नितिन गडकरी की राह कितनी मुश्किल और क्या होगा विदर्भ की 10 सीटों पर: लोकसभा चुनाव 2019

  • 28 मार्च 2019
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2019 चुनाव में विदर्भ में क्या होगा, इसको जानने-समझने से पहले एक बात स्पष्ट है. वो बात यह है कि 2014 की तरह, इस बार विदर्भ के नतीजे शायद बहुत चौंकाने वाले नहीं हों.

2014 में बीजेपी-शिवसेना गठबंधन ने सभी 10 सीटों पर जीत हासिल की थी. इस बार भी गठबंधन के उम्मीदवारों को कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन पर बढ़त दिख रही है. इसकी एक वजह तो यही है कि कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन यहाँ कमज़ोर है, दोनों दलों के गठबंधन में सबकुछ ठीक नहीं है और गुटबाज़ी का खामियाजा भी इसे भुगतना पड़ सकता है.

इस इलाके में लोकसभा चुनाव 11 अप्रैल से शुरू हो रहे हैं, ऐसे में पूर्वी महाराष्ट्र की इन 10 सीटों पर चुनावी चहल-पहल तेज़ी से बढ़ने लगी है.

एक समय विदर्भ को कांग्रेस का गढ़ भी माना जाता रहा था लेकिन 2014 में मोदी लहर पर सवार बीजेपी-शिवसेना ने कांग्रेस को एक भी सीट नहीं जीतने दी.

पिछले महीने इलाके में कई जगह घूमने-फिरने और आम लोगों से बातचीत के दौरान यह तो जाहिर होता रहा है कि समाज में मोदी सरकार को लेकर नाराजगी है और लोगों का मोहभंग भी हुआ है, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व वाला विपक्ष बिना ज़ोर लगाए चुनाव जीतने की स्थिति में भी नहीं दिख रहा है.

नाम गोपनीय रखने के अनुरोध के साथ पश्चिम विदर्भ से दो बार कांग्रेस के विधायक रहे एक नेता ने बताया, "चुनाव जीतने की स्थिति तो है, लेकिन मोदी और बीजेपी से लोगों के मोहभंग को हम भुना नहीं पा रहे हैं."

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वहीं, दूसरी ओर, बीजेपी-शिवसेना के लिए भी 2014 की कामयाबी को दोहराना आसान नहीं होगा.

किसान नेता विजय जावांधिया कहते हैं, किसान मोदी सरकार से नाराज हैं. लेकिन पुलवामा ने किसानों के मुद्दे को गायब सा कर दिया है. कोई लहर भी नहीं है. मेरे ख्याल से जाति का गणित और स्थानीय समीकरणों की चुनावी नतीजों में अहम भूमिका रहेगी.

विजय कहते हैं, "अगर दलित, जनजातीय समुदाय और मुसलमानों ने रणनीति के साथ एकजुट होकर वोट नहीं दिया तो कांग्रेस तो कहीं जमीन पर भी नहीं है, मेरे ख्याल से बीजेपी-शिवसेना को बढ़त हासिल है."

विदर्भ में दो चरणों चुनाव है- सात लोकसभा सीटों पर 11 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे जबकि बाकी की तीन सीटों पर 18 अप्रैल को मतदान होगा.

बीजेपी इलाके की छह सीटों पर चुनाव लड़ रही है जबकि चार सीटों पर शिवसेना के उम्मीदवार हैं. वहीं दूसरी ओर कांग्रेस इलाके की सात सीटों पर चुनाव लड़ रही है, दो सीट पर एनसीपी के उम्मीदवार हैं और अमरावती की सीट निर्दलीय विधायक रवि राणा की पत्नी नवनीत को एनसीपी कोटे से दी गई है.

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विदर्भ एक समय में कांग्रेस का गढ़ था, लेकिन पार्टी के कमजोर ढांचे, क्षेत्रीय नेताओं के अभाव और गुटबाज़ी के चलते ही बीजेपी-शिवसेना ने पूरे इलाके में तेज़ी से अपनी स्थिति मजबूत कर ली.

मुद्दे कई, लेकिन हवा नहीं

विदर्भ भी पूर्व और पश्चिम में बंटा हुआ है. ज़रूरी नहीं है कि पूर्व में धान की खेती करने वाले किसान पांच जिलों में उसी तरह मतदान करें जिस तरह से पश्चिम में कपास उगाने वाले किसान करेंगे.

प्रचंड सूखा, आर्थिक तंगी, सरकार के वादों का पूरा नहीं होना और बढ़ती बेरोजगारी- ये वो मुद्दे हैं जिसके चपेट में ग्रामीण विदर्भ के लोग फंसे हुए हैं. लेकिन ऐसा लग नहीं रहा है कि जब वे लोग मतदान करने निकलेंगे तो वे बड़ा बदलाव लाने के लिए वोट देंगे. नौ मौजूदा सांसद चुनाव मैदान में होंगे- तीन शिवसेना के और छह बीजेपी के उम्मीदवार.

2014 में बीजेपी की टिकट पर चुनाव जीतन वाले नाना पटोले कांग्रेस के खेमे में लौट चुके हैं और नागपुर में वे बीजेपी के दिग्गज नेता और केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री नितिन गडकरी को चुनौती दे रहे हैं.

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पटोले कांग्रेस के किसान सेल के अध्यक्ष भी हैं लेकिन उनको नागपुर से टिकट दिए जाने पर स्थानीय यूनिट में नाराजगी भी देखने को मिली है. दूसरी ओर बीजेपी नितिन गडकरी की जीत को लेकर निश्चिंत है. लेकिन कांग्रेस की उम्मीद की बड़ी वजह ये है कि कांग्रेस नागपुर में कई दिग्गजों को चुनाव हरा चुकी है.

स्थानीय जातिगत समीकरणों को देखने पर यह जाहिर होता है कि इस सीट पर नितिन गडकरी के लिए जीत हासिल करना आसान नहीं रहने वाला है. नागपुर में 21 लाख मतदाता हैं, जिनमें 12 लाख दलित, मुस्लिम और कुनबी हैं. इसके अलावा बुनकर का काम करने वाले हलबा-कोष्टी समुदाय भी डेढ़ लाख के लगभग हैं. ये सब लोग बीजेपी से नाराज बताए जाते हैं और इनका साथ कांग्रेस को मिल सकता है.

कुनबी समुदाय से ही आने वाले पटोल ने कांग्रेस के सभी धड़ों के साथ नागपुर में रैली से अपनी शुरुआत की है, माना जा रहा है कि वो नितिन गडकरी को कड़ी चुनौती देंगे. हालांकि गडकरी विकास की पिच पर मौजूद हैं, ख़ासकर मार्च में उन्होंने मेट्रो रेल के एक कॉरिडोर को ऑपरेशनल बना दिया है. वे निजी तौर पर भी लोकप्रिय हैं.

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कांग्रेस का असमंजस

रामटेक सीट को लेकर भी कांग्रेस असमंजस में रही- पार्टी कार्यकर्ता चाहते थे कि यहां पार्टी के महासचिव मुकुल वासनिक चुनाव लड़ें ( पिछले चुनाव में वे शिवसेना के क्रुपाल तुमाने से हार गए थे) लेकिन वासनिक जानते थे कि वह शायद फेवरिट नहीं हैं. रामटेक एक सुरक्षित सीट है, लेकिन यहां के दलित आंबेडकराइट और हिंदू दलितों में बंटे हुए हैं, इन दोनों के बीच ओबीसी फैक्टर संतुलन साधता है.

रामटेक के कांग्रेसी नेता (ख़ासकर पार्टी के मज़बूत नेता और विधायक सुनील केदार) का समर्थन वासनिक को नहीं मिला, ये लोग कांग्रेस के जनजातीय समुदाय के अध्यक्ष नितिन राउत को चुनाव लड़ाना चाहते थे. लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने आखिरी मौके पर यहां से किशोर गजभैइए को चुनाव मैदान में उतारा है. गजभैइए भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी हैं और बहुजन समाज पार्टी की टिकट पर नागपुर (उत्तर) से 2014 में विधानसभा का चुनाव लड़ चुके हैं.

पश्चिम विदर्भ की अमरावती, अकोला, यवतमाल-वाशिम और बुलडाना में भी दिलचस्प टक्कर देखने को मिल सकती है. हालांकि इनमें से अकोला में तिकोना मुकाबला देखने को मिल सकता है.

बीजेपी ने अपने मौजूदा सांसद संजय धोत्रे को चुनाव मैदान में उतारा है. कांग्रेस ने भी यहां से अपने पुराने उम्मीदवार हिदायत पटेल को बनाए रखा है. दलित नेता एवं पूर्व सांसद प्रकाश आंबेडकर अपनी बहुजन वंचित आघाड़ी पार्टी से यहां चुनाव मैदान में उतर सकते हैं या फिर अपनी पत्नी को उतार सकते हैं. ऐसे में यहां मुक़ाबला तिकोना हो जाएगा.

इलाके में कोई बड़ा चुनावी मुद्दा नहीं दिखता है, लगता है कि स्थानीय मुद्दे ही प्रभावी होंगे. ऐसे में आख़िरी समय में फ़ैसला लेने वाले फ्लोटिंग मतदाता और निचली जातियों के मतदाताओं का वोट यहां निर्णायक होने वाला है.

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भंडारा-गोंदिया सीट से बीजेपी और एनसीपी ने अपने उम्मीदवारों की घोषणा आख़िरी वक्त में की है. बीजेपी ने यहां से सुनील मेंदे को उम्मीदवार बनाया है, जो भंडारा नगर निगम परिषद के चेयरमैन भी हैं. वहीं एनसीपी ने नाना पंचबुद्धे को अपना उम्मीदवार बनाया है.

पहले कयास लगाए जा रहे थे कि प्रफुल्ल पटेल अपने गृह क्षेत्र से चुनाव में मैदान में उतरेंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ है, उन्होंने आख़िरी समय में यहां से चुनाव लड़ने का मन नहीं बनाया. राज्यसभा सांसद के तौर पर अभी पटेल के तीन ही साल हुए हैं यानी अगले तीन साल वे राज्यसभा में रहेंगे.

2014 में यहां से बीजेपी उम्मीदवार के तौर पर नाना पटोले ने चुनाव जीता था, लेकिन इस बार वे नागपुर के अपने चुनाव में व्यस्त हैं. इसके बाद 2018 में हुए उपचुनाव में एनसीपी के मधुकर कुकड़े ने बीजेपी के उम्मीदवार हेमंत पटेल को 48 हज़ार से ज़्यादा मतों से हराया लेकिन वे अपनी सीट बरकरार नहीं रख पाए हैं.

दरअसल ये उपचुनाव का नतीजा ही था जिसने पहली बार संकेत दिए थे कि इलाके के लोगों में मौजूदा सरकार के प्रति लोगों की नाराजगी बढ़ी है. कांग्रेस के राज्य महासचिव और भंडारा के प्रभारी प्रफुल्ल गोदाधे कहते हैं, "कुकड़े के लिए चुनाव के लिए हमलोगों ने कुछ नहीं किया था, लोगों ने हमें चुनाव जिता दिया."

चंद्रपुर में कांग्रेस की मुश्किलें

चंद्रपुर लोकसभा सीट पर तो कांग्रेस को और भी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. पहले पार्टी की ओर इस सीट से विनायक भांगडे को उम्मीदवार बनाया गया तो जो केंद्रीय राज्य मंत्री और चार बार के बीजेपी सांसद हंसराज अहीर के सामने कमजोर उम्मीदवार माने गए थे.

उनकी उम्मीदवारी पर कथित तौर पर महाराष्ट्र के कांग्रेस के अध्यक्ष अशोक चाव्हाण का एक आडियो टेप भी आया जो भांगड़े की उम्मीदवारी पर खुद को असहाय बता रहे थे और अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा देने की बात कह रहे थे .

लेकिन अब पार्टी ने विनायक भांगड़े की जगह सुरेश उर्फ़ बालू धानोरकर को टिकट दिया है. सुरेश धानोरकर, चंद्रपुर के वारोड़ा से शिवसेना के विधायक थे. लेकिन उन्होंने सप्ताह भर पहले ही शिवसेना से इस्तीफ़ा देकर कांग्रेस का हाथ थामा है. माना जा रहा है कि वे हंसराज अहीर को कड़ी टक्कर दे सकते हैं.

नागपुर में बीजेपी के एक नेता बताते हैं, "जगहों पर मौजूदा सांसदों के ख़िलाफ़ एंटी इनकंबैंसी ज़रूर है, लेकिन हमारे विकास के काम और कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन की कमजोर स्थिति के चलते हम आसानी से जीतेंगे."

यवतमाल ज़िले तो दिलचस्प तस्वीर पेश करता है, क्योंकि यह जिला तीन लोकसभा सीटों का प्रतिनिधित्व करता है. चार विधानसभा सीटें यावतमान वाशिम के अधीन आती हैं. इस लोकसभा सीट से शिवसेना की भावना गवली की पांचवीं बार संसद पहुंचने के इरादे से मैदान में हैं.

इस ज़िले की एक विधानसभा सीटा हिंगोली के अधीन आती है, जहां से कांग्रेस के मौजूदा सांसद राजीव साटव पार्टी के संगठनात्मक काम के चलते यहां चुनाव मैदान में नहीं उतर रहे हैं. वहीं यवतमाल की दो विधानसभा सीटें चंद्रपुर लोकसभा सीट के अधीन आती हैं.

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इस पूरे ज़िले में कांग्रेस की हालत पर एक कांग्रेसी नेता ने बीबीसी को बताया, "गवली को माणिकराव ठाकरे चुनौती दे रहे हैं, लेकिन ये चुनौती उनकी नहीं हैं. दरअसल वहां की जनता ही गवली को चुनौती दे रही हैं. साटव ने तो मैदान ही छोड़ दिया है और चंद्रपुर में हमारी पार्टी ने उम्मीदवार बदल-बदलकर स्थिति खराब कर ली है."

कांग्रेस-एनसीपी की सबसे अच्छी स्थिति गढ़चिरौली में हैं, यह एक सुरक्षित सीट है. इलाके का जनजातीय समुदाय वन अधिकार कानून को लागू करने में देरी के चलते बीजेपी से नाराज है. लेकिन रामटेक, अमरावती, यवमाल-वाशिम और बुलडाना में शिवसेना की स्थिति मज़बूत है.

इस बार के चुनाव में एक फैक्टर और काम करेगा- आम आदमी पार्टी कहीं भी अपने उम्मीदवार खड़ा नहीं करेगी. 2014 में आम आदमी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवारों ने एक लाख से लेकर तीन लाख वोट बटोरे थे.

अगर इस बार बीएसपी अपने उम्मीदवार भी खड़े करती है, तो भी आम आदमी पार्टी के पूर्व कार्यकर्ता गिरीश नांदगांवकर के मुताबिक आप की गैरमौजूदगी का फायदा कांग्रेस नेतृत्व वाले विपक्ष को होगा. उन्होंने बताया कि इससे बीजेपी विरोधी मतों का बिखराव रुकेगा.

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भंडारा गोंदिया उपचुनाव का नतीजा

भंडारा-गोंदिया उपचुनाव का नतीजा कुछ मायने में बेहद दिलचस्प रहा. इस चुनाव ने दिखाया कि आम जनता मिलकर किसी बड़े नेता को हरा सकती है. एनसीपी के प्रफुल्ल पटेल भी कुकड़े की जीत के प्रति आश्वस्त नहीं थे. वहीं दूसरी तरफ बीजेपी उम्मीदवार के प्रचार के लिए मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी जैसे नेता मौजूद थे.

लेकिन क्षेत्र के लोगों का कहना था कि ये गडकरी और फड़णवीस जैसे बड़े नेता थे जिन्होंने कुकड़े को 2014 में बीजेपी की ओर से विधानसभा का टिकट नहीं दिया था. वह एक स्थानीय चुनाव बन गया था और स्थानीय जातिगत समीकरणों पर लड़ा गया था.

अगर 2019 का चुनाव भी विदर्भ में स्थानीय मुद्दों पर लड़ा गया, जिसकी उम्मीद ज़्यादा है तो विपक्ष को फ़ायदा होगा. कुकड़े के मामले में ये जाहिर हुआ कि वित्तीय संसाधन और सत्ता की मशीनरी होने के बाद भी बीजेपी अपने उम्मीदवार को जीत नहीं दिला पाई थी.

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बहरहाल, विदर्भ में दलितों, जनजातीय समुदाय के लोगों और मुस्लिमों की काफ़ी आबादी है. 2014 में इन लोगों ने बड़े पैमाने पर बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वोट दिया था. लेकिन इस बार ऐसा ही होगा कहना मुश्किल है.

दलित विद्धान एवं लेखक यशवंत मनोहर कहते हैं कि ये चुनाव भारत के आइडिया और आत्मा का चुनाव है. यशवंत जैसे लोग दलित मतदाताओं से अपील कर रहे हैं कि वे रणनीति के तहत केवल उन उम्मीदवारों को वोट दें, जो बीजेपी के उम्मीदवार को हरा रहा है. ऐसे लोग दलितों को प्रकाश आंबेडकर की बहुजन वंचित आघाड़ी से भी सचेत रहने को कह रहे हैं, क्योंकि आंबेडकर की पार्टी से कांग्रेस नेतृत्व वाले गठबंधन का वोट ही कटेगा और यह अप्रत्यक्ष रूप में बीजेपी-शिवसेना गठबंधन की मदद करेगा.

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