जब दूल्हे ने कहा, हमेशा पहनूंगा मंगलसूत्र

  • 15 मार्च 2019
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Image caption प्रिया और अमित बारागुंडी

हाल में उत्तरी कर्नाटक के विजयपुर ज़िले में ख़ास तरह की दो शादियां हुई जिसके बारे में स्थानीय मीडिया में काफी चर्चा रही.

इन दोनों शादियों में मंडप में बैठी दुल्हन ने दूल्हे के गले में मंगलसूत्र पहनाया.

मुद्देबिहाल तालुका के नालतवाड़ में हुई इन दो शादियों की चर्चा स्थानीय अख़बारों तक में हुई. कईयों की प्रतिक्रिया कुछ ऐसी रही- "बेहद अजीब", "ये हो क्या रहा है."

लेकिन सरकारी कर्मचारी अशोक बारागुंडी के परिवार को अपने बेटे और भतीजे की शादी को मिल रही चर्चा पर हैरानी है.

उन्होंने बीबीसी हिंदी को बताया, "इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है. हमारे परिवार में कई शादियां इसी तरह हुई हैं."

लेकिन इस शादी में एसा क्या ख़ास हुआ?

12वीं सदी के समाज सुधारक भगवान बासवन्ना की मूर्ति के नीचे एक छोटा-सा मंडप बना था जिस पर दो दूल्हे और दो दुल्हनें बैठे थे.

भगवान बासवन्ना की मूर्ति के पास में इल्कल के श्री महन्तेश्वर संस्थान मठ के गुरुमहंत स्वामीजी बैठे थे.

दोनों दूल्हों को रुद्राक्ष की बनी दो विवाहमुद्रा (एक तरह की माला) दी गईं. ये भारत के दूसरे हिस्सों में पहने जाने वाले मंगलसूत्र जैसा ही कुछ होता है. दोनों ने इस विवाहमुद्रा को अपनी दुल्हनों के गले में बांध दिया.

इसके तुरंत बाद दोनों दुल्हनों को ऐसे ही रुद्राक्ष से बनी विवाहमुद्रा दी गई जो उन्होंने दूल्हों को पहनाई.

इसके बाद दोनों जोड़ों को हार दिए गए जो दूल्हा-दुल्हन ने एक दूसरे को पहनाए.

स्वामीजी के कहने पर शादी की कसमों के लिए दोनों जोड़े खड़े हुए.

दोनों जोड़े स्वामीजी के कहे मंत्र दोहराने लगे-

"शादी केवल शारीरिक संबंध नहीं है.

ये दिलों में प्रेम और आध्यात्मिक समझदारी पर आधारित है.

हम एक दूसरे को समझेंगे और मिल कर एक जिंदगी बिताएंगे.

हम अपने निजी स्वार्थ से आगे बढ़ कर ईश्वर के काम और दानधर्म को अपना कर समाज की भलाई, खुशी और बेहतरी के लिए काम करते रहेंगे.

इसके साथ-साथ हम अपने जीवन में धर्म, राष्ट्र, पर्यावरण और परिवार में रहने के बारे में भी जागरूक रहेंगे.

हम ईर्ष्या, अंधविश्वास, अंध विश्वास और काले जादू से दूर रह कर एक जागरूक जीवन जिएंगे.

हम निष्कलंक जीवन व्यतीत करेंगे, औरों के धन, उनकी जगह पर नज़र नहीं रखेंगे, ना ही उनकी यातना और आरोप के पात्र बनेंगे.

हम लालच और बुरा व्यवहार नहं रखेंगे, ना ही बुरी आदतों में पड़ेंगे और ईश्वर में विश्वास करते हुए सकारात्मक सोच के साथ जीवन व्यतीत करेंगे.

बासवन्ना और अन्य धर्मगुरुओं के दिखाए रास्ते पर चलते हुए हम ज्ञान से परिपूर्ण, धार्मिक रीतियों का पालन करते हुए दुनिया की अच्छाई को समेटते हुए अपना जीवन बिताएंगे.

हम धर्मगुरु भगवान बासवन्ना के सामने और समुदाय के सामने ये प्रतीज्ञा करते हैं.

जय गुरु बासवन्ना शरणु शरणार्थी."

कसमें लेने की इस पूरी रस्म के बाद और शादियों की तरह परिवार के सदस्य दूल्हा-दुल्हन पर रंग किए हुए चावल नहीं फेंकते, बल्कि उन्हें आशीर्वाद देते हैं. ना ही शादी में कन्यादान की रस्म हुई, जैसा कि आम शादियों में होती है.

वर-वधु को आशीर्वाद देने के साथ ही दोनों शादियां संपन्न मान ली गई. इन शादियों में एक और ख़ास बात जो थी वो ये कि इसमें कोई हवन नहीं हुआ, कोई आग नहीं थी जिसके चारों ओर दूल्हा-दुल्हन फेरे लेते हैं.

और तो और इसके लिए किसी ज्योतिष से पूछ कर या पंचाग देख कर कोई शुभ महूर्त भी नहीं निकाला गया.

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Image caption प्रभुराज शांबुलिंग और अंकिता

महिला के सम्मान के लिए बने ये रीति-रिवाज़

बारागुंडी और दुग्गाडी परिवारों ने इन दो शादियों में जिन रस्मों का पालन किया है वो भगवान बासवन्ना को मानने वाले लिंगायतों के लिए नए नहीं हैं.

बॉम्बे- कर्नाटक और हैदराबाद-कर्नाटक के इलाके में बसे लिंगायत समुगदा से जुड़े लोगों में ये आम रस्में हैं (ये वीरशैव लिंगायतों की रस्मों से भिन्न हैं जो वेदिक रीति-रिवाज़ों का पालन करते हैं).

इल्कल मठ के दिवंगत डॉक्टर महंत स्वामीगालु चितारागी को मानने वाले इन्हीं रीति-रिवाज़ों का पालन करते हैं.

गुरुमहंत स्वामीजी कहते हैं, "उन्होंने दहेज प्रथा को ख़त्म करने के लिए मुहिम चलाई थी और उन्होंने 12वीं सदी में भगवान बासवन्ना के बताए रीति रिवाज़ों का पालन किया. उनका मानना था कि महिलाओं को दान के रूप में दूसरे को नहीं दिया जाना चाहिए. इस कारण शादी में कन्या का कन्यादान नहीं होता क्योंकि अगर आप अपनी बेटी को दान में दे देते हैं तो इसके बाद इंसान के रूप में उसका मूल्य कम हो जाता है. इस कारण दूसरा व्यक्ति उसके साथ दुर्व्यवहार कर सकता है."

वाचन साहित्य अध्ययन (11वीं और 12वीं सदी में शरण मुहिम के साथ बना कन्नड़ साहित्य जो बोले गए शब्द यानी वचन को आधार बना कर रचा गया) के पूर्व निदेशक रमज़ान दर्ग कहते हैं, "विवाहमुद्रा इस मठ की नई अवधारणा है. जो लोग बासवन्ना के कहे वचनों को जानते और मानते हैं वो इसका पालन करते हैं. साधारण तौर पर जैसे-जैसे लोगों ने वैदिक रीति-रिवाज़ों का पालन करना शुरु किया वो बासवन्ना के कहे वचनों की अनदेखी करने लगे. लेकिन इल्कल मठ के दिवंगत स्वमीजी ने इसका पालन किया और इसका प्रचाार भी किया."

अशोक बारागुंडी कहते हैं, "हम बीते दो-तीन दशकों से इन्हीं रीति-रिवाज़ों का पालन कर रहे हैं. मेरे कज़न संजीव की शादी भी ऐसे ही हुई थी. शीला और पूर्णिमा की शादी और मेरी बेटी पूजा की शादी भी इन्हीं रीति-रिवाज़ों के अनुसार हुई थी."

गुरुमहंत स्वामीजी कहते हैं, "दूल्हे को मंगलसूत्र पहनाने की पूरी अवधारणा एक तरह का नैतिक दबाव बनाने के लिए है ताकि पुरुष किसी और से शादी ना करे या फिर किसी स्त्री के साथ रहने के लिए ना जाए."

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अब सवाल ये उठता है कि जस तरह दूसरे समुदाय की महिलाएं हमेशा मंगलसूत्र पहनती हैं, क्या अमित बारागुंडी भी हमेशा मंगलसूत्र पहने रहेंगे?

अमित कहते हैं, "हां, मैं हमेशा इसे पहनूंगा. ये पूरे रीति-रिवाज़ यही दिखाते हैं कि महिला और पुरुष बराबर हैं. मुझे नहीं लगता कि विवाहमुद्रा से पुरुष पर कोई नैतिक दवाब पड़ता है, क्योंकि सब कुछ महिला और पुरुष दोनों की आपसी समझ पर निर्भर करता है."

अमित बारागुंडी एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं और ऑस्ट्रेलिया में एक आईटी कंपनी के लिए काम करते हैं.

अमित की शादी इंटरकास्ट (अंतरजातीय शादी) है. उसी मंडप में शादी के बंधन में बंधे प्रभुराज शांबुलिंग और अंकिता की भी इंटरकास्ट शादी है. प्रिया और अमित की मुलाक़ात सॉफ्टवेयर कंपनी में ही हुई थी और फिर दोनों को प्यार हो गया. बात आगे बढ़ी और दोनों के माता-पिता भी रिश्ते के लिए राज़ी हो गए. प्रिया करूबा समुदाय यानी चरवाहा समुदाय से आती हैं.

प्रिया कहती हैं, "ये वाकई में अद्भुत अनुभव है. मेरे ससुरालवालों ने ये साबित कर दिया है कि महिला और पुरुष समान हैं. पहले जब मैंने सुना कि दूल्हे को मंगलसूत्र पहनाया जाएगा तो मुझे भी आश्चर्य हुआ था."

प्रिया से मैंने पूछा कि वो कैसे सुनिश्चित करेंगी कि अमित हमेशा विवाहमुद्रा पहन रहे हैं या नहीं. प्रिया ने जवाब दिया, "वो हमेशा इसे पहनेंगे. उन्होंने मुझसे वादा किया है."

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