लोकसभा चुनाव 2019: गांधीनगर में बीजेपी को हराना इतना मुश्किल क्यों

  • 23 मार्च 2019
अमित शाह, लाल कृष्ण आडवाणी, लोकसभा चुनाव 2019 इमेज कॉपीरइट PTI

अगर गुजरात हिंदुत्व की प्रयोगशाला है तो गांधीनगर इस प्रयोगशाला का एक उदाहरण.

गांधीनगर की राजनीति ने हिंदुत्व के नाम पर मतों के ध्रुवीकरण के प्रयोग को देखा है. इस सीट पर अब लाल कृष्ण आडवाणी की जगह अमित शाह चुनाव लड़ेंगे यानी पुराने ब्रैंड की जगह हिंदुत्व के नए ब्रैंड ने ले ली है.

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गुजरात पर नज़र रखने वाले जाने माने रिसर्चर शारिक लालीवाला बताते हैं कि गांधीनगर की सीट पर हुआ बदलाव, हिंदुत्व की राजनीति के पुराने ब्रैंड से हिंदुत्व की राजनीति के नए ब्रैंड की ओर हुआ बदलाव है. वो कहते हैं कि अमित शाह हिंदुत्व की राजनीति के कहीं ज़्यादा कट्टर और आक्रामक ब्रैंड हैं.

शारिक लालीवाला मानते हैं कि अमित शाह और नरेंद्र मोदी का हिंदुत्व लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी के हिंदुत्व से अलग है. वे कहते हैं, "शाह-मोदी ने भले हिंदुत्व में लिपटे विकास का आइडिया दिया हो लेकिन सच्चाई यह है कि ये हिंदुत्व के पुराने ब्रैंड की तुलना में कहीं ज़्यादा आक्रामक हैं."

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वाजपेयी-आडवाणी की रही है सीट

गांधीनगर लोकसभा सीट पर 1989 से ही एकतरफा मुक़ाबला देखने को मिला है, बीजेपी के उम्मीदवार यहां से बड़े अंतर से लोकसभा पहुंचते रहे हैं.

यह एक तरह से वीआईपी सीट रही है, यहां से अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और शंकर सिंह वाघेला (जब वे बीजेपी में थे) चुनाव जीतते रहे. 1998 के बाद से यहां से आडवाणी आसानी से चुनाव जीतते आए हैं.

इस लोकसभा सीट पर सबसे ज़्यादा यानी करीब 2.50 लाख वोट पाटीदार समुदाय का है, 1.40 लाख वैश्य मतदाता है, 1.30 लाख ठाकोर मतदाता हैं जबकि 1.88 लाख दलित मतदाता हैं.

गांधीनगर लोकसभा सीट पर गांधीनगर (उत्तर), कालोल, सानंद, घटलोदिया, वेजालपुर, नरनपुरा और साबरमती विधानसभा सीटें हैं.

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मौजूदा समय में गांधीनगर (उत्तर) को अगर छोड़ दें तो सभी विधानसभा सीटें बीजेपी के पास हैं. गांधीनगर (उत्तर) से कांग्रेस के डॉ. सीजे चावड़ा विधायक हैं. माना जा रहा है कि चावड़ा अमित शाह के ख़िलाफ़ संभावित उम्मीदवार हो सकते हैं.

अमित शाह ने अपना राजनीतिक करियर इसी सीट से शुरू किया था. 2008 में हुए परिसीमन से पहले अमित शाह सरखेज विधानसभा से चुनाव लड़ते थे.

अमित शाह का पारिवारिक घर नरनपुरा में प्रगति गार्डेन के पास था. 2008 में हुई परिसीमन में सरखेज को तीन विधानसभा सीटों में बांट दिया गया- नरनपुरा, घाटलोदिया और वेजालपुर. अमित शाह इसके बाद 2012 में नरनपुरा से विधानसभा का चुनाव लड़े और जीत हासिल की. 2017 में शाह गुजरात से राज्य सभा का चुनाव जीतकर संसद पहुंचे.

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बीजेपी का पलड़ा क्यों भारी?

राजनीतिक विश्लेषक हेमंत शाह का मानना है कि इस बात में कोई शक नहीं है कि गांधीनगर लोकसभा सीट पर कांग्रेस की तुलना में बीजेपी का पलड़ा भारी है.

वह बताते हैं कि अगर बीजेपी यहां अच्छा नहीं कर पाती तो इसका मतलब ये होगा कि वह राज्य के दूसरे हिस्सों भी अच्छा करने में सक्षम नहीं है. दरअसल गांधीनगर को राज्य के सबसे प्रभावशाली लोगों का क्षेत्र माना जाता है, जिसका राज्य के दूसरे हिस्सों के मतदाताओं पर खासा असर दिखता है.

हेमंत शाह कहते हैं, "बीजेपी के मतदाताओं को समझने के लिए, आपको गांधीनगर की सीट के बारे में जानना चाहिए क्योंकि यह क्षेत्र बीजेपी के कोर मतदाताओं का है."

इस क्षेत्र में एक ओर अहमदाबाद के पश्चिमी हिस्से का शहरी मतदाता वर्ग है तो दूसरी तरफ गांधीनगर सिटी के लोग हैं.

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वेजालपुर, घाटलोदिया और नरनपुरा, शहर के पश्चिमी हिस्से हैं जहां मूल रूप से अर्बन मिडिल क्लास आबादी रहती है.

गांधीनगर लोकसभा सीट के ग्रामीण इलाके सानंद और गांधीनगर (उत्तर) में आते हैं जो धीरे-धीरे अब सेमी अर्बन इलाके में बदल चुके हैं. यहां के आम मतदाता मिडिल क्लास है.

सानंद और घाटलोदिया विधानसभा सीटों पर बड़ी संख्या में अपर मिडिल क्लास मतदाता हैं.

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Image caption शंकर सिंह वाघेला गांधीनगर सीट से जीतने वाले पहले बीजेपी प्रत्याशी थे

गांधीनगर पिछले 30 सालों से बीजेपी के पास

बीजेपी भी मानती है कि गांधीनगर उसके लिए सुरक्षित सीट है. बीजेपी के प्रवक्ता भरत पांड्या बताते हैं कि गांधीनगर में कोई मुक़ाबला ही नहीं है.

पांड्या के मुताबिक अमित शाह पार्टी के मुख्य रणनीतिकार हैं, ऐसे हैं जब वे यहां से चुनाव लड़ रहे हैं तो कार्यकर्ताओं और नेताओं में जबरदस्त उत्साह है, वो दोगुने उत्साह से चुनाव प्रचार में जुटेंगे.

पांड्या ये भी याद दिलाते हैं कि अतीत में इस लोकसभा की विधानसभा सीटों पर कांग्रेस का प्रदर्शन कितना ख़राब रहा है.

ऐसे में विधानसभाओं की तस्वीर को देखना चाहिए, जिससे बीजेपी को बढ़त मिली हुई दिख रही है.

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गांधीनगर सीट

गांधीनगर लोकसभा सीट में गांधीनगर (उत्तर), कालोल, सानंद, घाटलोदिया, वेजालपुर, नरनपुरा और साबरमती की विधानसभा सीटें हैं.

गांधीनगर (उत्तर): कांग्रेस के डॉ. सीजे चावड़ा यहां के विधायक हैं. वे महज 5500 से मतों से इस सीट पर चुनाव जीतने में कामयाब हुए थे. यह विधानसभा सीट 2007 में गांधीनगर सीट की परिसीमन के बाद अस्तित्व में आया है.

कालोल: गांधीनगर ज़िले का ये इलाका तेज़ी से विकसित हो रहा अर्बन इलाका है. बीजेपी के सुमन प्रवीणसिंह चावड़ा ने यहां कांग्रेस के प्रद्युम्न सिंह परमार को 49 हज़ार से भी ज़्यादा मतों से हराया.

बीजेपी इस विधानसभा सीट पर 1995 से चुनाव नहीं हारी है. 2007 को छोड़ दें तो, बीजेपी इस सीट पर बड़े अंतर से चुनाव जीतती रही है. 2007 में उसे महज दो हज़ार वोटों से जीत मिली थी.

साबरमतीः पिछले 22 सालों के दौरान 2001 के उपचुनाव को छोड़ कर, बीजेपी साबरमती विधानसभा सीट पर 1995 के बाद से कोई चुनाव नहीं हारी है. 2017 में कहा जा रहा था कि बीजेपी का इस सीट पर अच्छा प्रदर्शन नहीं रहेगा तब बीजेपी के उम्मीदवार अरविंद पटेल को 1,13,503 वोट मिले थे, उनके सामने कांग्रेसी उम्मीदवार को महज 44,693 वोट मिल पाए थे.

घाटलोदियाः यह विधानसभा सीट 2012 में अस्तित्व में आयी और इसे बीजेपी के लिए एक सुरक्षित सीट माना जाता है. 2012 में इस सीट से गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल चुनाव जीतने में कामयाब हुई थीं जबकि 2017 में बीजेपी के ही भूपेंद्र पटेल यहां से चुनाव जीते.

नरनपुराः यह भी 2008 के परिसीमन के बाद ही अस्तित्व में आयी और यहां 2012 में पहली बार विधानसभा चुनाव हुए. बीजेपी के अमित शाह ने कांग्रेस के नितिन पटेल को 63,335 मतों से हराया था.

सानंदः यह एक ऐसी सीट है जहां बीजेपी और कांग्रेस के बीच मुक़ाबला दिखता है. अभी यह सीट बीजेपी के पास है लेकिन कांग्रेस यहां चुनाव जीतने जीतने की स्थिति में थी. 2012 में कांग्रेस के करमसिंह कोली पटेल ने यहां चुनाव जीता था.

वेजालपुरः यह ऐसी विधानसभा सीट है जहां बीजेपी के मतदाताओं की संख्या ज़्यादा है. 2008 में हुए परिसीमन में बनी इस सीट पर बीजेपी का ही कब्जा रहा है.

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कांग्रेस की कैसी तैयारी?

शरीफ़ लालीवाला जैसे शोधकर्ताओं की मानें तो कांग्रेस को गांधीनगर सीट जीतने की उम्मीद में तो समय खर्च करना चाहिए और ना ही संसाधन लगाना चाहिए, क्योंकि मौजूदा परिस्थितियों में उसके लिए यह सीट जीतना नामुमकिन ही है. लेकिन राजनीतिक विश्लेषक हेमंत शाह की राय इससे उलट है.

वे कहते हैं, "अगर यह सीट बीजेपी के लिए इतनी ही सुरक्षित है तो यहां से अमित शाह को क्यों चुनाव लड़ना पड़ रहा है. अगर कांग्रेस उम्मीदवार चुनने में कोई ग़लती नहीं करे और लोगों तक पहुंचने के लिए सही रणनीति लगाए तो फिर कांग्रेस ये सीट जीत सकती है."

कुछ राजनीतिक विश्लेषकों को भले उम्मीद हो कि कांग्रेस यहां बीजेपी को टक्कर दे सकती है लेकिन कांग्रेस के नेता इस सीट के लिए अपनी रणनीति तक तैयार नहीं कर पाए हैं.

वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मधुसूदन मिस्री ने बीबीसी गुजराती से बताया, "मैं गांधीनगर सीट के लिए उम्मीदवार शॉर्ट लिस्ट करने की प्रक्रिया का हिस्सा नहीं हूं. लेकिन मैं आपको ये बता सकता हूं कि कांग्रेस यहां जातिगत समीकरणों को ध्यान में रखकर अपने उम्मीदवार उतारेगी."

मिस्री ये भी बताते हैं, "गांधीनगर से कुछ नामों को शॉर्ट लिस्ट किया गया है, ऐसा लगा रहा है कि पार्टी यहां से किसी ठाकोर को टिकट दे सकती है."

वहीं कांग्रेसी नेता अर्जुन मोडवाडिया कहते हैं कि गांधीनगर सीट पर कांग्रेस जोरदार मुक़ाबले की स्थिति में होगी और जल्दी ही उपयुक्त उम्मीदवार का फ़ैसला कर लिया जाएगा.

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Image caption सुरेश जाधव सानंद से मतदाता हैं

गांधीनगर के वोटर क्या कहते हैं?

सानंद में रहने वाले 52 साल के सुरेश जाधव गांधीनगर के ग्रामीण इलाके से मतदाता हैं. बीबीसी गुजराती से बात करते हुए उन्होंने बताया कि कांग्रेस के पास कार्यकर्ताओं और नेताओं का अभाव है जो लोगों के बीच जाकर उनकी समस्याओं की बात करता. वे कहते हैं, "मैं बेरोज़गारी झेल रहा हूं. मुझे नौकरी से निकाल दिया गया. मैं नौकरी की तलाश में हूं, लेकिन ऐसे मुद्दे चुनाव में कहीं नहीं टिकते क्योंकि बीजेपी की नीतियों और उनके वादों को लेकर उनसे सवाल जवाब करने वाला कोई है नहीं."

वहीं 50 साल के आसिफ पठान जुहापुरा में एक निजी स्कूल के प्रिंसिपल हैं. वे कहते हैं अमित शाह जीतें या हारें, उससे जुहापुरा के लोगों पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

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Image caption आसिफ पठान

वे बताते हैं, "लालकृष्ण आडवाणी हमारे सांसद थे, लेकिन उन्होंने कभी हमारे इलाके का दौरा नहीं किया. मुझे नहीं लगता है कि उम्मीदवार बदलने से हमारे जीवन पर कुछ असर होगा."

बीबीसी गुजराती से बात करते हुए घाटलोदिया के शहरी इलाके से रमेश देसाई कहते हैं कि लोगों को अगर मुश्किल हो तो अपने सांसद से मिलना चाहिए.

वे कहते हैं, "मैंने कभी आडवाणी को नहीं देखा. लेकिन मुझे उन्हें देखने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी क्योंकि बीजेपी के लोग और स्थानीय नेता हमलोगों के लिए दिन रात काम करते रहे हैं."

रमेश देसाई इस चुनाव की उम्मीदों पर बताते हैं, "मुझे उम्मीद है कि बीजेपी इस बार इस सीट पर बड़े अंतर से जीत हासिल करेगी."

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गांधीनगर लोकसभा सीट का इतिहास

चुनाव आयोग के मुताबिक 2014 के आम चुनाव के वक्त गांधीनगर लोकसभा के तहत 17,33,972 मतदाता थे. बीते चुनाव में 65.15 प्रतिशत लोगों ने अपने वोट का इस्तेमाल किया.

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इस सीट से कब कौन जीता?

1967-71: कांग्रेस यानी आईएनसी

1971-71: कांग्रेस यानी आईसी

1977-80: भारतीय लोकदल

1980-84: कांग्रेस यानी आईएनसी

1984-89: कांग्रेस यानी आईएनसी

1989-91: बीजेपी (शंकर सिंह वाघेला)

1991-96: बीजेपी (लाल कृष्ण आडवाणी)

1996: बीजेपी (अटल बिहारी वाजपेयी)

1996-98: बीजेपी (विजय पटेल)

1998 से लेकर 2019 तक: बीजेपी (लालकृष्ण आडवाणी)

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