BBC के नाम पर नोटबंदी से जुड़ा ये दावा फ़र्जी: फ़ैक्ट चेक

  • 17 मार्च 2019
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सोशल मीडिया के ज़रिए बीबीसी के नाम पर एक भ्रामक संदेश फ़ैलाने की कोशिश की जा रही है कि नोटबंदी के दौरान 100 से ज़्यादा नहीं, बल्कि हज़ारों लोगों की मौत हुई थी जिसकी रिपोर्टिंग नहीं की गई.

बीबीसी को अपने पाठकों से ऐसे कुछ संदेश मिले हैं, कुछ स्क्रीनशॉट मिले हैं जिन्हें फ़ेसबुक, ट्विटर, शेयर चैट और व्हॉट्सऐप पर सर्कुलेट किया गया था. लेकिन इनमें जो डेटा इस्तेमाल किया गया है वो तथ्यात्मक रूप से बिल्कुल ग़लत है.

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Image caption एक वायरल पोस्ट जिसमें नोटबंदी में मरने वालों की संख्या 33,800 बताई गई

ये बात सही है कि 85 प्रतिशत करेंसी को एक साथ अमान्य किये जाने के फ़ैसले से करोड़ों लोगों का जीवन प्रभावित हुआ था, लेकिन बीबीसी ने ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं छापी है जिसमें नोटबंदी के फ़ैसले के कारण मरने वालों की संख्या हज़ारों में बताई गई हो.

नोटबंदी के फ़ेल होने पर देश में गुस्सा क्यों नहीं?

भारत में नोटबंदी के कारण लोगों की परेशानियों पर जब हर तरफ रिपोर्ट की जा रही थी, तब बीबीसी संवाददाता जस्टिन रॉलेट ने एक विश्लेषण किया था और ये जानने की कोशिश की थी कि नोटबंदी असफ़ल बताए जाने के बाद भी देश में गुस्सा क्यों नहीं है?

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Image caption बैंकों के बाहर रोज लगती थीं ऐसे कतारें

इस रिपोर्ट में रॉलेट ने लिखा था:

देश की 86 फ़ीसदी करेंसी को चलन से बाहर करने के हैरानी भरे फ़ैसले के तुरंत बाद काफ़ी हंगामा हुआ था.

एक वक़्त ऐसा लगा था कि दुनिया की सातवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के सभी 1.2 अरब लोग बैंकों के बाहर लाइन में खड़े हैं.

नोटबंदी की वजह से कई बिज़नेस ठप पड़ गए, कई ज़िंदगियां तबाह हो गईं. बहुत से लोगों के पास खाने तक के लिए पैसे नहीं थे.

कैश की कमी के चलते लोगों की ज़िंदगी पर वाक़ई बुरा असर पड़ा. माना जाता है कि इस फ़ैसले से क़रीब एक करोड़ लोग बुरी तरह प्रभावित हुए.

अब आप सोचेंगे कि नोटबंदी में लगभग सारा पैसा वापस आने पर भारत के लोग सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएंगे.

लेकिन देश में इस फ़ैसले के ग़लत साबित होने पर गुस्सा क्यों नहीं दिखा?

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इसके कई कारण हैं जिनमें से एक कारण ये भी है कि बहुत से लोगों के लिए पैसों की बड़ी गिनती और डीटेल को समझना मुश्किल है. सीधे तौर पर कहें तो बेकार.

दूसरा बड़ा कारण ये है कि इस फ़ैसले को अमीरों का खजाना खाली करने वाला बताकर मोदी सरकार ने ग़रीबों के बीच पैठ बनाने की कोशिश की.

भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़े भले ही दिखाएं कि इस पॉलिसी से वो हासिल नहीं हुआ जिसकी उम्मीद थी लेकिन असमानता से भरे इस देश में मोदी का संदेश लोगों में असर कर गया.

इसकी एक वजह यह रही कि सरकार को जैसे ही पता चला कि उनकी पॉलिसी उनकी योजना के मुताबिक़ काम नहीं कर रही उन्होंने इसके फ़ायदे दूसरी तरह गिनाने शुरू कर दिए.

शुरुआत में नोटबंदी को ''काला धन'' बाहर निकालने के लिए उठाया गया क़दम बताया गया.

लेकिन इस घोषणा को लागू करने के कुछ ही सप्ताह में यह पता चल गया कि सरकार ने जितना सोचा था, उससे कहीं ज़्यादा पैसा वापस आ रहा है.

इसलिए तुरंत सरकार ने नया आइडिया आज़माया और लोगों को नकद लेन-देन कम करके देश को ''डिजिटल इकोनॉमी'' में मदद करने को कहा.

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नोटबंदी से फ़ायदा या नुकसान?

पीएम नरेंद्र मोदी का पाँच साल का कार्यकाल पूरा होने पर बीबीसी की रियलिटी चेक टीम ने भी एक आंकलन किया है कि मोदी के नोटबंदी के फ़ैसले से भारत को फ़ायदा हुआ या नुक़सान?

इस टीम ने पाया है कि इस फ़ैसले के नतीजे मिले जुले साबित हुए.

नोटबंदी से अघोषित संपत्तियों के सामने आने के सबूत नहीं के बराबर मिले हैं, जबकि इस क़दम से टैक्स कलेक्शन की स्थिति सुधारने में मदद मिली है.

नोटबंदी से डिजिटल लेनदेन बढ़ा है लेकिन लोगों के पास नकद रिकार्ड स्तर तक गिर गया है.

भारतीय रिजर्व बैंक की अगस्त, 2018 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक़ बैन किए नोटों का 99 फ़ीसदी हिस्सा बैंकों के पास लौट आया जिससे ये संकेत मिला कि लोगों के पास जो ग़ैर क़ानूनी संपत्ति होने की बात कही जा रही थी, वो सच नहीं थी और अगर वो सच था तो लोगों ने अपनी गैर क़ानूनी संपत्ति को क़ानूनी बनाने का रास्ता निकाल लिया.

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नोटबंदी से संबंधित एक बड़ा सवाल ये भी रहा है कि क्या नोटबंदी से जाली नोटों पर अंकुश लग पाया?

भारतीय रिज़र्व बैंक के मुताबिक़ ऐसा नहीं हुआ है क्योंकि आरबीआई की ओर से कहा गया था कि बाज़ार में पांच सौ और दो हज़ार रुपये के नए नोट जारी किए गए हैं, उनकी नकल कर पाना मुश्किल होगा, लेकिन भारतीय स्टेट बैंक के अर्थशास्त्रियों के मुताबिक़ इन नोटों की नकल भी संभव है और नए नोटों की नकल किए गए जाली नोट बरामद भी हुए हैं.

एक दावा ये भी किया जाता है कि नोटबंदी के फ़ैसले के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था डिज़िटल होने की ओर ज़रूर अग्रसर हुई. लेकिन भारतीय रिज़र्व बैंक के आंकड़े इस बात की ठोस तस्दीक नहीं करते.

लंबे समय से भारत में कैशलेस पेमेंट की धीरे-धीरे बढ़ोत्तरी देखने को मिल रही थी, लेकिन 2016 के अंत में जब नोटबंदी का फ़ैसला लिया गया था तब इसमें एक बार को उछाल देखने को मिला.

लेकिन इसके बाद फिर ये ट्रेंड अपनी पुरानी रफ़्तार में लौट आया.

जानकार मानते हैं कि समय के साथ कैशलेस पेमेंट में बढ़ोत्तरी की वजह नोटबंदी कम है और आधुनिक तकनीक और कैशलेस पेमेंट की बेहतर होती सुविधा ज़्यादा है.

बहरहाल, नोटबंदी से नकदी का इस्तेमाल कम नहीं हुआ है और तेजी से बढ़ रही दूसरी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में आज भी भारत में सबसे ज़्यादा नकदी का इस्तेमाल हो रहा है.

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