मसूद अज़हर को बचाने में क्या है चीन का स्वार्थ- नज़रिया

  • 14 मार्च 2019
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चीन ने एक बार फिर पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन संगठन जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने के प्रस्ताव पर 'टेक्निकल होल्ड' लगा दिया है.

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद प्रस्ताव 1267 के तहत स्थापित प्रतिबंध समिति के तहत वैश्विक आतंकवादी घोषित होने के बाद व्यक्ति किसी भी देश की यात्रा नहीं कर सकता.

पूरी दुनिया में उसकी संपत्तियां जब्त कर ली जाती हैं और किसी भी देश से हथियार नहीं ख़रीद सकता. चीन ने अपने वीटो का इस्तेमाल कर इस प्रस्ताव पर रोक लगा दी है. चीन का कहना है कि उसे '' इस मामले में और ज़्यादा अध्ययन '' करने की ज़रूरत है.

चार बार चीन ख़ारिज कर चुका है प्रस्ताव

मुंबई में हुए 26/11 हमले के बाद साल 2009 में भारत ने पहली बार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ये प्रस्ताव पेश किया था. साल 2016 में पठानकोट एयरबेस पर हुए हमले के बाद भारत ने फिर इस प्रस्ताव को पेश किया.

इस बार भारत का साथ दिया यूनाइटेड किंगडम, अमरीका और फ्रांस ने. इन तीनों ही देशों को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी देश का दर्जा प्राप्त है लेकिन ये प्रस्ताव पास नहीं हो सका.

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साल 2017 में जम्मू-कश्मीर के उड़ी में सेना के कैम्प में हुए हमले के बाद भारत ने फिर ये प्रस्ताव यूएन में पेश किया और इन तीनों ही बार चीन ने ये कहते हुए 'टेक्निकल होल्ड' लगाया कि उसे इस मुद्दे को समझने के लिए और समय चाहिए.

इस बीच दुनिया भर में जारी आतंकवादी हमलों ने अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद से लड़ने की भारत की पहल को और मज़बूत किया. अमरीका में हुए 9/11 हमले के बाद साल 2001 में यूएन सुरक्षा परिषद ने कई संगठनों पर प्रतिबंध लगाया जिसमें जैश ए मोहम्मद भी शामिल रहा. लेकिन इसके बाद भी मसूद अज़हर ने कई हमले किए और इसकी बकायदा ज़िम्मेदारी भी लेता रहा.

बीते बुधवार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमरीका, यूके और फ़्रांस की सहमति के बाद भी चीन के वीटो के इस्तेमल के कारण ये प्रस्ताव रद्द हो गया.

14 फ़रवरी को पुलवामा में हुए आत्मघाती हमले में 40 जवान मारे गए, जिसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने '' जघन्य और कायरतापूर्ण '' अपराध बताया था. जब ये बयान दिया गया तो इस बैठक में चीन भी शामिल था. इस हमले की ज़िम्मेदारी जैश-ए-मोहम्मद ने ली थी.

26 फ़रवरी को भारत ने पाकिस्तान पर एयर स्ट्राइक किया जिस पर उसे दुनिया की तमाम शक्तियों की ओर से समर्थन मिला. इसके ठीक एक दिन बाद भारत, चीन और रूस के विदेश मंत्रियों के बीच बैठक चीन में हुई. इस बैठक में आतंकवाद को ख़त्म करने की तय सीमा को आगे बढ़ा दिया गया.

इस बैठक के बाद जारी की गई विज्ञप्ति में कहा गया कि आंतकवाद और ऐसे संगठनों से निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की ज़रूरत होगी. इसमें ये भी कहा गया कि आतंकवाद को राजनीतिक फ़ायदे के लिए क़तई इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए. ब्रिक्स 2017 में भी भारत, चीन और रूस आतंकवाद के मुद्दे को संबोधित कर चुके हैं.

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बीजिंग की ओर से लागातार दिए जा रहे ऐसे संकेतों को देखते हुए उम्मीद जताई जा रही थी कि साल 2011 से मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकी घोषित किए जाने में अडंगा लगाने वाला चीन इस बार आतंकवाद पर साथ खड़ा हो सकता है.

14 फ़रवरी की घटना के बाद मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया कि रूस के राष्ट्रपति व्लादमीर पुतिन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात की है और भारत को अपना समर्थन दिया है. रूस ने भारत को ये भी भरोसा दिलाया कि वह मसूद अज़हर को आतंकवादी घोषित करने के प्रस्ताव पर भारत का साथ देगा.

मॉस्को भारत का संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में समर्थन करता रहा है. कश्मीर के मुद्दे पर भी अंतर्राष्ट्रीय मंच पर वह भारत के साथ खड़ा रहा है.

मसूद अज़हर को पाकिस्तान का समर्थन प्राप्त है. बीबीसी को दिए इंटरव्यू में पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने माना था कि वह पाकिस्तान में ही रह रहा है और काफ़ी बीमार है.

इन सबके सामने चीन का टेक्नीकल होल्ड' बताता है कि वह अपने 'पुराने सहयोगी' के लिए आतंकवाद जैसी बड़ी क़ीमत भी चुकाने को तैयार है. पिछले रिकॉर्ड्स को देखें को ये चीन की फ़ितरत रही है और पाकिस्तान को आतंकवाद के मामले में भी चीन समर्थन देता रहा है.

आख़िर क्यों पाकिस्तान के चरमपंथियों के लिए नरम है चीन?

ये समझने की ज़रूरत है कि आख़िर क्यों चीन पाकिस्तान समर्थित चरमपंथी संगठनों को सुरक्षा देने के लिए संयुक्त राष्ट्र जैसे मंच का इस्तेमाल करता है.

साल 1980 में अज़हर ने अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत सेनाओं से लड़कर अपने जीवन की शुरुआत की थी और इसके बाद में जैश की स्थापना की.

यह पाकिस्तान के इस्लामीकरण का वक़्त था. इस वक़्त अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत सेना से लड़ने के लिए छात्रों को मुजाहिदीन के रूप भेजा जा रहा था.

चीन का एंटी सोवियत मुजाहिदीन से संबंध भी इसी दौर में शुरू हुआ. इसकी वजह से साल 1980, 1981, 1985 , 1987 और अप्रैल 1990 में हुए चीन विरोधी प्रदर्शनों के दौरान मुसलमान-बहुल प्रांत शिनजियांग के सैकड़ों वीगर मुसलमान मुजाहिदीन बनाए गए.

1989 में सोवियत ने अफ़ग़ानिस्तान से वीगर मुजाहिदीनों को रिहा कर दिया ताकि शिनजियांग में ये विरोध प्रदर्शन उरुमची, काशगर और खोतान जैसे बड़े शहरों से होते हुए कुचा, अक्सू और आर्टुश जैसे छोटे शहरों में फैल गए.

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इन कारणों से चीन ने पाकिस्तान आधारित चरमपंथी समूहों के लिए शॉर्ट टर्म और ख़ुद के हितों का ध्यान रखते हुए रणनीतियां बनायीं.

इस सिलसिले में साल 2000 बेहद अहम रहा. नवंबर 2000 में पाकिस्तान में चीन के राजदूत लु शुलिन ने तालिबान नेता मुल्लाह उमर से मुलाक़ात की. मुल्लाह उमर ने उन्हें यक़ीन दिलाया कि वीगर शियानजियांग में किसी प्रकार के कोई हमले नहीं करेंगे.

यह अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के दमनकारी शासन का चरम काल था जो 2001 से शुरू हुए वैश्विक आतंकवाद पर अमेरिकी युद्ध के ज़रिए ख़त्म किया गया.

जुलाई 2009 में चीन में एक बड़ा दंगा हुआ जिसमें उरूमची में ही 156 लोगों की मौत हो गई. इस घटना के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति हू जिन्ताओ को जी8 का दौरा बीच में ही छोड़कर वापस आना पड़ा.

चीन-पाकिस्तान के बीच चल रहा इकॉनमिक कॉरिडोर प्रोजेक्ट चीन की चरमपंथियों से तुष्टीकरण की नीति को दिखाता है.

चीन का पाकिस्तान के चरमपंथी समूह के लिए ये रवैया तब तक कायम रहेगा जब तक ये संगठन चीन के शियानजियांग में वीगर मुसलमानों को किसी भी विद्रोह से रोके रखेंगे.

जब तक ऐसा चलता रहेगा तब तक चीन पाकिस्तान के इस संगठनों के लिए एक ढाल की तरह काम करता रहेगा.

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