मोदी कैसे हमेशा राहुल से सौ क़दम आगे रहते हैं: ब्लॉग

  • 10 मार्च 2019
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सत्ता परिवर्तन की एक ख़ास गंध होती है. ये राजनीतिक गंध महीनों पहले से ही हवाओं में घुलनी शुरू हो जाती है.

गली के नुक्कड़ों, चाय की दुकानों, पान की गुमटियों और रोडवेज़ बस अड्डों पर सिर्फ़ कुछ देर खड़े रह कर ही आप समझ जाते हैं कि बदलाव होने वाला है. और कुछ समय बाद ऐसे ऐसे ताक़तवर सत्ताधीश ताश के पत्तों की तरह बिखरे नज़र आते हैं जिनका हारना कल्पना से परे होता है.

जिन लोगों ने 1976 में होश संभाल लिया था वो मदहोश कर देने वाली बदलाव की गंध को भूले नहीं होंगे. देश को 19 महीने तक इमरजेंसी के अंधेरे में धकेलने वाली धाकड़ प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को जनता ने उन चुनाव में सत्ता से बेदख़ल कर दिया था. लेकिन 1976 में जिन्होंने होश नहीं संभाला था, उन्हें 1987-88 की हवाओं का स्वाद ज़रूर याद होगा.

सिर्फ़ 42 साल की उम्र में राजीव गाँधी 400 से ज़्यादा सीटें जीतकर प्रधानमंत्री बने थे. पर 1989 में वो ऐसे फिसले कि काँग्रेस पार्टी आज तक अपनी टांगों पर खड़ी नहीं हो पाई है.

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जो लोग 1989 में भी बच्चे थे या पैदा नहीं हुए थे उन्हें भी याद होगा कि सत्ता परिवर्तन की वही पुरानी गंध देश की हवाओं में 2013 से ही घुलनी शुरू हो गई थी. मोदी के अलावा दूर-दूर तक किसी को कोई और नज़र ही नहीं आ रहा था. कांग्रेस अपने पेंदे का एक छेद बंद करती तो दूसरे छेद से पानी रिसने लगता.

पर आज इतने साल बाद विपक्ष में रहते हुए भी कांग्रेस अपने रिसते छेदों को बंद करती हुई ही क्यों नज़र आ रही है? जब पूरा विपक्ष मानता है कि नरेंद्र मोदी और उनकी राजनीति के कारण उसके लिए अस्तित्व का संकट पैदा हो गया है, तो राफ़ेल के मुद्दे पर राहुल गांधी इतने अकेले क्यों दिखते हैं? कभी ममता बनर्जी कह देती हैं कि 'दाल में कुछ काला तो है'.

कभी सीताराम येचुरी संयुक्त संसदीय समिति से जांच करवाने की मांग कर देते हैं. पर तभी अखिलेश यादव कह देते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद अब जांच की ज़रूरत नहीं है.

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राहुल गांधी अकेले क्यों चिल्ला रहे हैं?

ऐसा क्यों लगता है कि इस राजनीतिक अरण्य में घूमते हुए अकेले राहुल गाँधी ज़ोर से चिल्ला रहे हैं - चौकीदार चोर है!! मगर उनकी आवाज़ में कोई आवाज़ नहीं मिलाता और उनकी अपनी अनुगूंज ही उन तक लौट आती है. ख़ाली.

ये ठीक है कि उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की मायावती और समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव अपने मतविरोध भुलाकर साथ आ गए हैं. कभी-कभार अख़बार के पन्नों में तृणमूल काँग्रेस की ममता बनर्जी, तेलुगू देशम के चंद्रबाबू नायडू, शरद यादव, लालू प्रसाद यादव के पुत्र और विपक्ष के दूसरे नेता सिरों के ऊपर एक दूसरे के हाथ पकड़े नज़र आ जाते हैं. लेकिन कहाँ हैं छात्रों-नौजवानों की वो टोलियाँ, वो जन संगठन, वो छोटी-छोटी ट्रेड यूनियनें जिन्होंने 1987-88 में नारों से राजीव गांधी के ख़िलाफ़ भूचाल खड़ा कर दिया था.

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हवाओं में बारूदी गंध है

टेलीविज़न देखें तो लगता है कि एक बार फिर 2013 के दृश्य रिपीट होने लगे हैं. हर स्क्रीन पर या तो नरेंद्र मोदी लाइव होते हैं या उनके सिपहसालार अमित शाह - हर रोज़. कोई टीवी चैनल कभी-कभार राहुल गांधी को दिखा भी देता है तो पूरा कार्यक्रम 'धीमी गति के समाचार' में बदल जाता है. प्रियंका गाँधी लॉन्च होने के तुरंत बाद इतनी अदृश्य सी हो गई हैं कि लोग भूलने लगे होंगे कि कांग्रेस की संकटमोचक बनाकर उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश का कार्यभार सौंपा गया है.

कुल मिलाकर मार्च 2019 की हवाओं में परिवर्तन की बजाय बारूद की गाढ़ी गंध फैला दी गई है. अभी चंद महीने पहले राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ से नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भरपूर कोशिशों के बावजूद बीजेपी का पत्ता साफ़ हो गया था. तब ऐसा लग रहा था कि मोदी का ढलान शुरू हो गया है और उनके पास वोटर को दिखाने के लिए अब कोई नया सपना नहीं बचा.

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जब देश ने सोचा, 'अब हीरो की एंट्री होगी'

लगभग हताशा में संघ परिवार के रणनीतिकारों ने राम मंदिर के मुद्दे पर हिंदुओं को एकजुट करना चाहा मगर उन्हें इस मुद्दे पर जनता की उबासियां साफ़-साफ़ सुनाई देने लगीं. सुप्रीम कोर्ट का रुख़ भी मदद नहीं कर रहा था. अमित शाह के हाथ-पांव फूलने लगे और घबराहट में वो सुप्रीम कोर्ट तक को घुड़की देने लगे.

विश्व हिंदू परिषद ने भी अपने साधु-साध्वियों को झाड़-पोंछ कर आंदोलन के लिए तैयार कर लिया. लेकर गलियों-गुमटियों में ये सवाल पूछा जाने लगा था कि बीजेपी को चुनाव से पहले ही राम मंदिर की याद क्यों आती है? आख़िरकार वो दांव भी संघ परिवार को वापिस लेना पड़ा.

नरेंद्र मोदी, अमित शाह और नागपुर के संघ मुख्यालय में अधिकारियों को समझ में आ गया कि देश का 'नैरेटिव' बदले बिना परिवर्तन की गंध को फैलने से नहीं रोका जा सकता. इसके बाद जो कुछ हुआ उसमें वो तमाम एलीमेंट मौजूद थे जो दर्शक को पूरे तीन घंटे तक दम साधकर अपनी सींट पर बैठे रहने को मजबूर कर देते हैं.

पुलवामा में भारतीय सुरक्षा बलों पर फ़िदायीन हमले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था. जो मोदी "पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब" देने का वादा करके सत्ता में आए थे, वो ऐसे मौक़े पर ख़ामोश कैसे रह सकते थे? पूरा देश दम साधे बैठा था कि परदे पर अब हीरो की एंट्री होगी और विलेन को भागने की जगह नहीं मिलेगी.

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हीरो तालियां लूट ले गया!

हीरो की एंट्री हुई. विलेन को उसने एक तगड़ा घूंसा मारा और तालियां लूट ले गया. आश्यर्य से मुंह खोले दर्शक ख़ुशी से झूम उठे. पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट और सीटियों की आवाज़ों से गूँज उठा. हॉल के एक कोने से आवाज़ आई - और मार इसे, और मार. दूसरे कोने से कोई उत्साही पिटते हुए विलेन पर चिल्लाया - देख, आ गया तेरा बाप!!

पिक्चर में ज़बरदस्त मोड़ आ चुका था. ज़्यादातर टेलीविज़न एंकर मोदी के चीयरलीडर्स में बदल गए. पहले टीवी ने कहा कि भारतीय वायुसेना के हमले में बालाकोट में 300 से 400 आतंकवादी मार डाले गए. सरकार, सेना और वायुसेना ने इस बारे में कुछ नहीं कहा. फिर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने गिनती बता दी कि बालाकोट में ढाई सौ आतंकवादी मारे गए.

उन्होंने बाद में ये भी कह दिया कि सबूत माँगने के लिए राहुल गांधी को शर्म आनी चाहिए. नोटबंदी, जीएसटी, बेरोज़गारों की बढ़ती फ़ौज, किसानों की बदहाली, संस्थाओं का भगवाकरण और राफ़ेल ख़रीद में घोटाले के आरोप - सोशल मीडिया पर फूट पड़े राष्ट्रवाद के वलवले ने फ़िलहाल सबको 'न्यूट्रलाइज़' कर दिया है.

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जब नारा गूंजा 'राजीव गांधी चोर है'

पहली बार वोट देने जा रहे 18 बरस के नौजवानों के लिए ही नहीं उन लोगों के लिए भी कहानी में आया ये अप्रत्याशित मोड़ एकदम नया है, जिन्होंने राजीव गांधी को सत्ता के शिखर से फिसलते देखा था. राजीव गांधी 'मिस्टर क्लीन' कहे जाते थे, लेकिन बोफ़ोर्स घोटाले का दाग़ उन पर ऐसा चिपका कि उन्हें सत्ता से हटाकर ही दम लिया.

तोप सौदे में दलाली के आरोप लगते ही राजीव गाँधी के ख़िलाफ़ तुरंत राष्ट्रीय संघर्ष मोर्चे का गठन कर लिया गया. दिल्ली में इसके स्थापना सम्मेलन में बाएँ सिरे पर अगर नक्सलवादी आंदोलन के लोग थे तो दाहिने सिरे पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के केएन गोविंदाचार्य जैसे नेता. बीच में हर रंग के समाजवादी, लोहियावादी, गाँधीवादी, काँग्रेस-विरोधी एकजुट हो गए.

कुछ ही दिनों में पटना से लेकर पटियाला तक नारे गूंजने लगे - "गली, गली में शोर है, राजीव गाँधी चोर है." राजीव गाँधी कैबिनेट से बग़ावत करके निकले विश्वनाथ प्रताप सिंह ने आंदोलन की कमान सँभाली और वामपंथियों और दक्षिणपंथियों को एक साथ साधा.

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मोदी के पास आज भी ब्रह्मास्त्र है

आज राहुल गांधी के सामने वो नरेंद्र मोदी हैं जिन्होंने पाँच साल पहले अच्छे दिन के सपने दिखाए, लेकिन न वो बेरोज़गारी पर लगाम लगा सके, न अर्थव्यवस्था में उछाल ला सके, उलटे नोटबंदी जैसे तुग़लकी फ़ैसलों से कारख़ाने बंद हो गए, नौकरियां चली गईँ, किसानों में पस्तहिम्मती फैल गई. और अंत में हज़ारों करोड़ रुपए के रफ़ाल युद्धक विमान की ख़रीदारी में अनिल अंबानी की कंपनी को फ़ायदा पहुंचाने के आरोपों में घिर गए.

ज़ाहिर है 2013 के मुक़ाबले नरेंद्र मोदी का क़द छोटा ही हुआ है. तब वो अनचीन्हे थे, लोगों को उन्हें परखना था. इन पांच बरसों में लोगों को मोदी की चाल, चेहरा और चरित्र समझ में आ गया है.

इन सबके बावजूद नरेंद्र मोदी ने देश का राजनीतिक नैरेटिव विपक्ष के हाथ में नहीं जाने दिया है. मोदी आज भी अपने तरकश से एक के बाद एक ब्रह्मास्त्र निकाल कर चला रहे हैं और विपक्ष भौंचक है.

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