कश्मीर में युवा क्यों उठा रहे हैं बंदूक?

  • माजिद जहांगीर
  • बीबीसी हिंदी के लिए
कश्मीर में पत्थरबाजी

इमेज स्रोत, Getty Images

2018 की शुरुआत में, भारी हथियारों से लैस चरमपंथियों ने पुलवामा ज़िले के पंपोर इलाके में केंद्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स (सीआरपीएफ़) के कैंप पर हलमा किया, जिसमें पांच जवान मारे गये थे. उस हमले में दो चरमपंथी भी मारे गये थे.

हमले में मारे गये चरमपंथियों में से एक की पहचान दक्षिण त्राल के 15 वर्षीय फरदीन अहमद खांडे के नाम से की गई. इस कैंप पर हमले से पहले, खांडे ने हमले को अंजाम देने के पीछे उनके मकसद को बताता एक वीडियो शूट किया था.

हाल के दिनों में चरमपंथी संगठन में शामिल होने वाले खांडे दक्षिण कश्मीर के सबसे कम उम्र के चरमपंथी थे.

पुलवामा में हुए आत्मघाती हमले के पीछे जिस चरमपंथी 21 वर्षीय आदिल अहमद उर्फ वकास का नाम बताया गया है वो भी दक्षिण कश्मीर के पुलवामा ज़िले का ही रहने वाला था और जैसा कि उसकी पहचान हुई है, वो चरमपंथी संगठन जैश-ए-मोहम्मद में कुछ महीने पहले ही 2018 में शामिल हुआ था.

बीते वर्ष मनन वानी अपनी पढ़ाई छोड़ कर हिजबुल मुजाहिदीन में शामिल हो गये थे जो 10 महीने बाद हिंदवाड़ा में एक मुठभेड़ में मारे गये.

मनन वानी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर रहे थे और अकादमिक रिकॉर्ड को देखते हुए एक मेधावी छात्र थे.

एक और युवा जो प्रोफेसर से चरमपंथी बने थे, वो हैं रफीक़ अहमद डार. ये चरमपंथी संगठन में शामिल होने के कुछ ही देर बाद मारे गये थे. डार कश्मीर विश्वविद्याल के समाजशास्त्र विभाग में शिक्षक थे.

इमेज स्रोत, Getty Images

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
पॉडकास्ट
बात सरहद पार

दो देश,दो शख़्सियतें और ढेर सारी बातें. आज़ादी और बँटवारे के 75 साल. सीमा पार संवाद.

बात सरहद पार

समाप्त

चरमपंथ की तरफ़ बढ़ा रुझान

पिछले चार सालों के दौरान, दक्षिण कश्मीर में कई युवाओं ने बंदूक उठाई है और उनमें से अधिकतर विभिन्न मुठभेड़ों में मार गिराये गये हैं.

मीडिया में छपी रिपोर्ट्स के मुताबिक वर्ष 2018 में कश्मीर के 191 युवा चरमपंथी संगठनों में शामिल हुए, जो 2017 के मुक़ाबले 65 अधिक है.

2018 में, पुलिस ने बताया था कि कश्मीर में अलग-अलग मुठभेड़ों में 250 से अधिक चरमपंथी मारे गए हैं. हाल के वर्षों में यहां मारे गए चरमपंथियों की सबसे बड़ी तादाद थी.

जम्मू-कश्मीर सिविल सोसाइटी की 2018 की वार्षिक रिपोर्ट में बताया गया है, "2018, पिछले एक दशक का सबसे घातक साल था. इस साल चरमपंथियों, सुरक्षा बलों और आम लोगों समेत कुल 500 लोग मारे गए थे."

2016 में हिज्बुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद, दक्षिण कश्मीर के स्थानीय युवाओं में चरमपंथी संगठनों में शामिल होने की प्रवृत्ति में तेज़ी दिखाई दी है.

पिछले कुछ वर्षों में यह देखा गया है कि चरमपंथी संगठनों में शामिल होने वाले स्थानीय युवाओं ने सोशल मीडिया पर अपनी बंदूक वाली तस्वीरों को अपलोड किया और चरमपंथी संगठन से जुड़ने के साथ ही अपने रैंक की घोषणा की. यह प्रवृत्ति अब तक बदस्तूर जारी है.

इमेज स्रोत, Getty Images

युवा क्यों उठा रहे हैं बंदूक

विश्लेषकों का कहना है कि स्थानीय युवाओं का चरमपंथी संगठनों में शामिल होना यह स्पष्ट संकेत है कि युवाओं को यहां की राजनीति में कोई स्थान नहीं दिया गया है, इसके परिणाम में युवा बंदूक उठा रहे हैं.

पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक खुर्शीद वानी कहते हैं, "हम इस प्रवृत्ति को 2016 से देख रहे हैं, जब बुरहान वानी के मारे जाने के बाद युवाओं का चरमपंथ की तरफ झुकाव बढ़ा. मुझे याद है कि पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा था कि हज़ारों कश्मीरी युवा बंदूक उठाने के लिए तैयार हैं, लेकिन उनकी समस्या यह है कि उनके पास हथियार नहीं हैं."

वह कहते हैं, "हाल ही में मैंने एक वीडियो देखा जिसमें एक युवा बता रहा था कि उसे रोज सेना के एक कैंप में बुला कर प्रताड़ित किया जा रहा है. यह कश्मीर के युवाओं के लिए अवसाद और दमन की स्थिति है, उन्हें उनकी शर्तों पर जीने का अवसर नहीं दिया जा रहा है. यही वजह है कि कश्मीर का युवा आज चरमपंथ का रास्ता चुन रहा है."

वो कहते हैं, "आप देख रहे हैं कि 2008 और 2010 में लोगों का गुस्सा सड़कों पर उतर आया. लेकिन वहां के लोगों तक पहुंचने की कोई कोशिश नहीं की गई. यही निराशा कश्मीर का बुनियादी मुद्दा है, जो कि एक राजनीतिक मसला है और हम इसका समाधान नहीं कर पा रहे हैं. और यही वजह है कि हालात दिन-ब-दिन बिगड़ते जा रहे हैं."

इमेज स्रोत, VIDEO GRAB

इमेज कैप्शन,

पुलवामा हमले का आत्मघाती हमलावर आदिल अहमद डार

निराशा और उदासीनता

खुर्शीद कहते हैं कि कॉलेजों में एडमिशन घट रहे हैं क्योंकि युवा पढ़ाई के लिए दाखिला लेने को लेकर उदासीन हैं.

खुर्शीद वानी कहते हैं, "उदाहरण के लिए, यदि आप पुलवामा में सरकारी डिग्री कॉलेज में छात्रों के दाखिले की संख्या को देखें तो पिछले साल 400 छात्रों ने यहां प्रवेश लिया लेकिन इस साल केवल 200 छात्र ही दाखिले के लिए पहुंचे. इससे पता चलता है कि यहां का युवा सकारात्मक विकास से खुद को कैसे दूर रख रहा है. और यदि सार्थक प्रयासों के साथ इस स्थिति पर तुरंत काबू नहीं पाया गया तो लेथपोड़ा में हमने देखा है कि कैसे सीआरपीएफ़ की बस को निशाना बनाते हुए एक कश्मीरी युवा ने खुद को उड़ा दिया. और यहां के युवा के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं है, तो ऐसे कई हमले हो सकते हैं."

"मैंने युवाओं में आक्रोश देखा है. उन्हें बंदूक के विकल्प के सिवा और कुछ नहीं सूझ रहा है. यह एक बहुत ही गंभीर समस्या है. और इसे केवल राजनीतिक बयानबाजी और राजनीतिक नारेबाजी और राष्ट्रवाद के आधार पर नहीं सुलझाया जा सकता है. यह बेहद ही गंभीर मसला है और नीति निर्माताओं को इसे उतनी ही गंभीरता के साथ लेना चाहिए."

कश्मीर विश्वविद्याल के राजनीतिक विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष नूर मोहम्मद बाबा कहते हैं कि कश्मीर में जो कुछ भी हो रहा है यह वहां के युवाओं की निराशा का फल है जो उन्हें बंदूक की ओर ले जा रहा है. वो कहते हैं कि इसमें नया कुछ भी नहीं है, फर्क है तो बस इतना कि यह पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है."

वो कहते हैं, "जो कुछ भी आ हो रहा है उसमें कुछ भी नया नहीं है. कश्मीर के युवा आज जो बंदूक उठा रहे हैं, वो तो 90 के दशक से जारी है. 1990 में हताशा के कारण वो बंदूक तक पहुंच जाते थे. यह निराशजनक था, लेकिन हमने देखा कि यह लंबे वक्त तक नहीं चल सका. इसके बाद हमने देखा कि बाहरी तत्व स्थानीय युवाओं के इस क़दम का समर्थन करने लगे. नई सदी के आगमन के साथ ही कश्मीर में हालात और बिगड़ने लगे."

"चरमपंथ पैदा नहीं होता. इस नई निराशाजनक स्थिति में हम स्थानीय शिक्षित युवाओं के चरमपंथी संगठनों में शामिल होने की बढ़ती घटना को देख रहे हैं. लिहाजा राज्य के राजनीतिक और वैचारिक मंच को इसे संबोधित करना होगा. लेकिन इसे सुलझाने के लिए यदि सेना और राज्य की ताक़त का इस्तेमाल किया गया तो स्थिति और भी ख़राब हो सकती है. हम एक बेहद परेशान करने वाली स्थिति में आ गये हैं, पुलवामा में जो हमने देखा वैसा कश्मीर में पहले कभी नहीं देखा गया."

खुर्शीद वानी कहते हैं, "कश्मीरी नौजवान का बंदूक उठाने का संबंध कश्मीर के असल मसले से जुड़ा है."

इमेज स्रोत, Getty Images

वैश्विक गतिविधियों से प्रभावित

लेखक और विश्लेषक रूफ़ रसूल का मानना है कि जो कुछ भी दुनिया में हो रहा है उसका प्रभाव कश्मीर के युवा पर भी पड़ रहा है.

वो कहते हैं, "जहां तक कश्मीरी युवाओं का सवाल है, तो जो कुछ भी दुनिया भर में हो रहा है, कश्मीर का युवा उन परिस्थितियों से प्रभावित हैं. और दूसरी बात यह है कि कश्मीर में राजनीतिक और सामाजिक रूप से भी युवाओं के पास कोई अवसर नहीं है. अवसर की कमियों ने इनकी राह को जटिल बना दिया है और जाहिर तौर पर यह उनके मनोविज्ञान पर भी असर डाल रहा है."

वो कहते हैं, "एक बात और जो मैं समझता हूं कि पिछले 30 सालों से यहां के प्रतिकूल माहौल में रहने वाले लोगों में एक तरह का भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक ठहराव सा आ गया है और इसके कारण भी तनाव जैसे विकार उनमें पैदा हुए हैं. इस तरह की अनिश्चितताओं को ख़त्म करने के लिए, संस्थागत व्यवस्था की ज़रूरत है, लेकिन इन चीज़ों की कमी है. और हालात क्या हैं, उसकी ज़मीनी हक़ीकत तो हम देख ही रहे हैं."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)