जयाप्रदाः बॉलीवुड की सबसे 'खूबसूरत अभिनेत्री' से लेकर आज़म खान को चुनौती देने तक

  • 31 मार्च 2019
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राजनीति का महारथी वही बनता है जो यहां अवसरों का खेल समझ सके. अवसरों की इसी तलाश में जया प्रदा बीजेपी में शामिल हो गई. पार्टी ने उन्हें उत्तर प्रदेश की रामपुर सीट से उम्मीदवार घोषित किया है.

रामपुर सीट जया प्रदा के लिए नई नहीं है, वो साल 2004 से लेकर 2014 तक रामपुर की सांसद रही हैं. इस दौरान सीट पर उनकी दावेदारी बतौर सपा उम्मीदवार रही थी लेकिन इस बार उनकी दावेदारी सपा के उम्मीदवार आज़म खान के ख़िलाफ़ है.

एक वक़्त वो भी था जब आज़म खान उनके लिए रामपुर की जनता से वोट मांगा करते थे, लेकिन अब वो उन्हें वोट ना देने की अपील करते हुए नज़र आएंगे.

जया प्रदा के राजनीतिक सफ़र का जब भी ज़िक्र होगा तो उसके साथ अमर सिंह का नाम जुड़ा होगा. अमर सिंह जब भी जिस राजनीतिक पार्टी में रहे जया प्रदा भी उनके साथ रहीं. बीजेपी से पहले जया प्रदा समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोक दल और तेलगू देशम पार्टी का हिस्सा रही थीं.

बॉलीवुड से राजनीति तक का सफ़र

तेलुगू सिनेमा में जया प्रदा ने अपने करियर की शुरुआत 1975-76 के आसपास की. साल 1979 में के. विश्वनाथ के निर्देशन में बनी फ़िल्म सरगम से उन्होंने बॉलीवुड में एंट्री ली. ये फ़िल्म काफ़ी हिट रही लेकिन इसने उनके करियर को कोई फ़ायदा नहीं दिया.

उनके बॉलीवुड करियर के लिए सबसे बड़ा साल रहा 1984. इस साल जितेंद्र और श्रीदेवी के साथ उनकी फ़िल्म 'तोहफ़ा' आई. इस फ़िल्म में उनकी को-स्टार रहीं श्रीदेवी आगे चल कर उनकी बड़ी प्रतिद्वंदी बनीं.

वरिष्ठ पत्रकार यासिर उस्मान बताते हैं कि देश के महान फ़िल्म निर्माताओं में से एक सत्यजीत रे ने जया प्रदा को"बॉलीवुड की सबसे ख़ूबसूरत अभिनेत्री" बताया था.

यासिर उस्मान कहते हैं, ''जया प्रदा का बॉलीवुड करियर चार साल का ही रहा. साल 1984 से लेकर 1988 तक वे बॉलीवुड की टॉप अभिनेत्रियों में शुमार रहीं. 1984 में उनकी अमिताभ बच्चन के साथ एक फ़िल्म आई 'शराबी'. शराबी ने जया प्रदा के बॉलीवुड के करियर को ऊपर उठाने का काम किया. वो बड़े स्टार्स के साथ काम करती थीं. उन्होंने अमिताभ बच्चन, जितेंद्र जैसे उस वक़्त के स्टार्स के साथ काम किया. लेकिन साल 1988 से उनके फ़िल्मी करियर का ढलान शुरू हुआ. 1990 में आज का अर्जुन फ़िल्म उनके करियर की आखिरी मुख्य भूमिका वाली फ़िल्म रही."

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शायद अपने फ़िल्मी करियर की परिस्थिति भांपते हुए ही जया प्रदा ने राजनीति में संभावनाएं तलाशनी शुरू की. 1994 में वो एनटी रामा राव (एनटीआर) के बुलावे पर आंध्र प्रदेश की तेलुगू देशम पार्टी में शामिल हुईं. एनटीआर और जया प्रदा ने कई तेलुगू फ़िल्मों में एक साथ काम किया था और यही वजह रही कि उन्होंने ये प्रस्ताव स्वीकार भी किया.

लेकिन राजनीतिक महत्वकांक्षाओं ने जया प्रदा को दक्षिण की राजनीति से उत्तर भारत की राजनीति का रास्ता दिखाया.

आंध्र प्रदेश के पत्रकार कृष्णा राव कहते हैं, ''1996 में टीडीपी ने जयाप्रदा को राज्यसभा सांसद बनाया. लेकिन जब उन्हें दोबारा राज्यसभा के लिए नामित नहीं किया गया तो वो नाराज़ हो गईं. टीडीपी में रहते हुए रेणुका चौधरी और जयाप्रदा के बीच मुकाबला रहा. जयाप्रदा की हमेशा शिकायत रही कि रेणुका चौधरी को पार्टी ज़्यादा तरज़ीह देती है.''

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जयाप्रदा कई इंटरव्यू में यह कह चुकी है कि टीडीपी में चंद्रबाबू नायडू ने उन्हें साइड लाइन किया. हालांकि ये भी सच है कि जब टीडीपी की कमान के लिए चंद्रबाबू नायडू ने विद्रोह किया था तो जयाप्रदा उनके साथ खड़ी रहीं.

साल 2004 में जया प्रदा सपा में शामिल हो गईं और रामपुर से उन्होंने सपा के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा. इस चुनाव में उनके आज के प्रतिद्वंदी और सपा के दिग्गज नेता आज़म खान ने साथ दिया. जया प्रदा साल 2004 से लेकर 2014 तक सपा के टिकट पर रामपुर से सांसद रहीं.

शादी और कंट्रोवर्सी

साल 1986 में जया प्रदा ने फ़िल्म निर्माता श्रीकांत नहाटा से शादी की. शादी से पहले जया प्रदा और श्रीकांत नहाटा के रिश्तों की मीडिया में खूब चर्चा होती थी. उस वक़्त की कई मैगज़ीन में इन दोनों के अफ़ेयर की खबरें छपती थीं. जयाप्रदा इस तरह की खबरों का खंडन ये कहकर करती थीं कि श्रीकांत और वे अच्छे दोस्त थे. हालांकि उनकी शादी की तस्वीरें सामने आईं और उन्होंने शादी की बात मानी.

यासिर उस्मान कहते हैं, ''स्टारडस्ट मैगज़ीन ने खुलासा किया कि जयाप्रदा और श्रीकांत नहाटा ने शादी कर ली है. सबसे बड़ा विवाद ये रहा कि श्रीकांत शादी-शुदा थे और उनके तीन बच्चे थे और जयाप्रदा से शादी उन्होंने अपनी पहली पत्नी को तलाक़ दिए बिना की थी. इस घटना के बाद कई रिपोर्ट ऐसी छपीं जिसमें जयाप्रदा को ''होम ब्रेकर'' बताया गया.''

''लेकिन कुछ वक्त बाद खबरें आईं कि उनके और श्रीकांत के बीच में सब कुछ ठीक नहीं है. इसके बाद कई इंटरव्यूज़ में उन्होंने कहा कि वो बच्चा चाहती हैं लेकिन उनके पति ऐसा नहीं चाहते. ''

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अमर सिंह का साथ और सपा से निष्कासन

एक बार फिर जया के राजनीतिक सफ़र पर लौटते हैं. जयाप्रदा ने उत्तर भारत में अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत से ही अमर सिंह का साथ बनाए रखा. अमर सिंह जहां जिस दल के साथ जुड़े जयाप्रदा भी वहीं गईं. सपा में जयाप्रदा को लाने का श्रेय भी अमर सिंह को ही दिया जाता है.

यासिर उस्मान कहते हैं, ''जयाप्रदा अमिताभ बच्चन के साथ कई फ़िल्मों में काम कर चुकी थीं और अमर सिंह और बच्चन परिवार के संबंध उस वक्त काफ़ी अच्छे हुआ करते थे. जयाप्रदा इस तरह ही अमर सिंह के संपर्क में आईं.''

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साल 2010 में जब समाजवादी पार्टी ने अमर सिंह और जयाप्रदा को पार्टी से निकाला तो अमर सिंह ने राष्ट्रीय लोक मंच बनाया. जयाप्रदा इसका अहम हिस्सा रहीं. जब अमर सिंह आरएलडी पार्टी में शामिल हुए तो जयाप्रदा ने भी आरएलडी जॉइन कर लिया और 2014 के लोकसभा चुनाव में बिजनौर से उम्मीदवारी पेश की. हालांकि वो इस सीट से जीत नहीं पाईं.

एक इंटरव्यू में अपने और अमर सिंह के रिश्ते को लेकर उन्होंने कहा था, ''अमर सिंह मेरे गॉडफ़ादर हैं. उन्होंने मेरा ऐसे वक़्त में साथ दिया जब कोई भी मेरे साथ नहीं खड़ा था. लोग बातें करते हैं. अगर मैं उन्हें राखी बांध दूं तो क्या तब लोग बातें करना बंद कर देंगे. ''

विवाद जिसने जयाप्रदा और आज़म खान को 'दुश्मन' बनाया

मई, 2009 में जयाप्रदा ने सपा नेता और विधायक आज़म खान पर उनकी मॉर्फ्ड तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल करने का आरोप लगाया था. उस वक्त उन्होंने एक न्यूज़ चैनल से बात करते हुए कहा था, ''वो मेरे बड़े भाई जैसे हैं लेकिन वह मेरे ख़िलाफ़ सस्ते प्रचार अभियान में शामिल होकर मेरी छवि खराब कर रहे हैं वो मेरी मार्फ़्ड तस्वीरें वायरल कर रहे हैं.''

जयाप्रदा ने ये भी कहा था कि आज़म खान और उनके समर्थकों ने मेरे कुछ पोस्टर और एक सीडी जारी की है.

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उन्होंने उस वक्त मीडिया से बात करते हुए कहा था, ''मैंने सीडी में क्या है ये नहीं देखा है लेकिन पोस्टर देखा है. ये लोग मेरी छवि खराब करने के इरादे से ऐसा कर रहे हैं.''

साल 2018 में एक चैनल से बात करते हुए अमर सिंह ने कहा था, '' जयाप्रदा आज़म ख़ान की उम्मीदवार थीं और उन्होंने कहा था कि मैं नूर बानो (कांग्रेस उम्मीदवार) को अपनी हूर बानो (जयाप्रदा) से हरवाउंगा. आज़म ख़ान के पास एक गाड़ी है जिसपर पूरी तरह पर्दे लगे हुए हैं. उस गाड़ी में जयाप्रदा को आज़म ख़ान ने बैठाया था. उस गाड़ी में क्या हुआ ये जयाप्रदा जी को ही पता है ये उनका अधिकार है कि वो बोलना चाहें या नहीं. अगर वो बोल देंगी तो आज़म जी कहेंगे- जुर्म-ए-उल्फ़त पे हमें लोग सज़ा देते हैं, कैसे नादान हैं शोलों को हवा देते हैं''

जयाप्रदा हमेशा ये कहती रहीं कि इस विवाद में उन्हें कभी नेता जी (मुलायम सिंह) ने फ़ोन तक नहीं किया.

आमने-सामने होंगे जयाप्रदा और आज़म खान

अब तक जयाप्रदा सपा के टिकट पर रामपुर सीट पर चुनाव लड़ा करती थीं लेकिन अब वो बीजेपी से चुनाव लड़ेंगी और उनके सामने होंगे कभी उनके लिए वोट मांगने वाले आज़म खान. ऐसे में ये चुनाव दोनों ही उम्मीदवारों के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई साबित होगा.

वरिष्ठ पत्रकार सुनीता एरॉन कहती हैं, ''जयाप्रदा और आज़म खान के बीच संबंध 2009 में ही बिगड़ चुके थे. 2009 के चुनाव में आज़म खान के समर्थन के बिना ही उन्होंने जीत हासिल की थी. लेकिन इस दौरान वे अमर सिंह की करीबी थीं और अमर सिंह के रिश्ते मुलायम सिंह यादव से अच्छे थे. तो ऐसा कहना कि आज़म खान के बिना चुनाव नहीं जीत सकती थीं ये ग़लत होगा, लेकिन ये सच है कि अब आज़म खान पहली बार यहां से लोकसभा की दावेदारी पेश कर रहे हैं तो ये राह जयाप्रदा के लिए आसान नहीं होगी. ''

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रामपुर सीट को सपा का गढ़ माना जाता है. मुस्लिम बहुल इस सीट पर सपा की अच्छी पकड़ है.

सुनीता एरॉन कहती हैं, ''जयाप्रदा रामपुर के लिए नया नाम नहीं है. बीजेपी में शामिल होने के पीछे उनकी कोई और मंशा है. उन्हें वोट मोदी के नाम पर मिलेगा ना कि खुद के नाम पर. ऐसा कई बीजेपी उम्मीदवारों के साथ इस चुनाव में होगा. ये चुनाव ज़ाहिर तौर पर दोनों ही उम्मीदवारों को लिए एक दूसरे को हराने की होड़ जैसा होगा.''

चुनावी मैदान में जीत किसको मिलेगी ये 23 मई को पता चलेगा, लेकिन ज़ाहिर तौर पर रामपुर सीट पर इस बार दिलचस्प मुकाबला देखने को मिलेगा.

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