समझौता ट्रेन ब्लास्ट: क्या जांच एजेंसी पर दवाब था?

  • 23 मार्च 2019
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छब्बीस भारतीय और 42 पाकिस्तानी परिवारों को 12 सालों से इस फ़ैसले का इंतज़ार था - लेकिन विशेष अदालत ने 2007 समझौता ट्रेन बलास्ट केस में किसी को मुजरिम नहीं पाया और आतंकवाद और दूसरे बड़े मामलों की जांच को बनाई गई राष्ट्रीय जांच एजेंसी मक्का मस्जिद, अजमेर धमाका मामलों के बाद एक और केस साबित करने में नाकाम रही.

कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने सवाल उठाया, "68 लोग मारे गए, एनआईए ने आठ लोगों को अभियुक्त बनाया पर फ़ैसले के बाद लग रहा है कि कोई नहीं जानता कि 68 लोगों के क़त्ल का दोषी कौन है."

आम लोगों में भी कईयों से ऐसी ही प्रतिक्रियाएं आईं, जिनमें एनआई की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए गए थे.

एजेंसी का पक्ष

पंचकुला अदालत में एनआईए के वकील आरके हांडा ने बीबीसी से कहा. "जब तक समझौता केस एजेंसी के पास आया था, तब तक घटना को हुए तीन साल बीत चुके थे, बहुत सारे सबूत गडमड हो गए थे और गवाह बाद में मुकर गए."

दिल्ली से अटारी जा रही समझौता एक्सप्रेस ट्रेन के दो डिब्बों में 18 फ़रवरी, 2007 हरियाणा के पानीपत के पास हुए धमाकों की जांच पहले रेलवे और स्थानीय पुलिस ने की और फिर मामला 2010 में एनआईए को सौंप दिया गया था.

समझौता एक्सप्रेस धमाका मुकदमा में एनआईए की पैरवी कर रहे आरके हांडा ने ऐसा बीबीसी के उस सवाल के जवाब में कहा जिसमें स्पेशल जज जगदीप सिंह की उस टिपण्णी पर उनकी प्रतिक्रिया पूछी गई थी कि अभियोजन पक्ष (जांच एजेंसी) केस साबित करने में नाकाम रही.

हालांकि फ़ोन पर हुई बातचीत के दौरान एनआईए के वकील ने साफ़ किया कि किसी भी मुक़दमे की तरह इस मामले का भी दो पक्ष था: एक घटना को लेकर हुई जांच और दूसरा अदालत में पेश किए गए सबूत.

पर वरिष्ठ पत्रकार भारत भूषण कहते हैं कि "एनआईए का काम इस सरकार के अंदर यही हो गया है कि हिंदूत्व आंतकवाद से जुड़े केसों को कमज़ोर किया जाए उन्हें छुड़वाया जाए, मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज किए गए इक़बालिया बयानों को वापिस लिया गया."

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".. साध्वी प्रज्ञा की तो फ़ाइल ही ग़ायब हो गई."

पुलिस द्वारा लिए बयान के विपरीत मैजिस्ट्रेट के सामने दर्ज किए गए बयान अदालत में मान्य हैं

2008 मालेगांव ब्लास्ट के गवाहों की फ़ाइल गायब होने की ख़बर चंद सालों पहले काफ़ी चर्चा में रही थी, जिस मामले में अदालत ने कड़ा रूख़ भी अपनाया था.

महाराष्ट्र के मालेगांव में हुए धमाके मामलों में अभियुक्त रही साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित फ़िलहाल ज़मानत पर बाहर हैं.

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एजेंसी पर दवाब

तो क्या एनआईए को एक के बाद दूसरी जांच में मिली असफ़लता एजेंसी में योग्यता और क्षमता की कमी की वजह से है?

इस सवाल के जवाब में सीबीआई के पूर्व संयुक्त निदेशक एनके सिंह कहते हैं ऐसा नहीं है "बल्कि ऐसे लोगों को काम में लगाया जा रहा है जो उसी दिशा में जांच करें, उलट-फेर करें."

एनआईए की वकील रह चुकीं रोहिनी सालियान ने आरोप लगाया था कि केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार के बनने के बाद कुछ अधिकारी उनपर दबाव बना रहे हैं कि वो "हिंदूत्व आतंकवाद से जुड़े मामलों में थोड़ा धीमापन अपनाएं."

एनआईए के प्रमुख शरद कुमार को रिटायरमेंट के बाद जब मुख्य सतर्कता का पद दिया गया था तो कई तरफ़ सवाल उठे थे.

भारत भूषण कहते हैं कि इस तरह के मामले ज़्यादा आगे बढ़ेंगे तो बहुत सारे चेहरे बेनक़ाब होंगे, इसलिए इन्हें दबा देना ही बेहतर है.

2008 के अंत में तैयार किए गए एनआईए ने अपनी वेबसाइट पर कहा है कि उसके पास जो केस दर्ज हैं उनमें कामयाबी का औसत 91 फ़ीसद है.

एनआईए के खाते केरल के नामी हदिया केस भी आया था जिसमें आरोप लगाया गया था कि एक हिंदू महिला को एक मुस्लिम पुरुष ने इस्लाम के विस्तार के इरादे से प्यार का आश्वासन देकर शादी किया.

एजेंसी को ये मामला सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सौंपा गया था जिसमें उसने अपनी रिपोर्ट में ऐसी किसी बात से इंकार किया था.

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