कश्मीर में सेना की तैनाती, बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारी से फैली अफ़वाहें

  • 24 फरवरी 2019
कश्मीर, 35-ए, अनुच्छेद 35-ए, सेना की तैनाती, अलगाववादी नेता इमेज कॉपीरइट Getty Images

भारत प्रशासित कश्मीर में जमात-ए-इस्लामी प्रमुख हामिद फयाज़ और जेकेएलएफ के मुखिया यासीन मलिक समेत 200 से अधिक अलगाववादी नेताओं को पुलिसिया घेरे में लिए जाने के बाद से शनिवार को वहां दहशत का माहौल है.

ये गिरफ़्तारियां 20 हज़ार से अधिक अर्धसैनिक बलों के आपात लैंडिग की ख़बरों के बीच की गईं.

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14 फ़रवरी को पुलवामा में सीआरपीएफ़ के दस्ते पर हुए चरमपंथी हमले के बाद की जा रही जांच और भारतीय संविधान के तहत जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 35-ए पर सोमवार को होने वाली सुनवाई के मद्देनज़र उठाया गया क़दम माना जा रहा है.

सोशल मीडिया संविधान के इस अनुच्छेद को ख़त्म किये जाने को लेकर अफ़वाहों से पट गया है, जो हिमालय की वादियों में बसे इस इलाक़े में बेचैनी का कारण बन रहा है.

हालांकि, पुलिस ने इन्हें ग़लत बताते हुए अफ़वाहों पर ध्यान नहीं देने को कहा है और कहा है कि ये गिरफ़्तारियां और फ़ौज की तैनाती चुनावी तैयारियों का हिस्सा हैं.

अफ़वाह फैलाने वालों पर होगी सख़्ती

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बीबीसी को बताया, "अलगाववादियों ने चुनाव-विरोधी अभियान का आह्वान किया है, इसकी हम अनुमति नहीं देंगे."

उन्होंने कहा, "अधिकतर मतदान केंद्र संवेदनशील हैं और बिना किसी गड़बड़ी के चुनाव संपन्न कराने के लिए हमें और अधिक सुरक्षाबलों की ज़रूरत होगी. जिस सेना को अमरनाथ यात्रा और पंचायत चुनाव के बाद वापस बुला लिया गया था उनकी दोबारा तैनाती की जा रही है. अफ़वाह फैलाने वालों से सख़्ती के साथ निपटा जाएगा."

राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती और बीजेपी के पूर्व सहयोगी सज्जाद लोन ने अलगाववादियों पर की गई कार्रवाई को 'जांचा-परखा और विफल मॉडल' बताते हुए इन गिरफ़्तारियों पर सवाल उठाए हैं.

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सुप्रीम कोर्ट में है अनुच्छेद 35-ए पर सुनवाई

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े कुछ सहयोगियों ने बीते वर्ष सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 35-ए और 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को दिये कुछ संवैधानिक प्रावधानों को चुनौती दी थी.

इस अनुच्छेद के तहत जम्मू-कश्मीर को भारत में विशेष राज्य का दर्जा हासिल है और इसके पास अपने क़ानून बनाने और केंद्र के क़ानून को मंज़ूर करना या जब राज्य के लिए कोई क़ानून बनाया जाए तो उसे अस्वीकार करने का अधिकार प्राप्त है.

यानी जम्मू-कश्मीर को लेकर क़ानून बनाने के भारतीय संसद के पास बहुत सीमित अधिकार हैं.

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अलगाववादियों की धमकी

अलगाववादी और भारत के साथ जुड़े रहने के हिमायती दोनों ने इस प्रावधान से किसी छेड़छाड़ की स्थिति में गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी है.

महबूबा मुफ़्ती पहले ही कह चुकी हैं कि अगर राज्य की संवैधानिक स्थिति में बदलाव किया गया तो वहां भारतीय तिरंगे को थामने वाला कोई नहीं रह जाएगा.

सत्ताधारी बीजेपी ने 2014 के चुनाव में यह वादा किया था कि अगर वह जीत जाती है तो वह न केवल अयोध्या के विवादित स्थाल पर राम मंदिर का निर्माण करेगी बल्कि संविधान के अनुच्छेद 35-ए और 370 का ख़ात्मा करके कश्मीर का पूरी तरह भारत में विलय करेगी.

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नई दिल्ली में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री का पद संभालने के तुरंत बाद ही सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका दाख़िल की गई थी.

सर्वोच्च अदालत में सोमवार को इस पर सुनवाई होनी है और अलगाववादियों ने इस क़दम का विरोध करने के लिए राज्य में हड़ताल और विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया है.

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