लोकसभा चुनाव 2019: क्या पीएम मोदी के लिए 'चौकीदार चोर है’ का नारा देकर फंस गए राहुल गांधी?- नज़रिया

  • 19 मार्च 2019
नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी इमेज कॉपीरइट Getty Images

राजनीति में नारों की बड़ी अहमियत होती है. ये जिताने में अहम भूमिका निभा सकते हैं और उल्टे पड़ जाएं तो गले का पत्थर बन सकते हैं. 'चौकीदार चोर है' का राहुल गांधी का नारा, क्या कांग्रेस और उसके अध्यक्ष के गले का पत्थर बनेगा?

मोदी के 'मैं भी चौकीदार' के देशव्यापी अभियान से तो ऐसे ही संकेत मिल रहे हैं. पर किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए थोड़ा और इंतज़ार करना पड़ेगा.

समय-समय पर लगे राजनीतिक नारों का अध्ययन करें तो ज़्यादातर सकारात्मक नारे ही कामयाब होते हैं. नकारात्मक नारे तभी लोगों की ज़बान से होते हुए दिल में उतरते हैं जब जिसके ख़िलाफ़ नकारात्मक नारा लगा है, उससे लोग बहुत नाराज़ हों.

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साल 1971 में विपक्ष का महागठबंधन बना और उसने नारा दिया 'इंदिरा हटाओ, देश बचाओ'. इंदिरा गांधी ने उसे पलट दिया. कहा, 'मैं कहती हूं 'ग़रीबी हटाओ, वे कहते हैं इंदिरा हटाओ.' इंदिरा गांधी भारी बहुमत से जीतीं.

विपक्ष का गठबंधन का गणित काम नहीं आया. अपने ख़िलाफ़ लगे नारे को पलट देने की क्षमता जनाधार वाले नेता में ही होती है. बशर्ते मतदाता उससे नाराज़ न हों.

1977 के चुनाव में विपक्ष का नारा था- 'इंदिरा का देखो खेल, खा गई चीनी पी गई तेल.' इंदिरा गांधी इसे पलट नहीं पाईं. क्योंकि लोग इमर्जेंसी की ज़्यादतियों के कारण उनसे नाराज़ थे.

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'मुसलमान' और 'ईसाई' होने के बीच बराक ओबामा

अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा जब सीनेटर चुने गए तब से 2008 में राष्ट्रपति चुने जाने तक उनके विरोधियों ने प्रचार किया कि ओबामा मुसलमान हैं. राष्ट्रपति का पहला कार्यकाल ख़त्म होते होते ओबामा की लोकप्रियता में थोड़ी कमी आई तो यह अभियान फिर से और ज़ोर से चलने लगा.

साल 2010 में ओबामा भारत आए तो अमृतसर भी जाना चाहते थे. पर उनके सलाहकारों ने समझाया कि स्वर्ण मंदिर जाएंगे तो सिर पर पटका पहनना पड़ेगा. आपके विरोधी उस तस्वीर का इस्तेमाल करेंगे कि देखो यह मुसलमान है.

2012 में चुनाव अभियान के दौरान ओबामा बार-बार सफ़ाई देते रहे कि वो मुसलमान नहीं हैं. फिर उनके सलाहकारों ने मानव व्यवहार के जानकारों से बात की. उन्होंने सलाह दी कि ओबामा खंडन या सफ़ाई देना बंद करें. क्योंकि बार-बार सफ़ाई देने से संदेह होता है कि कुछ तो है.

ऐसे मुद्दे के लंबे समय तक चर्चा में रहने से लोगों की याद में यह बात बनी रहती है. वो सकारात्मक बात बोलें. फिर ओबामा ने कहना शुरू किया कि वे ईसाई हैं. मुसलमान का मुद्दा अपने आप ठंडा पड़ गया.

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'मौत का सौदागर', 'नीच' और 'चायवाले' से किसे फ़ायदा हुआ?

पता नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ऐसे किसी विशेषज्ञ की सलाह मिली है या नहीं लेकिन वो ऐसा एक नहीं कई बार कर चुके हैं.

साल 2007 के गुजरात विधानसभा चुनाव में सोनिया गांधी ने उन्हें 'मौत का सौदागर' कहा. सोनिया गांधी और कांग्रेस को इसका आजतक अफ़सोस होगा. अपनी तरफ़ आने वाले तीर को विपक्षी की तरफ़ मोड़ देने की प्रधानमंत्री में अद्भुत क्षमता है.

पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर की 'चायवाला' और प्रियंका वाड्रा के 'नीच' शब्द को उन्होंने किस तरह कांग्रेस के ख़िलाफ़ हथियार बना लिया, यह सबको पता है.

साल 2013 में जब भाजपा ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया तो मीडिया और राजनीतिक हलक़ों में गुजरात दंगों में उनकी कथित भूमिका एक बार फिर विमर्श के केंद्र में आ गई. मोदी और भाजपा सफ़ाई देते रहे कि कुछ साबित नहीं हुआ.

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गुजरात के दंगे बनाम गुजरात मॉडल

एसआईटी की जांच में कुछ नहीं निकला. सुप्रीम कोर्ट से क्लीन चिट मिल चुकी है. पर किसी सफ़ाई का कोई असर नहीं हो रहा था. उसके बाद मोदी के रणनीतिकारों ने इस मुद्दे पर सफ़ाई देना छोड़कर विकास के गुजरात मॉडल का मुद्दा ज़ोरशोर से उठाया.

इसके बाद गुजरात दंगे का मुद्दा उठाने वाले उसे छोड़कर यह साबित करने में लग गए कि गुजरात मॉडल में कैसे झोल ही झोल है.

गुजरात के मुख्यमंत्री और पिछले पांच साल से प्रधाननमंत्री के रूप में मोदी के कार्यकाल को देखें तो एक बात स्पष्ट रूप से समझ में आती है कि मोदी अपने ख़िलाफ़ कही गई बात पर आम तौर से तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं देते. वो तोलमोल के बोलते हैं. आरोपों या नकारात्मक बातों का वे सकारात्मक बात या काम से जवाब देते हैं.

राहुल गांधी ने जनवरी, 2015 में मोदी सरकार पर 'सूट-बूटकी सरकार' का आरोप लगाया था. उनके उस मशहूर सूट के कारण यह नारा सरकार पर चिपक गया.

मोदी और पार्टी की ओर से किसी सफ़ाई से बात बन नहीं रही थी. तो मोदी ने सरकार की नीतियों की दिशा ही मोड़ दी. समाज के वंचित वर्गों के लिए योजनाओं की झड़ी लगा दी. अब 'सूट-बूट की सरकार' की बात कांग्रेस भी नहीं करती.

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चौकीदार चोर है vs मैं भी चौकीदार!

कुछ महीने पहले राहुल गांधी ने 'चौकीदार चोर है' का नारा दिया. इसके लिए उन्होंने रफ़ाल लड़ाकू विमान की ख़रीद का मुद्दा उठाया.

चौकीदार (मोदी) को चोर बताने के लिए उन्हें पांच साल में एक मुद्दा मिला. लेकिन उस मुद्दे पर वो भी मोदी या उनके किसी मंत्री पर रिश्वत का आरोप नहीं लगा पाए.

सिर्फ़ एक बात दुहराते रहते हैं कि अनिल अंबानी को 30 हज़ार करोड़ रुपए दे दिए. यह जानते हुए भी जिस ऑफ़सेट क्लॉज़ में वे 30 हज़ार करोड़ मिलने की बात करते हैं, वो ग़लत है. इसमें 80 से ज्यादा कंपनियां हिस्सेदार हैं. फिर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले और सीएजी की रिपोर्ट ने उनके आरोप को और कमज़ोर कर दिया.

मोदी इंतज़ार करते रहे. यह देखते रहे कि राहुल गांधी के इस नारे का कितना असर हो रहा है. जब लगा कि मुद्दा ज़ोर नहीं पकड़ रहा तो शनिवार को 'मैं भी चौकीदार' का अभियान सोशल मीडिया पर शुरू कर दिया. थोड़ी ही देर में यह ट्विटर पर पहले नम्बर पर ट्रेंड करने लगा. उन्होंने ट्विटर हैंडल पर अपना नाम भी बदलकर 'चौकीदार नरेंद्र मोदी' कर दिया.

इस पूरे अभियान में उन्होंने कहीं भी राहुल गांधी के आरोप का ज़िक्र नहीं किया. देश के लोगों से कहा कि वे अपने आस पास गंदगी, अन्याय और दूसरी सामाजिक बुराइयों को रोकने के लिए चौकीदार बनें. पिछले लोकसभा चुनाव में 'चायवाला' मुद्दा बना तो इस बार 'चौकीदार' को मुद्दा बनाने की मुहिम शुरु हो गई है.

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सार्वजनिक जीवन में कोई भी आरोप राजनीतिक फ़ायदा तब देता है, जब वह चिपके. आरोप चिपके इसके लिए ज़रूरी है कि आम लोगों को उस पर विश्वास हो.

साथ ही आरोप लगाने वाले की विश्वसनीयता भी बहुत अहम होती है. भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस की विश्वसनीयता लोगों की नज़र में बहुत कम है, यह कहना ग़लत नहीं होगा.

इसके अलावा इतने लंबे सार्वजनिक जीवन में मोदी भ्रष्टाचार के मामले में लगभग बेदाग़ रहे हैं. उनकी सरकार की तमाम कमियों के आरोप पर तो लोग भरोसा कर सकते हैं लेकिन मोदी भ्रष्ट हैं, इस बात पर उनके विरोध में वोट देने वाले भी शायद ही भरोसा करें. शायद यही वजह है कि दूसरे विपक्षी दल इस मुद्दे पर कांग्रेस का साथ देने की रस्म अदायगी से आगे नहीं बढ़े.

(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है.)

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