दुनिया के सबसे अमीर आदमी के पोते से वो मुलाक़ात

  • 27 मार्च 2019
निज़ाम

नवाब मीर नजफ़ अली ख़ान बहादुर से हमारी कभी कोई आश्नाई न रही, इसलिए जब उन्होंने दिल्ली होने और मिलने की बात कही तो ज़हन में आया, संडे को?!

लेकिन कभी इंग्लैंड और स्कॉटलैंड से बड़ी रियासत के हुकुमरान और दुनिया के सबसे अमीर आदमी रहे हैदराबाद के निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान बहादुर के पोते के लिए मेरे पास बीसियों सवाल थे - हैदराबाद के भारत में शामिल होने से इंकार करने, पाकिस्तान से मदद मांगने, रज़ाकार, वहां हुए क़त्लेआम और आख़िरी निज़ाम के "भारत से भागने को लेकर भी."

भारत में विलय और नरसंहार

बीकानेर हाउस के एक हाल में रखे फुलदार सोफ़े पर बैठे वो मुझसे अंग्रेज़ी में कहते हैं. "जो ये कर रहे हैं वो इतिहास थोड़ा ठीक से पढ़ें, निज़ाम अगर भाग गए होते तो विलय के बाद भी उन्हें हिंदुस्तानी हुकूमत के ज़रिए राजप्रमुख के पद पर किस तरह बैठाया जाता, जिसपर वो पांच सालों तक बने रहे,"

आदित्यनाथ का निज़ाम के भागने का दावा तो ख़ैर ग़लत हुआ है लेकिन हैदराबाद को लेकर एक विवाद थोड़े ही है, वो कहते हैं कि "आप जो पूछना चाहें पूछें."

1947 में ब्रितानी हुकूमत ने रियासतों को छूट दी थी कि वो चाहें तो भारत के साथ जाएं या पाकिस्तान के साथ, हैदराबाद स्वतंत्र रहना चाहता था जिसके बाद भारत ने वहां फौज भेजी.

लबो लहजा बिल्कुल देसी अंदाज़ का है. नजफ़ अली ख़ान की तालीम जागीरदार कॉलेज में हुई है जिसे अब हैदराबाद पब्लिक स्कूल के नाम से जाना जाता है.

सुंदरलाल कमिटी के आधार पर हाल में सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक़ हैदराबाद के विलय के समय वहां 27,000 से 40,000 लोगों का क़त्ल हुआ था.

ये कमीशन रिपोर्ट भारत में कभी आम नहीं की गई.

दिल्ली का हैदराबाद हाउस

बीकानेर हाउस - जहां हम बैठे हैं वहां से हैदराबाद हाउस दाहिने हाथ पर कुछ सौ मीटर दूर ही है, नजफ़ अली के दादा की दिल्ली में रिहाइशगाह, पर अब भारतीय विदेश मंत्रालय की मिलकियत लेकिन नजफ़ अली ख़ान कभी उसके भीतर नहीं गए.

बारहवीं पास कर चुके उनके बेटे अनस अली ने भी, जिन्हें वो बिस्कुट की प्लेट लेकर हमारी तरफ़ भेजते हैं, न तो हैदराबाद हाउस देखा है न ही उन्हें वहां जाने की कोई ख्वाहिश है, न ही उसे मुग़लाई का शौक है.

हां सेलेक्ट सिटी माल में केएफ़सी में वो ज़रूर गए "क्योंकि कहीं कुछ और समझ में नहीं आया."

बीकानेर हाउस में आयोजित डाक टिकटों का कलेक्शन भी, जिसकी प्रदर्शनी साथ देखने के बाद हम बातचीत को इजाज़त लेकर एक कमरे में बैठ गए हैं, किसी और की मिलकियत हैं और नजफ़ अली वहां गुजराल फाउंडेशन की दावत पर आए हैं जिसके लिए वो मेज़बानों का बार-बार शुक्रिया अदा करते हैं और चाय के बाद गुलदस्ते और तोहफ़े भी पेश करते हैं.

जब बहुत सारे रजवाड़े होटलों और टूरिज़्म के व्यापार या पॉलटिक्स में चले गए तो हैदराबाद वाले ऐसा क्यों नहीं कर पाए?

इसके जवाब में वो कहते हैं, "हमारी लीडरशिप ग़लत हाथों में चली गई, उन लोगों के पास जो यहां रहना भी नहीं चाहते, अब हम कोशिश कर रहे हैं कि तमाम चल और अचल संपत्ति को लिस्ट करें और वो परिवार के हक़ में लगे."

वो कहते हैं पॉलटिक्स उनके बस की बात नहीं, "उसमें बहुत झूठ बोलना पड़ता है."

नज़फ अली ख़ान निज़ाम फेमिली वेलफे़यर एसोशिएशन के अध्यक्ष हैं और इसी नाते रॉयल ब्रिटिश बैंक से भी उनकी बातचीत निज़ाम की जमा राशि को वापिस करने को लेकर जारी है, जो अब बढ़ते-बढ़ते 36 मिलियन पाउंड हो गई है.

'हम राजा समझें तो बेवक़ूफ़'

वो दावा करते हैं कि मामले को अदालत से बाहर निपटाने को लेकर बात बहुत आगे तक पहुंच चुकी है और दो-तीन माह में कुछ बेहतर नतीजा सामने आ सकता है.

वो कहते हैं, "ख़ुदा ने हमें जो दिया है हम उसके शुक्रगुज़ार हैं, हमें मालूम है हम राजा नहीं हैं, अगर आज हम ख़ुद को राजा समझेंगे तो लोग मुझे बेवक़ूफ़ समझेंगे,"

उनकी क्रीम कलर की शेरवानी पर लाल रंग के फूलदार सोफ़े और उनकी लाल तुर्की टोपी का शेड बार-बार झलकता है.

मैं उनके चेहरे पर उनके कथन की सच्चाई पढ़ने की कोशिश करता हूं.

आख़िर मेरा वास्ता मध्य प्रदेश की उन महिला मंत्री से पड़ा जिनके लिए हुकूमत ने ऑर्डर पास किया कि उनके नाम के आगे श्रीमंत ज़रूर लगाया जाए, या कहीं छोटे रजवाड़े के महलों में मैंने आम लोगों को जूते-चप्पल उतारकर जाते देखा है.

तो क्या उनका ये अंदाज़ हैदराबाद से जुड़े विवादों को लेकर है? तो 1857 में नेस्त-नाबूद कर दिए गए रजवाड़ों या अंग्रेज़ों से सीधे लोहा लेनेवाले एक्का-दुक्का राजघरानों के अलावा किस कथित भारतीय रजवाड़े को लेकर ऐसा विवाद नहीं.

मैं बाक़ी कि बातचीत अगली मुलाक़ातों के लिए छोड़ देता हूं, और उनसे रूख़सत होता हूं, वो कुछ ही देर में बहन के घऱ निज़ामुद्दीन के लिए रवाना होंगे, जहां वो हैदराबाद से दिल्ली आकर रूके हैं.

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