#ManoharParrikar- IIT इंजीनियर, CM से लेकर सर्जिकल स्ट्राइक्स तक

  • 17 मार्च 2019
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गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर का 63 वर्ष की आयु में रविवार को निधन हो गया. पर्रिकर पिछले एक साल से अग्नाशय के कैंसर से पीड़ित थे. उनका इलाज अमरीका के साथ-साथ नई दिल्ली स्थित एम्स और मुंबई के एक निजी अस्पताल में चल रहा था.

मनोहर पर्रिकर के निधन से गोवा के सामाजिक राजनीतिक हालात में बहुत बड़ा असर होगा. वो आईआईटी से पास पहले इंजीनियर थे, जो किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री बने. साथ में गोवा में प्रशासनिक कार्यों पर उनकी छाप अमिट रहेगी.

वो भारतीय जनता पार्टी यानी बीजेपी के ऐसे पहले राजनेता होंगे जिन्होंने ख़ुद को 'सॉफ्ट हिंदुत्व' के आइकन के रूप में आगे रखते हुए सभी समुदायों को शांति का संदेश दिया वो भी ऐसे माहौल में जब उनकी पार्टी देश के दूसरे हिस्सों में हिंदुत्व पर आक्रामक रूप अपनाए हुई थी.

उन्होंने राज्य में धर्मनिरपेक्षता, उदार प्रकृति और अपनी विचारधारा से अधिक इस क्षेत्र के लिए पुनर्निर्माण की राजनीति की, जो संभवत उनके लिए आवश्यक थी. अगर मनोहर पर्रिकर गोवा की बजाय उत्तर प्रदेश में राजनीति करते तो क्या वो वैसे ही उदारवादी राजनेता बन पाते? इस सवाल का जवाब हम नहीं जानते.

सत्ता हर किसी को बदलती है और पर्रिकर भी इससे अछूते नहीं रहे. जब उन्हें गोवा में राजनीतिक गलियारों में सेंध लगाने और अपनी पार्टी की मदद से सरकार गिराने का मौका मिला तो उन्होंने खुद को एक ऐसे महत्वाकांक्षी, लेकिन ईमानदार शख्स के रूप में पेश किया जो राज्य की राजनीति को भ्रष्टाचार और अस्थिरता से मुक्त करने के मिशन में लगा है.

उन्होंने ऐसे वक्त में जब लोगों का राजनीति पर से भरोसा उठता जा रहा था, अपनी व्यक्तिगत हैसियत से आदर्श पेश कर लोगों में भरोसा जगाया. सजग और पढ़े-लिखे मध्य वर्ग ने उन पर दांव लगाया और एक तरह से पर्रिकर उनके नायक बन गए.

पर्रिकर गोवा में बीजेपी के निर्विवाद नेता थे, पार्टी में ऐसा कोई नहीं था, जो उन्हें चुनौती देता. वो बीजेपी के उन चार विधायकों में शामिल थे, जो सबसे पहले बीजेपी के टिकट पर गोवा विधानसभा के लिए चुने गए थे.

मध्यमार्गी छवि

बीजेपी में जितनी कट्टरपंथी आवाज़ें थी उन्हें पर्रिकर ने गोवा की सीमाओं से परे ही रखा. उनकी खुद की छवि धुर दक्षिणपंथी के बजाय मध्यमार्गी राजनेता की रही. पर्रिकर अक्सर कहा करते थे - "ये गोवा बीजेपी है, यहाँ चीज़ें अलग तरह से होती हैं."

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फिर भी वे साल 2014 के चुनावी अभियान में बीजेपी की तरफ़ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर नरेंद्र मोदी जैसी शख्सियत का नाम ज़ोर-शोर से उठाने वाले लोगों में प्रमुख थे. गोवा में बीजेपी की नेशनल एक्ज़िक्यूटिव में मनोहर पर्रिकर ने नरेंद्र मोदी के नाम का प्रस्ताव रखते हुए कहा कि वे प्रधानमंत्री पद के लिए बीजेपी के सबसे बेहतर विकल्प हैं.

इसके अगले दिन गोवा मैरियट होटल की लॉबी में जब मेरी उनसे मुलाकात हुई तो उन्होंने कहा, कुछ कहे जाने की ज़रूरत थी और इसके लिए माकूल वक्त यही था.

नरेंद्र मोदी का नाम बढ़ाने वाली बात का हवाला देते हुए पर्रिकर ने ये कहा था.

राजनीति की इंजीनियरिंग के वे ऐसे बाज़ीगर थे जो धुर विरोधियों को भी एक पाले में लाकर खड़ा कर देने का माद्दा रखते थे. मुख्यमंत्री के तौर पर पहले कार्यकाल में उन्होंने ऐसा करने की कोशिश की थी लेकिन वे इसमें बुरी तरह से नाकाम रहे.

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जीते, लेकिन हाथ लगी असफलता

विपक्ष में पांच साल बिताने के बाद, बीजेपी ने 2012 में गोवा विधानसभा में बहुमत हासिल किया. नतीजे आने के दूसरे दिन सुबह मैं उनसे मिलने गया. वो उस वक्त पणजी के मंडोवी होटल के एक कमरे में आराम कर रहे थे.

टेबल पर चॉकलेट केक था. उन्होंने मुझे केक का एक टुकड़ा दिया और फिर हमारी बातचीत शुरू हुई.

मैंने उन्हें बधाई देते हुए कहा, "आपने इसके लिए सात साल का इंतज़ार किया."

उन्होंने कहा, "शुरू-शुरू में मैं बेहद बेचैन था. मुझे कांग्रेस सरकार को उखाड़ने की कोशिश नहीं करनी चाहिए थी. बाद में मैंने महसूस किया कि समूचा राज्य एक तरह के प्रेशर कुकर में बदल रहा था. मैंने इस दबाव से प्रेशर कुकर के फटने तक का इंतजार किया और फिर मैंने विधानसभा के भीतर और बाहर अपनी कोशिशें शुरू कीं."

उसी रात मुझे एक दिग्गज कांग्रेस नेता का फ़ोन आया. उन्होंने मुझसे कहा, "अगर वो जनता से किए अपने आधे वादे भी पूरे कर देते हैं तो उन्हें अगले 15 साल के लिए मुख्यमंत्री के पद से हटाना मुश्किल होगा."

सत्ता में आने के अगले पांच साल ये देखने वाले थे कि किस तरह एक बड़ा अभियान खड़ा कर सत्ता हासिल की गई और फिर इसकी धज्जियां उड़ा दी गईं. उनके लोकलुभावन वादों ने राज्य को तिगुने क़र्ज़ के बोझ से लाद दिया.

अपने उन सभी वादों पर वो बुरी तरह से विफल रहे जिसके लिए उन्हें जनादेश मिला था.

हालांकि जल्द ही उन्हें इससे छुटकारा भी मिल गया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जिनका पीएम प्रत्याशी के तौर पर पर्रिकर ने अनुमोदन किया था, ने उन्हें रक्षा मंत्री के रूप में अपने मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया.

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दिल्ली में नहीं लगा मन

मोदी ने उन्हें भरोसेमंद सिपहसालार के रूप में दिल्ली बुलाया. लेकिन पर्रिकर दिल्ली में हमेशा अलग-थलग महसूस करते थे. उनको पदोन्नति के रूप में देश का रक्षा मंत्री बनने में दिलचस्पी नहीं थी और जैसे ही उन्हें पहला मौका मिला वो मुख्यमंत्री के रूप में वापस गोवा आ गए.

हालांकि, शुरुआत में रक्षा मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल की सराहना की गई लेकिन उनके उसी कार्यकाल के दौरान ही रफ़ाल डील भी की गई थी. उड़ी सर्जिकल स्ट्राइक से मिले यश के बावजूद वो देश की राजधानी में कभी खुद को व्यवस्थित नहीं कर सके.

क्या यह दिल्ली की राजनीति की निर्मम प्रकृति थी या कि अपने मंत्रालय की कमान को पूरी तरह संभालने में उनकी नाकामी? उन्होंने गोवा वापसी को वरीयता दी.

कांग्रेस ने उन पर हमला करना शुरू किया, दावे किए गए कि रफ़ाल की फाइलें उनके बेडरूम में थीं. उन्होंने आरोपों से इनकार किया.

हालांकि रफ़ाल से जुड़े किसी भी ग़लत काम में पर्रिकर की संलिप्तता कभी साबित नहीं हुई है, लेकिन यह मामला उनके निधन के बाद भी जारी रहेगा.

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बीमारी में भी पद पर रहे

स्थितियां और ख़राब होती गई और बीजेपी 2017 के विधानसभा चुनाव में बहुमत के आंकड़े से दूर रही. फिर बीजेपी ने जल्दबाज़ी दिखाते हुए मनोहर पर्रिकर के अगुवाई में तुरंत जनमत के ख़िलाफ़ गठबंधन बनाकर सरकार बनाई. जबकि उस गठबंधन में शामिल दल वो थे जो बीजेपी विरोध मुद्दे पर चुनाव जीते थे.

वह सत्ता बचाने में तो कामयाब रहे, लेकिन अपने साथियों और काडर का विश्वास गंवा बैठे.

एक बार फिर वो मुख्यमंत्री का कार्यकाल पूरा करने में असफल रहे. ये उनके सभी चार कार्यकालों की एक खास बात रही. हालांकि, इस बार उन्हें ज़िंदगी धोखा दे गई.

बहुत लोग हैरानी जताते हैं कि अपनी आखिरी सांस तक भी वह मुख्यमंत्री के पद पर क्यों बने रहे. वह बीमार थे और उनकी सेहत गिरती जा रही थी. क्या वो अपने अंतिम दिन शांति में अपने परिवार के साथ नहीं बिता सकते थे? वह बिगड़ी सेहत के साथ भी सार्वजनिक तौर पर सामने क्यों आए? क्या वह एक स्वस्थ उत्तराधिकारी के लिए रास्ता नहीं बना सकते थे, जो अपने राज्य के लिए बेहतर काम कर सकता था?

उनकी पार्टी राज्य में कठघरे में खड़ी है. जो शख़्स अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव को गोवा में लेकर आया और जिसने राज्य में सबसे बड़े बुनियादी ढांचे का विकास किया, उसे बेहतर चीजों के लिए जाना जाना चाहिए था.

2012 में, पर्रिकर ने एक साक्षात्कार में मुझसे कहा था कि वह इस कार्यकाल के ख़त्म होने के बाद सक्रिय राजनीति में नहीं रहना चाहेंगे. हालांकि, वह अस्वस्थ होने के बाद भी आखिर तक अपने पद पर बने रहे. वह विरोधाभासों वाले शख़्स थे; एक ऐसा व्यक्ति जिसने गोवा को उम्मीद दी थी और खुद ही इसे छीन भी लिया.

अलविदा पर्रिकर साहब!

(प्रमोद आचार्य पणजी में प्रूडेंट न्यूज़ के संपादक हैं. इस लेख में दिए गए विचार उनके निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है.)

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