जयललिता और करुणानिधि के बिना कैसे होगा तमिलनाडु का चुनाव?

  • 22 फरवरी 2019
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भारत में लोकसभा चुनाव की तैयारियां ज़ोरों पर हैं और ऐसे में किसी राज्य की स्थिति उतनी अजीबोग़रीब नहीं है जितनी दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु की.

52 सालों में ये पहली बार है जब तमिलनाडु अपने राजनीतिक सितारों के बिना कोई बड़ा चुनाव लड़ने जा रहा है. इस लोकसभा चुनाव में न तो सीएन अन्नादुरई होंगे, न ही एम जी रामचंद्रचन, न जयललिता और न करुणानिधि.

ये एक बड़ी वजह है कि चुनाव से पहले एआईएडीएमके और डीएमके दोनों पार्टियों के गठबंधन के फ़ैसलों को एक तरह के शक और डर के भाव से देखा जा रहा है.

राजनीति के जानकार आझी सेंतिलनाथन ने बीबीसी से कहा, "हां, ये चुनाव तमिलनाडु के लिए नए तरह का है. इसमें करुणानिधि या जयललिता जैसे राजनीतिक नायक नहीं हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव बिल्कुल नए तरह का दांव होगा."

इससे ठीक एक दिन पहले एआईएडीएमके ने बीजेपी और पीएमके के साथ गठबंधन का ऐलान किया था.

वहीं, दूसरी तरफ़ डीएमके ने कांग्रेस के साथ गठबंधन की घोषणा की है. दोनों ही दलों के नेताओं ने सभी 40 सीटें जीतने का दावा किया है जिसमें तमिलनाडु की 39 और केंद्र शासित प्रदेश पुदुचेरी की एक सीट शामिल है.

दोनों पार्टियां ख़ुद के लिए तक़रीबन 20-25 सीटें रखेंगी और बाक़ी अपने सहयोगी दलों से साझा करेंगी. पीएमके को सात सीटें मिली हैं और बीजेपी पांच सीटों पर चुनाव लड़ेगी. वहीं दूसरी ओर कांग्रेस को तमिलनाडु की नौ और पुदुचेरी की एक यानी कुल 10 सीटें मिली हैं.

हालांकि ये साफ़ है कि ये चुनाव पिछले सभी चुनावों से अलग होगा. साल 2014 में जयललिता ने एनडीएन का नेतृत्व किया था और एआईएडीएमके को तमिलनाडु की कुल 39 सीटों मे से 37 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. इससे एक दशक पहले, करुणानिधि ने यूपीए की अगुवाई की और पीएमके ने क्लीन स्वीप किया था.

हालांकि हाल के वर्षों में, 18 महीने के भीतर (दिसंबर 2016-अगस्त 2018) जयललिता और करुणानिधि दोनों का निधन हो गया. इसके बाद एआईएडीएमकी की हालत राज्य में डीएमके से भी ज़्यादा बुरी हो गई.

करुणानिधि ने तो ये सुनिश्चित किया था कि उनके बाद एक तय वक़्त में सत्ता उनके उत्तराधिकारी एमके स्टालिन को सौंप दी जाए लेकिन जयललिता का कोई उत्तराधिकारी नहीं था.

सेंतिलनाथन कहते हैं, "आज एआईडीएमके दो धड़ों में बंटी हुई पार्टी है. किसी लोकप्रिय नेता के अभाव में और बढ़ती सत्ता विरोधी लहर की वजह से ये बुरी तरह कमज़ोर हुई है."

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चेन्नई के दूसरे राजनीतिक विश्लेषक सुरेश कुमार ने कहा, "अगर भारत में कोई ऐसी जगह है जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वापस जाने को कहा गया वो तमिलनाडु का चेन्नई है. ये लोगों की बीजेपी विरोधी राय दिखाता है."

सुरेश कुमार और सेंतिलनाथन दोनों ही इससे सहमति जताते हैं कि तमिलनाडु में केंद्र और राज्य दोनों की सत्ता विरोधी लहर व्याप्त है. सुरेश कुमार तो ये मानते हैं कि एआईएडीएमके बीजेपी को अपने कंधों पर ढो रही है.

सेंतिलनाथन इससे एक क़दम आगे बढ़ते हैं. उन्होंने कहा, "एआईएडीएमके ने बीजेपी से हाथ मिलाकर अपनी ही ताक़त कमज़ोर कर ली है. वही बीजेपी जिसे पिछले चुनावों में पूरे तमिलनाडु में सिर्फ़ दो फ़ीसदी वोट मिले थे. हालांकि सत्ता विरोधी लहर के बावजूद आईएडीएमके पश्चिमी तमिलनाडु के निचले तबक़ों में अपनी पकड़ बनाए हुए है. बीजेपी को कोयंबटूर और तिरुपुर में काफ़ी समर्थन हासिल है लेकिन बाक़ी सीटों पर ऐसी स्थिति नहीं है."

वहीं, पीएमके को उत्तरी तमिलनाडु में अच्छा समर्थन हासिल है. इसकी वन्नियार समुदाय में अच्छी पकड़ है और इसका फ़ायदा एआईएडीएमके को ज़रूर मिलेगा. पीएमके को उसके संस्थापक एस. रामदास के बेटे अंबुमणि रामदास के नाम से ज़्यादा जाना जाता है. अंबुमणि रामदास वही नेता हैं जिन्होंने सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर रोक लगवाई थी.

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सुरेश कुमार कहते हैं, "पीएमके के पास पांच फ़ीसदी वोट शेयर है और ये डीएमके-कांग्रेस गठबंधन के लिए सबसे बड़ी चुनौती है."

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि एआईडीएम और पीएम के गठबंधन से पहले डीएमके बहुत अच्छी स्थिति में थी और उम्मीद थी कि वो लोकसभा चुनावों में बहुमत वाली सीटें जीत लेगी. लेकिन सेंतिलनाथन का मानना है कि अब डीएमके इसे हल्के में नहीं ले सकती.

गठबंधन की इन ताज़ी घोषणाओं में दो ऐसे दिलचस्प पहलू हैं जिन्होंने राजनीति के बड़े जानकारों से लेकर पार्टी सदस्यों तक को चौंका दिया है. जिस पीएमके ने आईएडीएमके के ख़िलाफ़ 24 बिंदुओं वाली चार्जशीट जारी की थी आज उसने उसी पार्टी से हाथ मिला लिया है.

इतना ही नहीं, एआईएडीएमके के नेताओं और उनके क़रीबियों पर आयकर विभाग जैसी केंद्रीय एजेंसियों के छापे पड़े थे और ज़ाहिर है कि ये केंद्र सरकार के इशारे पर हुआ था. वही एआईएडीएमके बीजेपी के साथ गठबंधन में है.

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इन सबका मतदाताओं पर क्या असर पड़ेगा, ये देखना दिलचस्प होगा. वहीं, इन सबमें टीटीवी दिनाकरण की भूमिका तीसरे पहलू के तौर पर उभरी है. दिनाकरण की बुआ और जयललिता की क़रीबी सहयोगी रही वीके शशिकला की एआईएडीएमके को थेवर समुदाय का वोट दिलाने में बड़ी भूमिका थी. थेवर समुदाय के वोटों का असर राज्य के दक्षिणी हिस्से में साफ़ महसूस किया जाएगा.

दोनों पार्टियों के नेता कहीं न कहीं ये स्वीकार करते हैं कि जातीय समीकरण को पूरी गंभीरता से ध्यान में रखकर गठबंधन करने के बावजूद कुछ भी निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता.

सेंतिलनाथन कहते हैं, "ये सबके लिए इम्तिहान का वक़्त है. हालांकि इस बार मुख्यमंत्री पलानीस्वामी या उप मुख्यमंत्री पन्नीरसेल्वम से कहीं बड़ा इम्तिहान एमके स्टालिन के लिए होगा क्योंकि उन्हें ख़ुद को एक नेता के तौर पर स्थापित करना है."

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