मनोहर पर्रिकर की वो आख़िरी तमन्ना जो अधूरी रह गई

  • 18 मार्च 2019
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गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर गोपालकृष्ण प्रभु पर्रिकर के निधन के बाद गोवा का कौन मुख्यमंत्री बनेगा इस पर अभी काफ़ी संशय बना हुआ है.

उनकी मौत के साथ ही इस छोटे से राज्य में गठबंधन सरकार पर भी संकट के बादल घिर आए हैं.

पर्रिकर केंद्रीय रक्षा मंत्री के पद से मार्च 2017 में इस्तीफ़ा दे चौथी बार गोवा के मुख्यमंत्री बनकर अपने गृह राज्य लौट गए थे.

हालांकि अभी इस बात पर अटकलें लग रही हैं कि उनके बाद राज्य का मुख्यमंत्री कौन होगा लेकिन पर्रिकर ने पहले ही घोषित कर दिया था कि ये उनका अंतिम कार्यकाल है और आगे से चुनाव नहीं लड़ेंगे.

उन्होंने एक टीवी चैनल से एक बार कहा था, "मैं अपनी ज़िंदगी के अंतिम 10 साल ख़ुद के लिए जीना चाहता हूं. मैंने राज्य को काफ़ी कुछ वापस दिया है. मैं इस कार्यकाल के बाद मैं चुनाव लड़ने या चुनाव का हिस्सा नहीं बनूंगा, चाहे पार्टी की ओर से कितना ही दबाव आए."

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लेकिन पर्रिकर की ये ख़्वाहिश अधूरी ही रह गई और शाम पांच बजे उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा. केंद्र सरकार ने उनके निधन पर राष्ट्रीय शोक की घोषणा की है.

हालांकि राज्य की राजनीति से वो दो साल अलग रहे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील पर वो केंद्र में रक्षा मंत्री बनना स्वीकार किया था.

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1989 में 1% भी नहीं मिला था बीजेपी को वोट

मापुसा में गौर सारस्वत ब्राह्मण परिवार में जन्मे पर्रिकर शुरुआती जीवन में ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ गए थे.

उन्होंने आईआईटी बॉम्बे से मैटलर्जी में डिग्री हासिल की और गोवा में ही उन्होंने न्यूमेटिक पंप बनाने वाली फैक्ट्री खोली.

1980 के दशक में जब बीजेपी गोवा को लेकर गंभीर हुई तो उसने संघ से कुछ कैडर मांगे. संघ ने पर्रिकर और लक्ष्मीकांत पारसेकर को बीजेपी में भेजा.

1961 में पुर्तगालियों से आज़ाद होने के बाद से ही गोवा में महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (एमजीपी) का शासन था, जिसका वहां की पिछड़ी जातियों में काफ़ी मज़बूत जनाधार था.

लक्ष्मीकांत पारसेकर का परिवार भी एमजीपी का कट्टर समर्थक था, लेकिन पारसेकर ने अलग रास्ता चुना.

1989 में बीजेपी चुनाव में गई तो उसे एक प्रतिशत से भी कम वोट मिले.

लेकिन राजनीतिक सूझबूझ और सांगठनिक कौशल के बूते एक दशक में ही पर्रिकर ने पार्टी को सत्ता में लाने में अहम भूमिका निभाई.

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खनन और कैसिनो का मुद्दा

साल 2000 में वो पहली बार मुख्यमंत्री बने. इससे कुछ ही दिन पहले ल्यूकीमिया से पीड़ित अपनी पत्नी को खो दिया था.

एक ईमानदार छवि और कड़ी मेहनत करने वाले राजनेता के रूप में उनकी छवि प्रशासन में सुधार लाने में काफ़ी मददगार साबित हुई.

आधी बांह की शर्ट और पैरों में सैंडल उनकी सादगी की प्रतीक बन गई. लेकिन इन सबसे अहम थी उनकी चुपचाप काम करने की शैली.

इस दौरान सड़कें बनीं, पानी और बिजली की आपूर्ति में सुधार हुआ और इन शुरुआती सालों में उनके पसंदीदा सामाजिक कल्याण की कई योजनाओं की शुरुआत हुई.

लेकिन विपक्ष में रहते हुए भी उन्होंने कांग्रेस नीत दिगम्बर कामत की सरकार को मांडवी नदी में कैसिनों के सवाल पर बैकफुट पर आने को मज़बूर किया.

राज्य में अवैध खनन का मुद्दा बनाना हो या अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों को सरकारी अधिक अनुदान देने का मामला हो पर्रिकर ने जनता से जुड़ी समस्याओं को मुद्दा बनाया.

आख़िरकार 2012 में खनन मामले में जीत हासिल हुई. कोर्ट ने इस पर बैन लगा दिया. लेकिन इस बीच कैसिनों का मुद्दा बना रहा.

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आडवाणी के साथ रिश्ते

लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव से ठीक पहले 2013 में पर्रिकर का नाम सुर्खियों में आया जब उन्होंने पार्टी के सम्मेलन में असमंजस की शिकार राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सामने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम चुनाव प्रमुख के रूप में आगे प्रस्तावित कर दिया.

हालांकि उस समय नरेंद्र मोदी का चुनाव प्रचार अभियान का मुखिया बनाए जाने को लेकर लालकृष्ण आडवाणी की ओर से काफ़ी विरोध था.

लेकिन पर्रिकर और आडवाणी के रिश्ते भी बहुत अच्छे नहीं थे. 2009 में पर्रिकर ने आडवाणी के बारे में कहा था कि वो 'बासी' और 'सड़ता हुआ अचार' हैं जिनकी 'राजनीतिक पारी कमोबेश ख़त्म' हो चुकी है.

ये बात उन्होंने कोंकणी भाषा के न्यूज़ चैनल से कही थी. उनका कहना था कि अब नई उम्र के लोगों को नेतृत्व में आने देना चाहिए.

बहरहाल, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी केंद्र की सत्ता में आई.

बीजेपी नीत एनडीए सरकार के सत्तारूढ़ होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मनोहर पर्रिकर को गोवा का मुख्यमंत्री पद छोड़कर कैबिनेट में शामिल करने का ऑफ़र दिया.

उन्हें रक्षा मंत्री का कार्यभार संभालने को कहा गया. कैबिनेट में एक ऐसे भरोसेमंद चेहरे की ज़रूरत थी जो लंबे समय से अधर में लटके मंत्रालय के कई मुद्दों का जल्द निपटारा कर सके.

एक कट्टर राष्ट्रवादी पर्रिकर इस भूमिका के लिए फिट थे.

रक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने सबसे पहले रक्षा सामानों की ख़रीद प्रक्रिया को आसान बनाने का काम किया.

जब पर्रिकर केंद्र में चले आए तो गोवा में उनकी जगह पारसेकर को मुख्यमंत्री बनाया गया लेकिन उसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी को भारी नुक़सान हुआ.

बीजेपी को 2017 के विधानसभा चुनाव में केवल 13 सीटें मिल पाईं. पर्रिकर के बिना बीजेपी को जनता का बहुत समर्थन नहीं मिल पाया.

पर्रिकर नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए राज्य में लौट आए और परस्पर विरोधी हितों वाली पार्टियों का एक बेमेल गठबंधन हुआ.

और इस गठबंधन को जोड़े रखने का एक मात्र कारण पर्रिकर दिखाई दे रहे थे.

पिछले साल फ़रवरी में जब उन्हें अचानक अस्पताल में भर्ती कराया गया, तभी से लोग अटकलें लगा रहे थे कि उनकी जगह कौन लेगा.

जब तक वो ज़िंदा थे, एक बात तो साफ़ थी कि उनकी जगह कोई नहीं ले सकता.

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