क्या राहुल ने अज़हर के साथ 'जी' लगा कर ग़लत किया

  • 13 मार्च 2019
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क्या राहुल ने अज़हर के नाम के साथ 'जी' लगा कर ग़लत किया! अब कहा जा रहा है उन्होंने व्यंग्य में ऐसा कहा.

मगर भाषा की समझ रखने वाले जानते हैं कि सामान्य आदरसूचक की तरह 'जी' को बरता गया न कि व्यंग्य ज़ाहिर करने के लिए इसे जोड़ा गया. जैसे किसी सामान्य व्यक्ति को महाराज, महारानी कह देना,

राहुल की भंगिमा भी गवाह है कि 'जी' उच्चार पर ज़ोर नहीं था.

'जी' पर मचा बवाल बाल की खाल निकालना नहीं बल्कि भाषिक चूक पर ध्यान खींचना ही है. भाषा बरतते हुए हमें परिवेश की समझ का ध्यान भी रखना चाहिए.

बहरहाल, हिन्दी-उर्दू में रचे बसे इस 'जी' के बारे में जानना दिलचस्प होगा.

'जी' हुज़ूरिया

हर भाषा में विविध भावों को व्यक्त करने वाले विभिन्न उच्चार या संबोधन होते हैं. कही गई बात को आत्मसात करने वाली ध्वनि है 'हुँ' या 'हूँ' इसी तरह स्वीकार के भाव को व्यक्त करने वाला उच्चार है 'हाँ'.

नकार के लिए 'ना' है, इसी तरह का एक उच्चार है 'जी'. इस 'जी' की व्याप्ति हिन्दी में जबर्दस्त है.

यही नहीं, 'जी' में शायराना सिफ़त भी है, रूमानी अंदाज़ वाली बात हो या उस्तादाना तबीयत वाली नसीहत, इस 'जी' की मौजूदगी से रंगत आ जाती है.

मिसाल के तौर पर अनपढ़ फ़िल्म में राजा मेंहदी अली खान के लिखे गीत की यह लाइन- जी' हमें मंज़ूर है आप का हर फै़सला / कह रही है हर नज़र बंदापरवर शुक्रिया....

'जी' की अभिव्यक्ति मुहावरेदार भी होती है जैसे किसी की हाँ में हाँ मिलाने को उर्दू में 'जीहुज़ूरी' कहा जाता है. इस 'जी' की मौजूदगी यहाँ बख़ूबी पहचानी जा सकती है.

यस मैन, हाँ में हाँ मिलाने वाला

कहाँ से आया इसकी बात इसी 'जीहुज़ूरी' से करते हैं. 'जीहुज़ूरी' का अर्थ जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है 'हाँ में हाँ मिलाना' है. 'जीहुजूरी' में 'जी हुज़ूर' को साफ़ पहचाना जा सकता है.

'हाँ में हाँ मिलाना' का अर्थ है किसी की बात के अंत में 'हाँ हाँ' कहते चले जाना. साफ़ है कि सुनने वाला व्यक्ति सभी बातों को स्वीकार कर रहा है.

स्वाभाविक है कि "हाँ हाँ" कहने वाला व्यक्ति सामने वाले की सत्ता के आगे नतमस्तक है. अंग्रेज़ी में इस "हाँ" की जगह 'यस' कहने का प्रचलन है.

यस सर यानी 'जी' हुज़ूर

जब सामने वरिष्ठ व्यक्ति हो तो 'यस' के आगे 'सर' जुड़ जाता है यानी यस सर. ग़ौर करें यह 'यस सर' दरअसल "जी हुज़र" ही है.

हुज़ूर यानी श्रीमान, मान्यवर, मालिक, श्रीमंत, हुकुम आदि, अंग्रेज़ी में इन्हें "सर" कहते हैं. समाज ने अंग्रेज़ी में "यस सर" कहने वाले के लिए "यसमैन" टर्म विकसित कर ली और हिन्दुस्तानी में इसे "जीहुज़ूरिया" कहा जाने लगा.

सरकारी भाषा में श्रीमान शब्द भी सर के लिए प्रचलित है और कई लोग वरिष्ठों की बात सुनने के बाद हर बार श्रीमान श्रीमान कहते हैं.

जी होकम

स्पष्ट है कि "जी" दरअसल सामने वाले के लिए आदरयुक्त संबोधन या उच्चार है जिसमें उस व्यक्ति का रुतबा उभरता है.

राजस्थान में हुकुम कहने का चलन है, वहाँ के सामंती समाज में वरिष्ठ व्यक्ति के लिए हुकुम, होकम जैसे संबोधन प्रचलित हुए. आज भी वहाँ 'यस सर' की तरह सिर्फ़ हुकुम या होकम कहने का प्रचलन है.

आर्य से विकसित है "जी"

संस्कृत हिन्दी में श्रीमान, श्रीमन्त, मान्यवर जैसे संबोधन हैं किन्तु प्राचीन भारत में बलशाली, सम्भ्रान्त, शिष्ट, कुलीन, शालीन, माननीय, अमीर व्यक्ति के लिए "आर्य" संबोधन प्रचलित था.

यह 'जी' इसी "आर्य" का अपभ्रंश है. भारोपीय भाषाओं में अक्सर संस्कृत की "य" ध्वनि का प्राकृत रूप "ज" हो जाता है. "युवन्" का "जवान", "जुवनाइल", "युवा" का "जुवा", "यौवन" का "जोबन", "यव" का "जौ" जैसे कई उदाहरण हैं. आर्य > आर्य्य > आज्ज > अज्ज > जी कुछ यह क्रम रहा होगा इस "जी" के विकास का.

आर्यिका से ही आजी

आर्य शब्द पर विस्तृत चर्चा फिर कभी, अभी तो हम इससे बने जी पर ही बात कर रहे हैं. प्राचीनकाल में श्रेष्ठिजनों के लिए 'आर्य' शब्द आम था.

सामान्य कार्यव्यवहार में जैसे आजकल "यस सर", या "हुकुम" जैसे संबोधन होते हैं वैसे ही 'आर्य' शब्द भी प्रचलित था अर्थात हर वाक्य के बाद सुनने वाला उसी तरह "आर्य" कहता था जैसे अब 'सर', 'बॉस' या 'हुकुम' कहा जाता है.

ग़ौर करें हिन्दी की विभिन्न बोलियों में दादी या नानी के लिए "आजी" शब्द है. यह दरअसल, "आर्यिका" से आ रहा है. आर्य का स्त्रीवाची हुआ आर्यिका.

'आर्य' अर्थात श्रेष्ठ, कुलीन इसी तरह आर्य स्त्री के लिए आर्यिका शब्द रूढ़ हुआ. प्राकृत / अपभ्रंश में इसका रूप है 'अज्जिका' और आज की बोलियों में यह 'आजी' हुआ. मराठी में दादी को 'आजी' और दादा को 'आजोबा' कहते हैं और परदादा को 'पंजोबा'.

आर्यिका से बने 'आजी' शब्द में निश्चित ही घर की मुखिया, प्रमुख और प्रभावशाली महिला का भाव है. जाहिर है 'आजोबा' की पत्नी भी उसी सम्मान की हकदार हुई. संस्कृत ग्रंथों में "आर्या" शब्द का भी उल्लेख है जिसमें भी सम्मानजनक उक्त सभी भाव निहित हैं.

हाँ जी, अच्छा जी, ओके जी

कुल मिला कर "जी" शब्द संबोधनसूचक है प्राचीन भारतीय परम्परा से आ रहा है.

इससे पहले ही हम सरजी और ओकेजी जैसी टर्म तो बना ही चुके है, स्वीकारसूचक भाव के लिए 'हाँ' के साथ भी 'जी' जुड़ गया और हाँजी बन गया, अच्छा जी भी है ही. याद रखें इस के पीछे "हाँ आर्य" अर्थात सही है श्रीमान ही छुपा हुआ है.

प्रश्नवाचक भाव के रूप में क्यों शब्द के साथ भी जी जुड़ा हुआ नज़र आता है यानी क्योंजी, इसमें पूछने वाले के प्रति सम्मान या आदर का भाव है.

साहबजी, सरजी

आर्य से बने अज्ज का एकदम प्राकृत रूप तो अजी में नज़र आता है जो रोजमर्रा की बातचीत के औपचारिक सम्बोधन में आमतौर पर शुमार होता है.

इसके अलावा 'जी साहबजी', 'जी सरजी' में भी इसे देख सकते हैं और व्यक्तिनाम के पीछे, सम्बोधनों के पीछे जैसे रमेशजी, सुरेशजी, ताईजी, भाईजी, पिताजी, माताजी में भी सम्मानसूचक आर्य का ही भाव है.

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