बिहार के शेल्टर होम से लड़कियां क्यों भाग रही हैं?: ग्राउंड रिपोर्ट

  • 25 फरवरी 2019
शेल्टर होम

मोकामा के शेल्टर होम से शुक्रवार को लापता हुई सात लड़कियों में से छह को बिहार पुलिस ने दरभंगा के गंगोली गांव से सकुशल बरामद कर लिया.

बरामदगी के बाद प्रशासन और पुलिस की तरफ से ये कहा गया है कि सबकुछ नियंत्रण में है, बाकी बची एक लड़की को भी शीघ्र ही बरामद कर लिया जाएगा.

पुलिस को उसके सुराग भी मिल गए हैं. लेकिन नाजरथ हॉस्पिटल, मोकामा द्वारा संचालित शेल्टर होम से लड़कियों का कथित रूप से भाग जाना ये दर्शाता है कि मुज़फ़्फ़रपुर कांड के बाद भी सिस्टम कितना 'लापरवाह' बना हुआ है.

मुज़फ़्फ़रपुर कांड के बाद से बिहार के शेल्टर होमों से लड़कियों के भागने की ये कोई पहली घटना नहीं है.

इसके पहले मुज़फ़्फ़रपुर, पटना, मधुबनी समेत तमाम दूसरे शेल्टर होम से लड़कियाँ रहस्यमयी परिस्थितियों में गायब हो चुकी हैं.

मुज़फ़्फ़रपुर कांड की गवाह

इनमें से एक लड़की जो मधुबनी बालिका गृह से गायब हुई थी वो मुज़फ़्फ़रपुर कांड की एक पीड़िता थी.

जिसके बारे में पुलिस और सरकार को अभी तक कोई ठोस जानकारी नहीं मिल पाई है. पटना के शेल्टर होम से भी कई दफे संवासिनों (शेल्टर होम में रहने वाली लड़कियों के लिए उपयोग किया जाने वाला शब्द) के भागने का मामला सामने आ चुका है.

मोकामा के शेल्टर होम से भी भागी सात लड़कियों में से चार के बारे में कहा जा रहा है कि वे मुज़फ़्फ़रपुर कांड की गवाह थीं.

लेकिन ना तो पुलिस और ना ही बालिका गृह प्रबंधन इसकी पुष्टि कर रहा है.

मोकामा थाने में दर्ज लड़कियों की गुमशुदगी की रिपोर्ट और सीबीआई की चार्जशीट का मिलान करने पर स्पष्ट होता है कि उनमें से दो लड़कियां उस मामले की गवाह थीं, जबकि दो मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह कांड की पीड़िताएं थीं.

बिहार सरकार के दावे

रिकॉर्ड्स के मुताबिक मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह कांड के बाद 14 लड़कियों को बेहतर केयर और सुरक्षा के लिए मोकामा भेजा गया था.

बाद में मधुबनी की घटना होने के बाद वहां की लड़कियों को भी मोकामा ही शिफ्ट ही किया गया था.

रिकॉर्ड्स ये भी कहते हैं कि मोकामा का यह शेल्टर होम बिहार सरकार के दावे के मुताबिक सबसे बेहतर ढंग से संचालित होता है.

बिहार सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में लड़कियों को मोकामा भेजने का कारण भी यही बताया गया है.

लेकिन फिर भी मोकामा से लड़कियां भागने में कैसे सफल हो गईं?

मोकामा शेल्टर होम

मुज़फ़्फ़रपुर मामले में हाई कोर्ट में दायर रिट के याचिकाकर्ता संतोष कुमार कहते हैं, "ये व्यवस्था का नकारापन दिखाता है. सच यही है कि मुज़फ़्फ़रपुर कांड होने के बाद सरकार ने शेल्टर होम्स की बदहाली सुधारने के लिए कुछ नहीं किया. चाहे वह शेल्टर होम के प्रबंधन को अपने नियंत्रण में लेने की बात हो या फिर वहां के संचालन को दुरुस्त करने की बात. अभी तक तो सभी शेल्टर होम्स में महिला गार्ड तक का इंतजाम नहीं हो पाया है. सरकार ने यह सब सुप्रीम कोर्ट में दिए अपने हलफनामे में नहीं लिखा है."

जहां तक बात मोकामा शेल्टर होम पर सुरक्षा के इंतजामों की है तो वहां बिहार पुलिस की छह महिला गार्ड्स को रखा गया था.

चूंकि यह शेल्टर होम नाजरथ हॉस्पिटल द्वारा संचालित होता है, इसलिए इन महिला गार्ड्स की अस्पताल के बाहर ही तैनाती थीं.

लड़कियां कैसे ग़ायब हुईं?

फिर भी वहां से लड़कियां 'भागने' में कैसे कामयाब हो गईं?

घटना के बाद शनिवार तो तहकीकात करने पहुंची पटना एसएसपी गरिमा मल्लिक कहती हैं, "पहली नज़र में देखने से लगता है कि बच्चियां योजनाबद्ध तरीके से भागी हैं. भागने के लिए उन्होंने काफी प्रयास किया है. चूंकि इसके पहले भी वहां पर लड़कियों के बीच आपस में झड़प की ख़बर आई थी. हालांकि, अभी जांच की जा रही है. मोकामा शेल्टर होम प्रबंधन और वहां के कर्मियों से पूछताछ चल रही है."

चाहे पटना हो, मधुबनी हो, मुज़फ़्फ़रपुर हो या फिर जिस भी ज़िले के शेल्टर होम से लड़कियां 'भागी' हैं, पुलिस और प्रशासन हर बार यही जवाब देता है कि लड़कियां खुद ही चली गई हैं.

इस बात को झुठलाया भी नहीं जा सकता कि वो लड़कियां खुद से न भागी हों. क्योंकि उन लड़कियों से बात नहीं किया जा सकता.

'मानसिक रूप से विक्षिप्त'

पुलिस और प्रशासन लड़कियों से इसलिए बात करने की इजाज़त नहीं देता क्योंकि वे कथित रूप से मानसिक तौर पर विक्षिप्त हैं.

लड़कियों की मिसिंग रिपोर्ट् में भी उन्हें 'मानसिक रूप से विक्षिप्त' बताया गया है.

लेकिन सवाल फिर से वही है कि शेल्टर होम से लड़कियां क्यों भाग रही हैं? और उसमें भी वो लड़कियां भाग रही हैं जिन्हें बेहतर और केयर के लिए रखा गया है.

मतलब साफ़ है, उन्हें (बच्चियों) वैसी देखभाल और सुरक्षा नहीं मुहैया कराया जा रहा है, तभी तो उनके लापता होने की ख़बरें आ रही हैं.

इन तमाम सवालों के साथ रविवार को हम पहुंचे मोकामा के शेल्टर होम पर.

दोपहर के ढ़ाई बजे थे. नाजरथ हॉस्पिटल का मुख्य द्वार खुला था. गेट के पास तीन-चार गुमटियां थीं.

मोकामा शेल्टर होम का हाल

एक गुमटी पर बैठे बुजुर्ग दुकानदार से पूछने पर कि क्या जो सात लड़कियां कल गायब हुईं थी, वो यहीं हॉस्पिटल कैंपस में ही रहती थीं!

दुकानदार का जवाब था, "हां. लेकिन वहां कोई जाता नहीं. बहुत अंदर में है और हमेशा तालाबंद रहता है. कल तो यहां भारी भीड़ लगी थी. कह रहा है लोग कि पीछे के रास्ते से लड़कियां भागी हैं. इधर से जातीं तो पता ही तल जाता."

हॉस्पिटल कैंपस में प्रवेश के साथ ही पटना पुलिस का एक जत्था दिखता. अधिकारियों के साथ-साथ करीब दर्ज़न भर से अधिक जवान कैंपस में खंडहर हो रहे विश्रामगृह के सामने अपने असलहे, लगेज और बाकी बोरिया बिस्तर जमीन पर रखकर टहल रहे थे. कुछ आपस में बात कर रहे थे.

अस्पताल प्रबंधन

लड़कियों के भागने की घटना के बाद सुरक्षा बलों को यहां भेजा गया था. रास्ते पर ही दारोगा उपेंद्र कुमार मिल गए. पूछने पर कि जहां लड़कियां रहती हैं वो जगह कहां है?

उपेंद्र कुमार कहते हैं, "हमें भी नहीं मालूम कि कहां हैं. हमलोगों को बस यहां भेज दिया गया है. अस्पताल प्रबंधन अंदर जाने नहीं दे रहा है. हमारे ठहरने का भी कोई इंतजाम नहीं है. देखिए सारा सामान भी अभी तक वैसे ही रखा हुआ है. समझ में नहीं आता कि हमें क्यों भेजा गया है. हमारे अधिकारी उधर प्रबंधन के लोगों से बात कर रहे हैं."

थोड़ी दूर पर बाढ़ की एएसपी लिपि सिंह अपने दल-बल के साथ खड़ी थीं.

पुलिस कर्मियों को निर्देशित कर रही थीं. तुंरत आईजी सुनील कुमार और कमिश्नर आनंद किशोर आने वाले थे. सो सिस्टम को लाइनअप किया जा रहा था.

मोबाइल फ़ोन पर पुलिस अधिकारी लगातार प्रबंधन से बात कर रहे थे. अंदर जाने के लिए मशक्कत चल रही थी. किसी मैडम से बात हो रही थी. अचानक फ़ोन आता है कि दरवाज़ा खुला है.

महिला आयोग की टीम के साथ

लिपि सिंह अपने माताहतों के साथ गेट से अंदर प्रवेश कीं. मगर एक मिनट के अंदर वापस लौट कर चली आईं.

लिपि को आता देख पुलिसवाले आपस में बात शुरू कर देते हैं, "मैडम को भी नहीं जाने दिया सब अंदर."

इसके पहले भी जब यहां घटना नहीं हुई थी और महिला आयोग की टीम के साथ जॉइंट इंस्पेक्शन पर एएसपी लिपि सिंह आई थीं, तब उन्हें अंदर प्रवेश नहीं दिया गया था.

बहुत विवाद के बाद तब महिला आयोग की टीम के साथ लिपि सिंह अंदर गई थीं. हालांकि, उस इंस्पेक्शन में सबकुछ सही पाया गया था.

कैंपस में नाजरथ हॉस्पिटल के कर्मी भी थे. लेकिन कोई कुछ बता नहीं रहा था. सब ये कहकर अपना पल्ला झाड़ लेते कि वे अस्पताल के कर्मी हैं. शेल्टर होम के बारे में वे कुछ नहीं जानते.

बालिका गृह का संचालन

स्थानीय पत्रकार मुन्ना शर्मा कहते हैं, "नाजरथ हॉस्पिटल में पहले बाढ़, मोकामा और आसपास के मरीजों की भीड़ लगी रहती थी. अब आप देख सकते हैं कि कोई नहीं है यहां. ना डॉक्टर मिलेंगे और ना ही मरीज. नाम के लिए ओपीडी चलता है. मिशनरी वाले अस्पताल बंद कर दिए और शेल्टर होम, एड्स कंट्रोल तथा स्कूल के व्यवसाय में आ गए. तीन-चार साल पहले जब लेसी सिंह समाज कल्याण मंत्री थीं, तब उन्होंने यहां शेल्टर होम शुरू किया था."

मुज़फ़्फ़रपुर के बालिका गृह से कुल 25 लड़कियों को यहां लाया गया था. 16 लड़कियां मुज़फ़्फ़रपुर बालिका कांड के तुंरत बाद लाई गईं थीं, जबकि बाकी लड़कियां मधुबनी बालिका गृह से यहां शिफ्ट की गईं थीं. मधुबनी बालिका गृह का संचालन अब बंद हो चुका है.

शेल्टर होम में 19 साल की लड़की

रिकॉर्ड्स के मुताबिक यहां आई लड़कियों में एक 19 साल की भी थीं.

बाकी बच्चियां कथित रूप से नाबालिग थीं. कुछ बच्चियां मानसिक रूप से विक्षिप्त भी थीं जिनका इलाज यहीं चल रहा था.

लेकिन सवाल ये है कि उन बच्चियों के बीच 19 साल की उस लड़की को भी क्यों रखा गया था?

क्योंकि गर्ल शेल्टर होम के नियमों के मुताबिक 18 साल से अधिक उम्र की लड़कियों को रखने का प्रावधान नहीं है.

एएसपी लिपि सिंह कहती हैं, "हां, दो लड़कियां क्रमश 18-19 साल की थीं. और नियमों के मुताबिक बालिका गृह में इतनी बड़ी लड़कियों को रखने का नियम नहीं है. इसमें ज़िम्मेदारी विभाग की बनती है कि नियमों का उल्लंघन करने के मामले में उक्त शेल्टर होम प्रबंधन पर कार्रवाई की जाए."

आस-पास के इलाकों की खाक

थोड़ी देर में आईजी सुनील कुमार भी नाजरथ हॉस्पिटल पहुंच गए थे.

एएसपी लिपि सिंह और दूसरे अन्य अधिकारियों के साथ शेल्टर होम के बाहर के उस इलाके में चल दिए जिधर से लड़कियों के भागने की बात कही गई थी. लेकिन अपने साथ आ रहे मीडियाकर्मियों को वहीं रोक दिया.

आईजी क़रीब डेढ़ से दो घंटे तक शेल्टर होम और उसके आस-पास के इलाकों की खाक छानते रहे. शेल्टर होम का मेन गेट अभी भी बंद था.

जिस शेल्टर होम की सुरक्षा व्यवस्था इतनी चाक-चौबंद लग रही थी, किसी बाहरी को प्रवेश नहीं दिया जा रहा था और जहां पहले से महिला गार्डों की तैनाती थी, वहां से लड़कियां आखिर कैसे भाग गईं?

मामला अदालत के अधीन

जांच कर आए आईजी सुनील कुमार कहते हैं, "हमलोग हर बिंदु पर जांच कर रहे हैं. शेल्टर होम के कर्मियों से भी पूछताछ हु़ई है. जांच में जो भी निकल कर आएगा वो हम कोर्ट को बताएंगे. फिलहाल छह लड़कियों को दरभंगा से बरामद कर लिया गया है. राज्य बाल संरक्षण आयोग में उन लड़कियों को पेश किया जा चुका है. एक बची हुई लड़की को बरामद करने की पुलिस हरसंभव कोशिश कर रही है. जल्द ही उसका भी पता लिया जाएगा."

अभी तक की जांच में क्या निकलकर आया है, लड़कियों को जानबूझ कर तो नहीं भगाया गया!

आईजी इसका जवाब देते हैं, "अभी ये कहना उचित नहीं है. मामला अदालत के अधीन है. हमलोग अनुसंधान कर रहे हैं. अगर जांच में ऐसा निकलकर आता है तो अदालत को रिपोर्ट सौंप दी जाएगी."

Image caption मुज़फ़्फ़रपुर शेल्टर होम कांड में गिरफ़्तार ब्रजेश ठाकुर

पुलिस और प्रशासन

मीडिया में ये भी ख़बर चल रही है कि दरभंगा से बरामद लड़कियों को वापस मोकामा ही लाया जाएगा.

आईजी सुनील कुमार कहते हैं, "ये काम पुलिस का नहीं है. समाज कल्याण विभाग को बाल संरक्षण आयोग को तय करना है कि लड़कियों को कहाँ रखा जाएगा."

मोकामा से लापता हुई लड़कियों को कथित रूप से 48 घंटे के अंदर दरभंगा से बरामद करके पुलिस चाहे जितनी अपनी पीठ थपाथपा ले, मगर सच यही है कि मोकामा के नाजरथ अस्पताल द्वारा चल रहे शेल्टर होम की जांच करने में भी पुलिस और प्रशासन के पसीने छूटे हैं. किसी को जवाब देते नहीं बन रहा है.

सुप्रीम कोर्ट में सोमवार से मुज़फ़्फ़रपुर कांड मामले में दायर एक याचिका पर सुनवाई होनी है.

इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट पहले बिहार सरकार, बिहार पुलिस और सीबीआई को फटकार लगा चुकी है.

इसलिए मामले की गवाह लड़कियों के लापता होने पर सरकार की मंशा पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं.

वैसे बिहार सरकार के मौजूदा समाज कल्याण मंत्री कृष्ण नंदन प्रसाद वर्मा ने मीडिया में बयान दिया है, "विभाग लड़कियों की सुरक्षा के लिए गंभीर है. जांच में जो भी दोषी साबित होगा उसके ख़िलाफ़ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाएगी."

नोटः तमाम कोशिशों के बावजूद नाजरथ प्रशासन की तरफ़ से बात करने के लिए कोई सामने नहीं आया. नाजरथ प्रशासन का पक्ष मिलते ही स्टोरी अपडेट की जाएगी.

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