पाकिस्तान हाईकमीशन में भारतीय सिक्योरिटी का 'विजिलांती व्यवहार': ब्लॉग

  • 23 मार्च 2019
दिल्ली स्थित पाकिस्तान का दूतावास इमेज कॉपीरइट Rajesh Joshi

जैसे ही टैक्सी रुकी सादे कपड़ों वाले चार पाँच लोगों ने हमें घेर लिया. उन्होंने अपना परिचय दिए बिना हमसे हमारा नाम, काम, पता-ठिकाना सब जान लेना चाहा.

सड़क पर इतनी कम रोशनी थी कि हमें घेरकर हमारी जन्मकुंडली जानना चाह रहे लोगों ने हमारे चेहरे देखने के लिए अपने मोबाइल की टॉर्च जला रखी थी. उनके चेहरे देख पाना नामुमकिन था. उनमें से एक के हाथ में वीडियो कैमरा था और वो सबूत इकट्ठा करने वाली मुस्तैदी से हमारी वीडियो फ़िल्म उतारने में लगा था.

ये पढ़ते हुए आपको लग सकता है कि मैं किसी 'गोरक्षक' विजिलांती ग्रुप के हाथों पड़ जाने का विवरण लिख रहा हूँ.

लेकिन शुक्रवार की शाम दिल्ली के चाणक्यपुरी इलाक़े में जो कुछ हुआ उसे देखकर विजिलांती समूहों और पुलिसवालों के बीच फ़र्क़ करना मुश्किल हो गया था.

पाकिस्तानी उच्चायोग के बाहर सुरक्षा का तगड़ा इंतज़ाम था. सड़कों पर नाक़ेबंदी कर दी गई थी. अंदर घुसने का रास्ता पूछो तो पुलिस वाले एक नाक़े से दूसरे नाक़े भेज देते थे.

पाकिस्तान दिवस के मौक़े पर पाक उच्चायोग में हर साल की तरह बहुत सारे पत्रकारों, लेखकों, बिज़नेस वालों और कई देशों के डिप्लोमैट्स को आमंत्रित किया गया था.

ये भारत था पाकिस्तान नहीं

हर साल भारत सरकार अपना एक प्रतिनिधि भी इस समारोह में भेजती थी लेकिन इस बार सरकार ने इस समारोह का बहिष्कार करने का फ़ैसला किया.

गेट के बाहर लगाए गए नाक़ों पर खड़े सिक्योरिटी वाले (पता नहीं ये पुलिस वाले थे, आइबी या रॉ के कर्मचारी थे, प्राइवेट सिक्योरिटी के लोग थे या कोई और) हर एक को रोक रोक कर उनका नाम-पहचान पूछ रहे थे, निमंत्रण पत्र देख रहे थे और साथ ही सबको बताते जा रहे थे - "भारत सरकार ने पाकिस्तान हाई कमीशन में हो रहे समारोह का बहिष्कार कर रखा है इसलिए हमारे लिए आपको ये बताना ज़रूरी है कि आप वहाँ न जाएँ."

शायद उन्हें भी इस बात का एहसास था कि उनकी ये कार्रवाई जनतांत्रिक नहीं है इसलिए उन्होंने बीबीसी के कुछ साथियों से कहा वैसे डेमोक्रेसी है, आप चाहें जो तो जा सकते हैं.

इस हिदायत में एक संदेश छिपा था — 'हमने आपको चेतावनी दे दी है. अपना काम कर दिया है. अब आपकी इच्छा है आप जाएँ या नहीं. लेकिन ध्यान रखिए, हम आपका वीडियो खींच चुके हैं और वक़्त आने पर आपकी शिनाख़्त कर ली जाएगी.' ये संदेश सिर्फ़ सरकारी कर्मचारियों या अधिकारियों को ही नहीं बल्कि हर हिंदुस्तानी मेहमान तक पहुँचाया जा रहा था.

मेहमानों की कार को घेरकर कर ये बता रहे सुरक्षाकर्मी लगभग सबकी डाँट भी खा रहे थे.

लोगों को इस बात पर एतराज़ था कि सिक्योरिटी के लिए ज़िम्मेदार लोग विजिलांती समूहों की तरह कैसे व्यवहार कर सकते हैं.

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आमंत्रित लोगों में लेखिका सैयदा सैयदैन, मोहम्मद अली जिन्ना की पत्नी रटी जिन्ना पर किताब लिखने वाली शीला रेड्डी सहित बीबीसी और दूसरे इंटरनेशनल मीडिया के पत्रकार, विदेशी डिप्लोमैट, फ़ौजी अफ़सर और बिज़नेसमैन शामिल थे.

हम सभी को इस बात का तो अंदाज़ा था कि पाकिस्तानी हाईकमीशन के बाहर हर आने जाने वाले पर नज़र रखी जाती है. ठीक उसी तरह जैसे पाकिस्तान में हर भारतीय के एक एक सेकेण्ड की ख़बर रखी जाती है.

मगर किसी को इस तरह के स्वागत की उम्मीद नहीं थी. शायद आज़ाद भारत में पहली बार चाणक्यपुरी के डिप्लोमैटिक एनक्लेव में बिना झिझक-पर्दा किए ख़ुफ़िया विभाग के लोग विजिलांती ग्रुपों की तरह सरेआम लोगों को पाकिस्तान हाईकमीशन में न जाने की 'हिदायत' दे रहे थे और वीडियो उतार रहे थे.

मैं भारत की राजधानी नई दिल्ली के चाणक्यपुरी डिप्लोमैटिक एनक्लेव में पाकिस्तानी हाईकमीशन के बाहर खड़ा था पर मुझे क्यों लग रहा था कि मैं पाकिस्तान में हूँ जहाँ गली के मोड़ पर खड़ा हर शख़्स मुझ पर निगाह रखने के लिए ही तैनात किया गया है?

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Image caption प्रतीकात्मक तस्वीर

जब मैं पहुंचा पाकिस्तान

आज से दस साल पहले पाकिस्तान के आम चुनाव कवर करने के लिए मैं लंदन से इस्लामाबाद पहुँचा. उस बार मुझे पहली बार अंदाज़ा हुआ कि लड़कियों को अपने पीछे पीछे आने वाले शोहदों को देखकर कैसा महसूस होता होगा. कल्पना कीजिए आप किसी दोस्त के घर से निकल कर अपनी गाड़ी में बैठे ही हों कि मोटरसाइकिलें स्टार्ट होने की आवाज़ आपके कान में पड़ जाए और दो सवार दिनभर आपकी कार के पीछे पीछे लगे रहे.

वो न आपसे बात करेंगे, न आपकी आँख में आँख मिलाएँगे, न मुस्कुराएँगे. बस जहाँ जहाँ आप जाएँगे वहाँ वहाँ उन्हें पाएँगे. उन दिनों हमारी पुरानी सहकर्मी निरुपमा सुब्रह्मण्यन इस्लामाबाद में 'द हिन्दू' अख़बार की रिपोर्टर थीं. उनके घर के बाहर चौबीसों घंटे दो लोग तैनात रहते थे. उनकी ड्यूटी थी साये की तरह निरुपमा के पीछे पीछे लगे रहना. "इग्नोर दैम" - पूछने पर निरुपमा ने मुझसे कहा क्योंकि वो अपने इन दो दस्तों की मौजदूगी की इतनी आदी हो चुकी थीं कि अब उन्हें इनकी मौजूदगी का एहसास ही नहीं होता था.

'इग्नोर दैम' यानी इन्हें नज़रअंदाज़ करो कहना आसान है, पर आप उन्हें नज़रअंदाज़ कर नहीं सकते. भाई लोग ख़ुद को आसानी से इग्नोर नहीं करने देते, ख़ास तौर पर अगर आप हिंदुस्तानी हैं.

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पाकिस्तान में चंद दिन ही हुए थे और मैं हमसायों को इग्नोर करना सीख ही रहा था कि मेरे फ़ोन की घंटी बजी. दूसरी ओर से ठेठ लाहौरी अंदाज़ की पंजाबी में किसी ने कहा - 'ना की है तेरा. मैं तैन्नू वेख लवांगा.' मैं कामचलाऊ पंजाबी बोल लेता हूँ मगर एक अजनबी की धमकी सुनकर मुझपर बेसाख़्ता ठेठ कराची का उर्दू लहजा हावी हो गया. सूखी ज़बान तर करते हुए मैंने कहा - 'देखिए जनाब, आप कैसे बात कर रहे हैं. कौन हैं आप?'

ख़ौफ़ की बारीक चादर

इससे ज़्यादा कुछ कहने की हिम्मत मुझमें नहीं हुई और मैंने फ़ोन बीबीसी उर्दू सर्विस के अपने एक साथी को दे दिया. उन्होंने डबल ठेठ लाहौरी पंजाबी में फ़ोन करने वाले को समझा दिया कि इस तरह के फ़ोन करने से उन्हें कुछ हासिल नहीं होगा.

मुझे कुछ और दिन इस्लामाबाद में रुकना था. बीबीसी के जिस गेस्ट हाउस में मैं रुका था वो ऊँची दीवारों और लोहे के भारी गेट वाला बंगला था जिसमें ऊँचे-पूरे क़द का एक पठान जवान सिक्योरिटी गार्ड था जो फ़ुरसत के क्षणों में अपनी ख़याली महबूबा की शान में शायरी किया करता था. एक दिन उसने हँसते हुए कहा — "कल रात फिर आपके चाहने वाले आए थे. आपका अता-पता पूछ रहे थे. मैंने डाँट कर भगा दिया."

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Image caption प्रतीकात्मक तस्वीर

वो लोग मेरे ज़ेहन में दहशत बैठाने में धीरे धीरे कामयाब हो रहे थे. मुझे लगने लगा था कि मैं कहीं पर भी अकेला नहीं हूँ. कोई साया हर पल मुझ पर निगाह रखे हुए है. मैं लगभग एक महीना इस्लामाबाद, कराची और लाहौर घूमता रहा और वहाँ के आम लोगों की मेहमाननवाज़ी, इंसानियत और याराने की यादों का ख़ज़ाना लेकर लौटा. लेकिन साये की करह मुसलसल मेरे साथ रहने वाले वो अनाम भाईलोग मेरे दिल में ख़ौफ़ की एक बारीक सी चादर बिछाने में कामयाब हो गए थे.

पूरे दस साल बाद कल रात पाकिस्तानी हाईकमीशन के बाहर मैंने महसूस किया कि ठीक उसी तरह ख़ौफ़ की बारीक चादर यहाँ भी लोगों के ज़ेहन में बैठाने की कोशिश जारी है. और ये कोशिश माइक्रो और मैक्रो यानी सूक्ष्म और व्यापक स्तरों पर चल रही है.

दादरी के अख़लाक़, पहलू ख़ान, जुनैद और ऐसे ही दर्जनों मुसलमानों की लिंचिंग करके कथित गोरक्षकों ने मुसलमानों के ज़ेहन में दशहत बैठाई. लिंचिंग के अपराधियों को माला पहनाकर स्वागत करके नरेंद्र मोदी के एक मंत्री सिन्हा ने इस दहशत को विजिलांती जैसा व्यवहार करने वाले सिक्योरिटी के सिपाहियों ने पाक हाईकमीशन के बाहर लोगों में डर पैदा करने का काम किया, लेकिन उससे दो दिन पहले होली की एक बैठक में एक सज्जन ने इसी समारोह में न जाने की ताईद करते हुए मेरे दिल में ख़ौफ़ की बारीक चादर फैलाने की कोशिश की थी.

पाकिस्तान में क्या हुआ था?

यू-ट्यूब पर इस्लाम और मुसलमानों को निशाना बनाने वाली अपनी तक़रीरों से किसी क़दर मशहूर हुए हमारे एक दोस्त ने थोड़ी धीमी आवाज़ में कहा — मैं पिछले बीस साल से पाकिस्तान डे समारोह में जाता रहा हूँ लेकिन इस बार नहीं जाऊँगा.

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मैंने उनसे कारण जानना चाहा तो वो आँखों से इशारे करने लगे और बोले — "मैं बता रहा हूँ आपको. इस बार आप भी मत जाना. मैं किसी वजह से कह रहा हूँ. मुझे जानकारी है. इस बार नहीं जाना चाहिए."

पूरे कमरे में सब लोग संजीदा हो गए और सबको लगा इतनी गंभीरता से कही गई बात को गंभीरता से न लेना बेवकूफ़ी होगी. लेकिन मेरे लिए ख़ौफ़ की उस अदृश्य चादर को वहीं फाड़ देना ज़रूरी था. मैंने तनिक मज़ाकिया लहजे में मगर ऊँची आवाज़ में कहा — "ख़ौफ़ मत फैलाइए. जिसको जाना हो उसको बिना डरे जाना चाहिए. जो न जाए वो न जाए."

ख़ौफ़ की इस झीनी चादर को फाड़ना मेरे लिए पाकिस्तान में भी ज़रूरी हो गया था क्योंकि आम पाकिस्तानी आपको दोस्ती की गरमाहट और खिलखिलाहटों की वो सौग़ात देता है जिसे आप कभी नहीं भूल पाते. वो लज़ीज़ खाने की दावतों में लतीफ़े सुना सुनाकर आपको दोहरा कर देगा, शास्त्रीय संगीत की महफ़िलों में राग जयजयवंती की बारीकियाँ समझाएगा, शिव के अर्द्धनारीश्वर रूप की महिला गाएगा और आप खुले मुँह से भौंचक सुनत रहेंगे.

आप लाहौर में उसके ताँगे पर सवार हों और उतरते वक़्त बताएँ कि आप हिंदुस्तान से हैं तो आपसे किराया नहीं लेगा. हलवाई आपको मुफ़्त में मिठाइयाँ खिलाकर ही मानेगा और तोहफ़े देने में ख़ुश होने वाले हर मेहमाननवाज़ पाकिस्तानी से आप बार बार सुनेंगे - "आप हमारे मेहमान हैं जी."

पर इस्लामाबाद में हर मुक़ाम पर पीछा करने वाले 'इस्टेबलिशमेंट' के वो लाशिनाख़्त साये उस पाकिस्तानी गरमाहट और खिलखिलाहटों की एंटीथीसिस थे. ख़ौफ़ की बारीक चादर को फाड़ने की गरज से एक दिन मैंने इस्लामाबाद के बाहरी इलाक़े के एक चौराहे तक मेरे पीछे पीछे आए एक साये के पास जाकर बात करने का फ़ैसला कर ही लिया.

"अस्सलामअलैकुम जनाब" - मैंने मुस्कुरा कर सलाम किया.

"वाल्कुमस्लाम जी" - जवाब उतने ही अदब से आया.

"सरजी, थक तो आप भी जाते होंगे दिनभर?" - मैंने बात छेड़ने की गरज़ से ख़ुफ़िया इदारे के उस सबसे थके हुए सिपाही से पूछा.

"क्या करें जी, बीवी बच्चे तो हमें भी पालने हैं." - दीन हीन से चेहरे वाले उस आदमी ने सूखी मुस्कुराहट के साथ जवाब दिया. और अगले ही पल जैसे उसे अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास हुआ हो, वो अपने लहजे में थोड़ा सख़्ती ले आया - "अभी कितनी देर और हैं आप यहाँ पर"?

इसके बाद मैंने दोस्ती बढ़ाने का विचार वहीं त्याग दिया.

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क्या भारत क्या पाकिस्तान

पर कल शुक्रवार की शाम जब भारत सरकार की ओर से हिदायत लेकर आए लोगों के घेरे को पार करके मैंने पाकिस्तानी हाईकमीशन के गेट के भीतर क़दम रखा तो हरी रोशनी में नहाई हुई इमारत मेरे सामने थी जिस पर प्रोजेक्टर की मदद से दो बड़े बड़े चाँद-तारे प्रोजेक्ट किए गए थे.

कुछ ही देर में मेहमानों के बीच ऐलान किया गया — भारत और पाकिस्तान का राष्ट्रगान बजाये जाएगा. सभी लोग सावधान की मुद्रा में खड़े हो गए. पहले जन-गण-मन की धुन बजी और तुरंत बाद पाकिस्तान का क़ौमी तराना 'पाक सरज़मीं' की धुन बजी.

यहाँ तक सब ठीक था. जब मेहमान खाने के स्टॉल्स की तरफ़ बढ़े तो मुझे अपने कानों पर यक़ीन नहीं हुआ.

लाउडस्पीकर पर जो गाना बज रहा था उसे हमने हर पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को स्कूल की प्रभातफेरियों में गाया था. आदतन मैं धुन में धुन मिलाते हुए साथ साथ गुनगुनाने लगा:

दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल

साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल

आँधी में भी जलती रही गाँधी तेरी मशाल

साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल

ग़ौर से सुना तो इसी गाने की धुन पर भारत के नहीं पाकिस्तान के राष्ट्रपिता क़ायदे आज़म मोहम्मद अली जिन्ना का गुणगान हो रहा था:

यूँ दी हमें आज़ादी कि दुनिया हुई हैरान

ऐ क़ायदे आज़म तेरा एहसान है एहसान

हर सिम्त मुसलमानों पे छाई थी तबाही

मुल्क अपना था और ग़ैरों के हाथों में थी शाही

ऐसे में उठा दीन-ए-मोहम्मद का सिपाही

और नारा-ए-तकबीर से दी तूने गवाही

मैं हतप्रभ खड़ा था. धीरे धीरे गाने की आवाज़ धूमिल पड़ती गई और मेरे ज़ेहन में पाकिस्तानी शायरा फ़हमीदा रियाज़ की ये नज़्म उभरने लगी:

तुम बिलकुल हम जैसे निकले,

अब तक कहाँ छिपे थे भाई…

वो मूरखता, वो घामड़पन

जिसमें हमने सदी गँवाई

आख़िर पहुँची द्वार तुम्हारे

अरे बधाई, बहुत बधाई!

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