मसूद अज़हरः भारत में गिरफ़्तारी, फिर जेल और फिर कंधार पहुंचने की कहानी

  • 1 मई 2019
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Image caption मौलाना मसूद अज़हर

मसूद अज़हर पहली बार 29 जनवरी, 1994 को बांग्लादेश विमान की उड़ान से ढाका से दिल्ली पहुंचे. उनके पास पुर्तगाली पासपोर्ट था.

इंदिरा गाँधी हवाई अड्डे पर मौजूद ड्यूटी ऑफ़िसर ने मसूद को देख कर कहा, "आप पुर्तगाली तो नहीं लगते." लेकिन जैसे ही मसूद ने कहा मैं गुजराती मूल का हूँ, तो उसने दोबारा बिना उसकी तरफ़ देखे उनके पासपोर्ट पर मोहर लगा दी.

आने के कुछ दिनों के भीतर ही मसूद अज़हर को श्रीनगर की गलियों-कूचों में देखा जाने लगा. भड़कीले भाषण देना और कश्मीर में पृथकतावादी गतिविधियों में शामिल समूहों के बीच उभर रहे मतभेदों में मध्यस्थता करना उनकी ख़ासियत थी.

उनका एक काम और था, कश्मीरी युवाओं को चरमपंथी गतिविधियों की तरफ़ आकृष्ट और प्रेरित करना. उनको अनंतनाग में उस समय गिरफ़्तार किया गया, जब वो अनंतनाग में सज्जाद अफ़गानी के साथ बैठकर एक ऑटो में जा रहे थे.

सेना के जवानों ने उन्हें रोका. ऑटो में सवार दोनों लोग उतरकर भागने लगे, लेकिन जवानों ने उन्हें वहीं पकड़ लिया.

जेल में मसूद अज़हर हमेशा ये शेख़ी बघारते थे कि भारत सरकार उन्हें बहुत दिनों तक अपनी जेल में नहीं रख पाएगी. मसूद के गिरफ़्तार होने के 10 महीनों के भीतर चरमपंथियों ने दिल्ली में कुछ विदेशियों को अग़वा कर उन्हें छोड़ने के बदले मसूद अज़हर की रिहाई की मांग की थी.

ये मुहिम असफल हो गई, क्योंकि उत्तर प्रदेश और दिल्ली पुलिस सहारनपुर से बंधकों को छुड़ाने में सफल हो गई.

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मोटे शरीर के कारण सुरंग में फंसे

एक साल बाद हरकत-उल-अंसार ने फिर कुछ विदेशियों का अपहरण कर उन्हें छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन ये प्रयास भी असफल रहा.

1999 में जम्मू की कोट भलवाल जेल से उन्हें निकालने के लिए सुरंग खोदी गई, लेकिन मसूद अज़हर अपने मोटे शरीर के कारण उसमें फंस गए और पकड़े गये.

कुछ महीनों बाद दिसंबर, 1999 में चरमपंथी एक भारतीय विमान का अपहरण कर कंधार ले गए.

विमान के यात्रियों को छोड़ने के बदले भारत सरकार मसूद अज़हर समेत तीन चरमपंथियों को छोड़ने के लिए तैयार हो गई.

उस समय भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ के प्रमुख अमरजीत सिंह दुलत को ख़ासतौर से फ़ारूक़ अब्दुल्ला को मनाने श्रीनगर भेजा गया.

अब्दुल्ला, मुश्ताक अहमद ज़रगर और मसूद अज़हर को छोड़ने के लिए कतई तैयार नहीं थे. दुलत को उन्हें मनाने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगाना पड़ा.

Image caption तब भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ के प्रमुख रहे अमरजीत सिंह दुलत के साथ रेहान फ़ज़ल

रॉ के गल्फ़स्ट्रीम विमान से दिल्ली लाए गए

ज़रगर को श्रीनगर जेल और मसूद अज़हर को जम्मू की कोट भलवाल जेल से श्रीनगर लाया गया. दोनों को रॉ ने एक छोटे गल्फ़स्ट्रीम जहाज़ में बैठाया गया.

दुलत बताते हैं, "दोनों की आँखों में पट्टी बंधी हुई थी. मेरे जहाज़ में सवार होने से पहले दोनों को जहाज़ के पिछले हिस्से में बैठा दिया गया. जहाज़ के बीच में पर्दा लगा हुआ था. पर्दे के एक तरफ़ मैं बैठा था और दूसरी तरफ़ ज़रगर और मसूद अज़हर."

उन्होंने बताया कि 'टेक ऑफ़' से कुछ सेकेंड पहले सूचना आई कि हमें जल्द से जल्द दिल्ली पहुंचना हैं, क्योंकि विदेश मंत्री जसवंत सिंह हवाई अड्डे पर ही कंधार जाने के लिए हमारा इंतज़ार कर रहे थे.

उन्होंने बताया, "दिल्ली में उतरते ही इन दोनों को जसवंत सिंह के जहाज़ में ले जाया गया जिसमें तीसरा चरमपंथी ओमर शेख़ पहले से ही मौजूद था."

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Image caption अजित डोभाल

जसवंत सिंह के कंधार जाने की वजह

सवाल उठा कि इन बंदियों के साथ भारत की तरफ़ से कंधार कौन-कौन जाए.

कंधार में मौजूद विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव विवेक काटजू, इंटेलिजेंस ब्यूरो के अजित डोभाल और रॉ के सीडी सहाय सबने एक स्वर से कहा कि कंधार ऐसे शख़्स को भेजा जाए जो ज़रूरत पड़ने पर वहाँ बड़े निर्णय ले सके, क्योंकि यह व्यवहारिक नहीं होगा कि हर फ़ैसले के लिए दिल्ली की तरफ़ देखा जाए.

जब जसवंत सिंह के जहाज़ ने कंधार के हवाई अड्डे पर 'लैंड' किया तो बहुत देर तक तो तालिबान का कोई बंदा उनसे मिलने ही नहीं आया.

Image caption जसवंत सिंह की आत्मकथा 'अ कॉल टु ऑनर - इन सर्विस ऑफ़ एमर्जिंग इंडिया'

जसवंत सिंह जहाज़ में ही बैठ कर उनका इंतज़ार करने लगे. जसवंत सिंह अपनी आत्मकथा 'अ कॉल टु ऑनर - इन सर्विस ऑफ़ एमर्जिंग इंडिया' में लिखते हैं, "बहुत देर बाद वॉकी-टॉकी की आवाज़ गूंजी. परेशान विवेक काटजू ने मेरे पास आ कर पूछा, सर तय करिए कि बंधकों की रिहाई से पहले हम इन चरमपंथियों को छोड़ें या नहीं. मेरे पास इसे मानने के सिवा कोई चारा नहीं था."

वो कहते हैं, "जैसे ही ये तीनों नीचे उतरे, मैंने देखा इनका बहुत गर्मजोशी से स्वागत किया गया. इनके उतरते ही हमारे जहाज़ की सीढ़ियाँ हटा ली गईं ताकि हम नीचे न उतर सकें. नीचे मौजूद लोग खुशी में चिल्ला रहे थे. आईएसआई वाले इन तीनों चरमपंथियों के रिश्तेदारों को पाकिस्तान से कंधार लाए थे, ताकि ये सुनिश्चित किया जा सके कि हमने असली लोगों को ही छोड़ा है. जब उन्हें तसल्ली हो गई कि ये असली लोग हैं, तब जाकर हमारे विमान की सीढ़ी दोबारा उसमें लगाई गई. तब तक अँधेरा घिरने लगा था और ठंड भी बढ़ने लगी थी."

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Image caption कंधार हाईजैक की तस्वीर

'बाइनाकुलर' भेंट में दिया

5 बजे के आसपास अजित डोभाल अपहृत विमान में यात्रियों से मिलने गए. जब वो विमान से उतरने लगे तो दो अपरहरणकर्ताओं बर्गर और सैंडी ने उन्हें एक छोटा 'बाइनाकुलर' भेंट किया.

डोभाल लिखते हैं, "उन्होंने मुझे बताया कि वो इसी 'बाइनाकुलर' से बाहर हो रही गतिविधियों पर नज़र रखे हुए थे. बाद में जब मैं कंधार से दिल्ली आने के लिए रवाना हुए तो मैंने वो 'बाइनाकुलर' विदेश मंत्री जसवंत सिंह को दिखाया. उन्होंने कहा कि ये हमें कंधार के हमारे बुरे अनुभव की याद दिलाएगा. मैंने उन्हें ये 'बाइनाकुलर' एक यादगार के तौर पर दे दिया."

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Image caption कंधार हाईजैक की तस्वीर

बदबू और चिकन की हड्डियाँ

अपह्रत यात्रियों के साथ विदेश मंत्री जसवंत सिंह और भारतीय अधिकारियों की टीम तो उसी दिन वापस लौट आई, लेकिन भारत के इस्लामाबाद उच्चायोग में काम करने वाले एआर घनश्याम को भारतीय विमान में ईंधन भरवाने और उसे वापस दिल्ली लाने की व्यवस्था करने के लिए कंधार में ही छोड़ दिया गया.

एयर इंडिया का 14 सदस्यीय क्रू भी कंधार में ही रह गया. बाद में एआर घनश्याम ने विदेश मंत्रालय को भेजी अपनी रिपोर्ट में लिखा, "जब सब के जाने के बाद मैं उस विमान में गया तो वहाँ नाकाबिलेबर्दाश्त बदबू फैली हुई थी. कॉकपिट पैनल तक में चिकन की हड्डियाँ और संतरे के छिलके पड़े हुए थे. टॉयलेट बुरी तरह से चोक थे और बिल्कुल भी इस्तेमाल करने लायक नहीं थे."

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Image caption कंधार हाईजैक की तस्वीर

लाल सूटकेस का रहस्य

रात क़रीब 9 बजे जहाज़ के कमांडर कैप्टन सूरी घनश्याम के पास आ कर बोले कि तालिबान आईसी 814 को उड़ने देने के लिए तैयार नहीं हैं और वो उसमें ईंधन भरने में आनाकानी कर रहे हैं.

उनकी शर्त है कि वो विमान को तभी उड़ने देंगे जब हम उन्हें विमान के होल्ड से एक लाल रंग का बैग निकाल कर देंगे जो अपहरणकर्ताओं का है.

11 बजे तक कैप्टन सूरी विमान के अंदर ही थे. घनश्याम ने विदेश मंत्रालय को भेजी अपनी रिपोर्ट में लिखा, "मैंने देखा कि एक लाल रंग की पजेरो विमान के होल्ड के ठीक सामने खड़ी थी और उसकी लाइट ऑन थी. कैप्टन राव ने इंजिन स्टार्ट कर रखा था और कुछ मज़दूर अभी भी विमान के अंदर काम कर रहे थे. कैप्टन राव ने मुझे बाद में बताया कि मज़दूरों ने विमान के होल्ड में रखा एक-एक लाल सूटकेस निकाल कर पजेरो में बैठे लोगों को दिखाया. मेरा अंदाज़ा है कि सूटकेस की पहचान के लिए कम से कम एक या उससे ज़्यादा 'हाइजैकर' कार के अंदर बैठे हुए थे. बाद में कैप्टन सूरी को एक मज़दूर ने बताया कि आखिर में उन्हें वो लाल सूटकेस मिल गया, जिसमें 5 'ग्रेनेड' रखे हुए थे. आखिर में कैप्टन राव वापस आए और हम सभी लोग रात में हवाई अड्डे के 'लाउंज' में ही रुके."

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Image caption कंधार हाईजैक की तस्वीर

पैकेट के अंदर बादाम, किशमिश और नेल कटर

अगले दिन जहाज़ में ईंधन भर दिया गया और अफ़ग़ान समय के अनुसार सुबह 9 बज कर 43 मिनट पर भारतीय विमान ने दिल्ली के लिए उड़ान भरी.

इसके बाद तालिबान का एक भी अधिकारी कंधार के हवाईअड्डे पर नहीं आया. कंट्रोल टॉवर के एक अधिकारी ने घनश्याम को पैकेट दिया. जब उन्होंने उसे खोला तो उसके अंदर कुछ बादाम, किशमिश, एक छोटा कंघा और एक 'नेल कटर' था.

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Image caption कंधार हाईजैक की तस्वीर

तालिबान के नागरिक उड्डयन मंत्री ने उन्हें ये तोहफ़े के तौर पर भेजा था, क्योंकि उन्हें पता था कि घनश्याम को कंधार हवाईअड्डे पर रहने के दौरान एक बार भी शहर जाने का मौका नहीं मिला था.

घनश्याम ने 12 बजे संयुक्त राष्ट्र के एक विमान से उड़ान भरी और वो 3 बजे वापस इस्लामाबाद पहुंचे.

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भारतीय हवाई हमले के बाद बालाकोट पहुंचा बीबीसी

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