पत्रकार बीरेंद्र प्रधान कहते हैं कि हाल में विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद बीजपी कई प्रदेशों में मुश्किल हो सकती है और ऐसे में ओडिशा उनके लिए अहम है.

"ये तो स्पष्ट है कि लोकसभा चुनावों में वो दूसरे राज्यों से भरपाई करना चाहते हैं. वो ख़ास कर पश्चिम बंगाल और ओडिशा को अपने अभियान में निशाने पर रख रहे हैं.

वो कहते हैं कि बीजपी को लग रहा है कि बीजेडी के ख़िलाफ़ इस बार हवा बन सकती है और वो इसी का फ़ायदा उठाना चाहती है.

"बीजेपी चाहती है कि यहां जो एंटी इन्कम्बेन्सी होगी उसका फ़ायदा कांग्रेस को ना मिल कर उन्हें मिले."

बीजेडी बीते 19 सालों से ओडिशा की सत्ता पर काबिज़ है. पहले बीजेडी और बीजेपी का गठबंधन भी रहा, लेकिन 2009 लोकसभा चुनावों से पहले ये गठबंधन टूट गया. बीजेडी अकेले दम पर चुनावों में उतरी और 2009 में 14 सीटों पर और फिर 2014 में 20 सीटों पर जीती.

हाल में पार्टी प्रमुख नवीन पटनायक ने साफ़ कर दिया कि वो किसी भी पार्टी के साथ (बीजेपी या कांग्रेस) के साथ गठबंधन नहीं करेंगे.

संदीप साहू कहते हैं, "नवीन पटनायक की लोकप्रियता में कमी नहीं आई है लेकिन थोड़ी-बहुत सत्ता विरोधी लहर ज़रूर है. कई जगहें ऐसी भी हैं जहां स्थानीय विधायकों से लोग नाराज़ हैं. इन सीटों से भी बीजेपी को उम्मीदें हैं."

नज़र पश्चिम ओडिशा पर क्यों?

हाल में बीजेपी की जो रैलियां हुई हैं उनमें से कई पश्चिम ओडिशा में हैं. मोदी बलांगीर में थे, योगी पहले भवानीपटना जाने वाले हैं. अमित शाह संबलपुर जाने वाले थे. इससे पहले बीते साल मोदी हवाई अड्डे का उद्घाटन करने झारसुगुड़ा गए थे.

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बीरेंद्र प्रधान कहते हैं, "पश्चिम ओडिशा में बीजेपी का प्रदर्शन अच्छा है. यहां बीते वक्त में जो पंचायत चुनाव हुए थे उनमें बीजेपी आगे रही थी. पार्टी को अधिकतर सीटें जिन ज़िलों में मिली वो पश्चिम ओडिशा के थे."

वो कहते हैं, "पंचायत चुनावों में कांग्रेस को पीछे छोड़ कर बीजेपी आगे बढ़ने में कामयाब हुई है और अब लोकसभा चुनाव में पहले स्थान की उम्मीद कर रही है."

संदीप साहू कहते हैं कि ओडिशा में पश्चिम ओडिशा बीजेपी का गढ़ तो पूर्वी ओडिशा बीजेडी का गढ़ रहा है.

वो कहते हैं, "जब 11 साल तक बीजेपी-बीजेडी का गठबंधन चल रहा था उस वक्त सीटों के बंटवारे में बीजेपी को जो सीटें मिली थीं वो पश्चिम ओडिशा की थीं. आज भी यहां उन्हें अच्छा रिस्पॉन्स मिलता है. इस कारण यहां उनका अधिक फोकस है."

वो कहते हैं कि इन इलाकों से बीजेपी को काफ़ी उम्मीदें हैं और बीजेपी को पता है कि पूर्वी ओडिशा में बीजेडी की जीतने की गुंजाइशें अधिक हैं.

बीरेंद्र प्रधान कहते हैं, "लंबे वक्त से पश्चिम ओडिशा में सरकार से इस बात की नाराज़गी रही है कि विकास कार्यों में इस इलाके की अनदेखी होती रही है. ऐसे में मोदी अपने प्रचार में विकास के मुद्दों को केंद्र में रख रहे हैं."

"इन्ही मुद्दों को लेकर बीजेपी आगे बढ़ने की कोशिश कर रही है. इसी रणनीति के तहत बीजेपी विकास और किसानों का मुद्दा भी उठा रही है."

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बीजेपी की टू ट्रैक पॉलिसी

संदीप साहू कहते हैं कि मोदी बीते तीन बार जब ओडिशा आए थे उन्होंने विकास के मुद्दे पर खुल कर आलोचना की लेकिन नवीन पटनायक का नाम नहीं लिया.

वो कहते हैं "लेकिन यहां के स्थानीय बीजेपी नेता बीजेडी और नवीन पटनायक की खुल कर आलोचना कर रहे हैं."

"बीजेपी जीतना ज़रूर चाहती है लेकिन वो इस बात के लिए तैयार हैं कि अगर बीजेडी जीत गई तो वो औपचारिक या अनौपचारिक तौर पर बीजेडी से हाथ मिलाएं."

"बीजेडी ने जीएसटी, अविश्वास प्रस्ताव, एनआरसी जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर शांत रह तक बीजेपी का समर्थन किया है और बीजेपी नहीं चाहेगी कि संसदीय बहुमत में बीजेडी उनके साथ न रहे."

बीजेपी चाहेगी कि बीजेडी के साथ उनका गठबंधन हो और ऐसा न भी हुआ तो बीजेपी की पूरी कोशिश रहेगी कि वो बीजेडी को कम-से-कम महागठबंधन के साथ तो न ही जाने दें.

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