WomensDay: एक मां और उसके गे बेटे की कहानी जो आपको रुला देगी

  • 8 मार्च 2019
एलजीबीटी इमेज कॉपीरइट AFP/Getty Images

जब से मैंने अपने लेखों, गीतों, म्यूज़िक वीडियो और हाल ही में अपनी नई किताब के ज़रिए अपनी सेक्शुअलिटी के बारे में बताया, लगभग हर शख़्स मुझे 'बहादुर' कहने लगा है.

लेकिन मुझे लगता है कि अगर कोई बहादुर है तो वो मेरी मां और उन जैसी औरतें हैं जो एक ऐसी दुनिया का सामना करने के लिए तैयार हैं जो हर हाल में उन्हें पितृसत्ता के ज़रिए उन्हें कमज़ोर दिखाने का तरीका ढूंढ ही लेता है.

मेरे ज़िंदगी के 50 साल के सफ़र में मेरी मां हमेशा मेरी 'रक्षक और दोस्त' रही हैं. उन्होंने मुझे न सिर्फ़ उतने ही प्यार से बड़ा किया जितना मेरे दो और भाइयों को. बल्कि मैं कहूंगा कि उन्होंने मुझे उनसे भी ज़्यादा ही प्यार दिया.

उन्होंने स्कूल में उस वक़्त मेरा हाथ थामा जब मैं अपने मोटापे की वजह से मुश्किल में था. उन्होंने उस वक़्त मेरा हाथ थामा जब मैंने ख़ुद को कबूला.

वो मेरे पत्रकारिता और कम्युनिकेशन के करियर के सभी ख़ूबसूरत मोड़ पर दर्शकों के साथ जश्न मनाती दिखीं. जब मेरे बैंड ने भारत का ऐसा पहला गाना बनाया जो एलजीबीटी (लेस्बियन, गे, बाइसेक्शुअल, ट्रांसजेंडर) समुदाय को समर्पित था, मेरी मां वहां दर्शकों में खड़ी ज़ोर से तालियां बजा रही थीं.

हालांकि जिस बात ने उन्हें परेशान किया वो ये कि मैंने अपनी सेक्शुअलिटी छिपाए क्यों रखी. वो ये सोचने लगीं कि मेरे लिए ये कितना मुश्किल रहा होगा.

उन्हें इस बात की चिंता था दुनिया मुझसे कैसे पेश आएगी और क्या मैं अपनी राह ढूंढने में कामयाब हो पाऊंगा.

एक औरत और एक मां ही इस तरह सोच सकती है. उन्हें इस बात का बख़ूबी अहसास होता है कि दमन क्या होता है, वो अच्छी तरह समझते हैं कि इस दमन को कैसे 'नॉर्मल' बताकर उन्हें कमतर बना दिया जाता है, कैसे उन्हें सीमित विकल्पों और निर्धारित भूमिकाओं में बांध दिया जाता है.

ये आम सच्चाई है. हालांकि मेरे जैसे लोग, आम धारणा के विपरीत महिलाओं के साथ ज़्यादा सुकून महसूस करते हैं. 'हमारी' समस्या पितृसत्ता और 'दमनकारी पौरुष' (Toxic masculinity) है जो हमें ख़ुद को पूरी तरह स्वीकारने से रोकती है.

यही वजह है कि हमारे समाज में 'मज़बूत' औरतों को बेहतर माना जाता है. उन औरतों की तारीफ़ की जाती है जो घिसे-पिटे नियमों को तोड़ती हैं. अपने अधिकारों की रक्षा करने वाली महिलाओं को हम स्वीकार करते हैं. और वो माएं जो अपने 'क्वियर' (एलजीबीटी) बच्चों की 'रक्षा करती हैं', जो उनके लिए 'खड़ी होती हैं' वो मसीहे से कम नहीं हैं. ऐसा करने के लिए वो लगभग हर रोज़ समाज के साथ एक अघोषित 'युद्ध' लड़ती हैं.

मेरी मां, मेरी हीरो

मुझे याद है जब मेरे पिता का निधन हुआ और हम दिल्ली आए तब कैसे मेरी मां को 'विधवा' की तरह महसूस कराया गया. मेरी उस मां को जो हमेशा से एक ख़ुशनुमा औरत थीं, जिन्हें कला के साथ प्रयोग करना पसदं था, जिन्हें अपने सिले और डिज़ाइन किए कपड़ों के रंग पसंद थे...

मेरी मां से सारे रंग छीनकर उन्हें सिर्फ़ सफ़ेदी थमा दी गई और इसके बाद मैंने सालों तक उनके हाथ में पेंटब्रश नहीं देखा.

मेरी मां के साथ ये सब होना उन ठेकेदारों और मज़दूरों के लिए बिल्कुल भी असामान्य नहीं था जो मां के लिए गालियों वाली भाषा का इस्तेमाल करते थे क्योंकि वो घर के मुखिया की तरह पेश आती थीं. वो ऐसा ये जानते भी हुए भी ऐसा करते थे कि हमारे घर में मर्दों के नाम पर सिर्फ़ बच्चे थे.

मेरी मां जैसी औरतों को शायद ये कभी ये पता ही नहीं चलेगा कि उन्हें कितना ज़ख़्मी किया गया है. ऐसा इसलिए क्योंकि उनकी ताकत और अपने बच्चों की देखभाल की परवाह इतनी मज़बूत होती है कि इसकी मदद से वो अपनी सबसे बुरी यादों को भी भुला सकती हैं.

मुझ जैसे बहुत से समलैंगिक पुरुषों की ज़िंदगी में ऐसा कोई न कोई ख़ास व्यक्ति ज़रूर होता है. आम तौर पर यह ख़ास व्यक्ति कोई महिला ही होती है और कई बार वो हमारी मां होती हैं.

मुश्किलें महिलाओं को और ज़्यादा मज़बूत बना देती हैं

हम गे पुरुष और वो महिलाएं एक दूसरे के लिए ताकत और सहारा बन जाते हैं. हम समलैंगिक पुरुष और महिलाएं जाने-अनजाने में साथ मिलकर एक जैसी लड़ाई लड़ रहे होते हैं.

हाल ही में मैं 35 महिलाएं के एक समूह से बात कर रहा था. ये महिलाएं 'दिशा' नाम के एक ग्रुप की सदस्य हैं. मैं इनसे अपनी ज़िंदगी और किताब के बारे में बातें कर रहा था. बातचीत में शामिल इन औरतों की औसत उम्र कम से कम 72 साल तो रही ही होगी. यानी उनमें से ज़्यादातर औरतें बुजुर्ग थीं.

जब मैंने उन्हें अपनी कहानी सुनाई तो उन्हें मेरी ज़िदगी काफ़ी हद तक अपनी ज़िंदगी जैसी लगी. उन्होंने भी अपनी ज़िंदगी में वैसी ही मुश्किलें, वैसे ही फ़ैसले और वैसी ही जीत हासिल की थी जैसी मैंने.

जब मैंने क्वियर समुदाय और महिलाओं को साथ मिलकर दुनिया को चुनौती देने और 'हमारे' लिए बेहतर भविष्य बनाने की बात कही तो बहुत से लोगों को इसमें उम्मीद की किरण दिखाई दी.

उन बुजुर्ग औरतों से अपनी कहानी शेयर करने के बाद और मज़बूत होकर कमरे से बाहर निकला. लेकिन ये सिर्फ़ इसलिए नहीं हुआ क्योंकि मैंने उन्हें अपनी कहानी बताई. ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि मैंने उनकी उस ताकत और इच्छा को महसूस किया जो बदलाव के समर्थन में थी. जैसे-जैसे मैं अलग-अलग मंचों पर अपने मन की बात कहने लगा, मुझे मेरी राह और साफ़ दिखने लगी.

ये बिल्कुल वही मक़सद था जो मेरी मां ने मेरे लिए उस वक़्त तय किया था जब मैंने अगस्त में आत्मकथा लिखनी शुरू की थी. इसके कुछ ही दिनों बाद सितंबर में भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने सम्बन्धों को अपराध ठहराने वाली आईपीसी की धारा-377 को रद्द कर दिया था.

जैसा कि हर कोई देख सकता है कि ये कितना अद्भुत है कि महिलाएं इतनी मज़बूत होती हैं कि उनके सामने आने वाली हर मुश्किल उन्हें और ज़्यादा मज़बूत बना देती है.

वो इतनी मज़बूत हैं कि चीजें बना सकती हैं, उन्हें विकसित कर सकती हैं, बर्दाश्त कर सकती हैं, माफ़ी मांग सकती हैं, मार्गदर्शन कर सकती हैं, सुरक्षा कर सकती हैं...और प्यार कर सकती हैं.

ये तो साफ़ है कि महिलाओं के सम्मान के बिना न्याय और समानता की कल्पना भी नहीं की जा सकती. आख़िर में मैं बस इतना कहूंगा कि मैं बिना एक महिला की ताकत के, अपनी समलैंगिकता को, अपनी सेक्शुअलिटी को कभी पूरी तरह नहीं अपना सकता था. वो महिला मेरी मां हैं.

(शरीफ़ डी रांगणेकर एक एलजीबीटी एक्टिविस्ट हैं. उन्होंने हाल ही में ''Straight To Normal - My Life As A Gay Man' नाम की किताब लिखी है, जिसे भारत की पहली क्वियर आत्मकथा माना जाता है.)

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