अमरीकी लोगों को ऐसे ठग रहे हैं भारत के फ़र्जी कॉल सेंटर

  • 27 मार्च 2019
कॉल सेंटर का फ़र्ज़ीवाड़ा

बीबीसी हिंदी के पत्रकार सुशील झा फिलहाल अमरीका के सेंट लुईस शहर में रह रहे हैं.

बहुत ज़्यादा वक़्त नहीं हुआ है जब वो एक बड़ी ठगी का शिकार होते-होते बचे. अगर धोखा खा जाते तो लगभग पांच हज़ार अमरीकी डॉलर की चपत लगती. पांच हज़ार डॉलर मतलब लगभग साढ़े तीन लाख रुपये. सुशील झा एक फ़र्जी कॉल सेंटर के निशाने पर थे. कॉल सेंटर के ऑपरेटर्स को लगा कि सुशील झा भी उन कई अमरीकियों में से ही जिन्हें राजस्व विभाग की ओर से फ़ोन किया गया.

लेकिन यह कोई अकेला मामला नहीं है. ऐसे बहुत से कॉल सेंटर हैं जो लोगों के डर का फ़ायदा उठाते हैं.

अहमदाबाद साइबर क्राइम सेल ने हाल ही में इस तरह का धोखा करने वाले छह कॉल सेंटर का भंडाफोड़ किया और चालीस से अधिक लोगों को गिरफ़्तार भी किया.

जो लोग भी इसमें शामिल थे उन्हें अपने काम के बारे में काफ़ी अच्छे से पता था.

सुशील झा अपने अनुभव के बारे में बताते हैं कि सबकुछ सहज लग रहा था. ऐसा मालूम चल रहा था कि वाकई किसी सरकारी कार्यालय से ही सबकुछ संचालित किया जा रहा हो. मसलन, जब फ़ोन आया तो दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई कि इस कॉल को ट्रेनिंग के उद्देश्य से रिकॉर्ड भी किया जा सकता है. इसके बाद फ़ोन लाइन पर जो कथित अधिकारी फ़ोन लाइन पर आया वो बकायदा उसी अंदाज़ में बात कर रहा था जैसे कोई अमरीकी करता है. उसका एक्सेंट बिल्कुल अमरीकी था. उसने सबसे पहले अपना परिचय दिया और उसके बाद अपनी पहचान संख्या (बैज नंबर) और उसके बाद कहीं जाकर उसने सम्मन के बारे में बातचीत शुरू की.

हालांकि ये सुशील झा का सौभाग्य था कि वो इस धोखाधड़ी के जाल में फंसे नहीं. लेकिन वो ये ज़रूर मानते हैं कि वो लगभग-लगभग इस बात को लेकर आश्वस्त हो गए थे कि फ़ोन पर मौजूद दूसरी ओर का शख़्स कोई धोखेबाज़ नहीं बल्कि असल आदमी है.

पूरे भारत में इस तरह के कुछ लोग मौजूद हैं जो इस तरीक़े का गड़बड़-घोटाला करके पैसा बना रहे हैं.

साल 2018 से लेकर अभी तक शहर में इस तरह के क़रीब 11 कॉल सेंटर्स का भंडाफोड़ हो चुका है. ताज़ा मामला गुजरात के भरूच का है. लेकिन इस तरह के सेंटर सिर्फ़ गुजरात में हैं ऐसा नहीं है. अहमदाबाद क्राइम ब्रांच के तहत आने वाले साइबर क्राइम सेल में इंस्पेक्टर वीबी बाराड का कहना है कि नोएडा, गुरुग्राम, जयपुर, पुणे और वडोदरा में भी इस तरह के फर्जी कॉल सेंटर पकड़े गए हैं.

आख़िर इन कॉल सेंटर्स में काम कौन लोग करते हैं...?

वीबी बाराड कहते हैं कि ये ज़रूरी नहीं है कि इन कॉल सेंटर्स में काम करने वाले लोग स्नातक हों लेकिन हां ये ज़रूर है कि इन लोगों को ठीक-ठाक अंग्रेज़ी बोलना आता है.

बीबीसी गुजराती से बात करते हुए बाराड ने बताया कि जो लोग यहां पहले से काम कर रहे होते हैं वे नए लोगों को सिखाते हैं. वो नए लोगों को काम के दौरान अपने पास ही बैठाते हैं और हर छोटी-बड़ी बात समझाते हैं. ये सबकुछ समझने के लिए ना ही बहुत अधिक योग्यता की ज़रूरत होती है और ना ही बहुत अधिक वक़्त ही लगता है. नए लोग देखते ही देखते सीख जाते हैं और पूरी प्रक्रिया समझने के साथ ही काम शुरू कर देते हैं.

इस काम के लिए कोई तय वेतनमान नहीं है. कहीं इसी काम के लिए किसी को 20 हज़ार रुपए प्रतिमाह दिये जाते हैं तो किसी को 60 हज़ार. हालांकि ज़्यादातर जगहों पर शुरुआत लगभग 15 हज़ार रुपए से ही होती है.

इन लोगों का काम बिल्कुल तय होता है. इन सभी के पास पहले से ही तय एक स्क्रिप्ट होती है. न लोगों को सिर्फ़ उसे पढ़ना होता है और हर कॉल पर ठीक उसी के अनुसार बात करनी होती है. एक ख़ास बात इन लोगों को अमरीका के रेवेन्यू डिपोर्टमेंट से जुड़ी अच्छी जानकारी होती है. मसलन वहां के पदाधिकारी और पद के बारे में इन लोगों को अच्छे से सिखाया-समझाया जाता है. कॉल करने वाले ज़्यादातर लोग ख़ुद को आईआरएस (इंटर्नल रेवेन्यू सर्विसेज़) अधिकारी बताते हैं.

सबसे पहले लोगों के पास "कॉलर्स" का फ़ोन जाता है. इसके बाद एक और फ़ोन किया जाता है जिसका मक़सद लोगों को डराने का होता है ताकि दूसरी ओर वाला शख़्स डरकर उनकी बातें मान ले.

बाराड दावा करते हैं "जो लोग भी यह काम कर रहे थे उन्हें पता था कि वो ऐसा करके अपराध कर रहे हैं."

चोरी के डाटा की मदद से चलाया जाता है ये पूरा रैकेट

यह धोखाधड़ी तब तक संभव नहीं है जब तक किसी के पास किसी अन्य शख़्स से जुड़ी जानकारियां न हों. ऐसे में ये फ्रॉड कंपनियां सबसे पहले ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से डेटा ख़रीदती हैं और ये डेटा बेचने वाली कंपनियां भी इन्हीं की तरह फ़र्ज़ी होती हैं. असल में साइज़ और टाइप से तय होता है कि फलां कंपनी कैसी है.

आमतौर पर इन डेटा मे उन लोगों का नाम औऱ मोबाइल नंबर होता है जिनकी कार या कोई वाहन चोरी हुआ होता है. इसके अलावा उन लोगों की भी जानकारी होती है जो टैक्स चोरी करते हैं.

टेक्स डिफेंस नाम की साइबर इंवेस्टिगेशन कंपनी के सीईओ सनी वघेला का कहना है कि डेटा बेचने वाले कंपनियां एक आदमी की जानकारी बीस सेंट से लेकर एक डॉलर तक में बेचती हैं.

मसलन, ऐसा कोई शख़्स जिसने टैक्स भरने को लेकर गड़बड़ी की हो और उसका नाम पहली बार बाहर या सामने आ रहा है तो उससे जुड़ी जानकारी एक अमरीकी डॉलर में बेची जाएगी. लेकिन जैसे-जैसे ये नाम और उससे जुड़ी जानकारी एक हाथ से दूसरे हाथ को बढ़ेगी, उसकी क़ीमत कम होती जाएगी.

सनी बताते हैं कि अगर किसी शख़्स का नंबर पहली बार इस्तेमाल किया जा रहा है तो इस बात की उम्मीद बहुत अधिक होती है कि पैसे निकल जाएंगे लेकिन जैसे-जैसे ये नंबर दूसरे कॉल सेंटर्स के पास पहुंच जाता है इस बात की संभावना कम होती जाती है कि पैसे मिलेंगे.

सनी आगे बताते हैं कि डेटा हासिल करने के तीन तरीक़े होते हैं. पहला की आप किसी एजेंट के मार्फ़त डेटा लें. दूसरा इस काम के लिए आप किसी हैकर की मदद लें जो अमरीका या कनाडा में सरकार की आधिकारिक वेबसाइट को हैक करके सोशल सिक्योरिटी नंबर हासिल कर ले और तीसरा रास्ता है कि आप ई-कॉमर्स वेबसाइट्स से ये जानकारी लें.

आमतौर पर डेटा का लेन-देन हार्ड कॉपी के माध्यम से होता है, पेन ड्राइव का इस्तेमाल किया जाता है. बहुत बार हार्ड डिस्क और क्लाउड स्टोरेज से भी जानकारी ले ली जाती है.

इंस्पेक्टर बाराड कुछ ऐसे उदाहरण का ज़िक्र भी करते हैं जिनमें डेटा का ग़लत इस्तेमाल किया गया.

वो बताते हैं "मान लीजिए जिस इंसान की कार खोई है उसके पास पुलिस का फ़ोन आता है कि आपकी कार मिल गई है लेकिन आपकी कार की पिछली सीट पर खून के धब्बे मिले हैं, ऐसे में जिस शख़्स की कार खोई है वो क़ानूनी पचड़ों में फंसने से बचने के लिए हर बात मानने को तैयार हो जाता है."

अब इसमें चीन का क्या लेना-देना है?

इन कॉल सेंटर्स को जो पैसा मिलता है वो चीन से होता हुआ आता है. जिस किसी को भी ये कंपनियां अपना शिकार बनाती हैं उनसे कहा जाता है कि वे गूगल प्ले कार्ड ख़रीदें. इधर दूसरी तरफ़ कॉल सेंटर का स्टाफ़ चीन में विक्रेता को कार्ड नंबर भेजता है.

बाराड कहते हैं कि ये एक बड़ा सवाल हो सकता है कि क्या ये विक्रेता भी इस सारी जालसाज़ी का हिस्सा होते हैं.

ये विक्रेता अमरीकी पैसे को आरएमबी में बदल देते हैं और इसके बदले पूरे ट्रांज़ेक्शन का बीस फ़ीसदी लेते हैं. इसके बाद इन सभी कॉल सेंटर्स कंपनी को हवाला के माध्यम से चीनी मुद्रा ट्रांसफ़र कर दी जाती है. कभी-कभी भारतीय व्यापारी अपने चीनी साझेदारों से बी इस मामले में डील करते हैं.

आख़िर इन लोगों को दबोचना इतना मुश्किल क्यों है?

ज़्यादातर कॉल सेंटर्स छोटी वित्तीय कंपनियों के छलावरण के साथ काम करती हैं. पहली नज़र में ये कंपनियां किसी भी साधारण कॉल सेंटर जैसी ही नज़र आती हैं. लेकिन असलियत ये है कि इनका रात में काम करना इनके लिए फ़ायदेमंद साबित होता है और ये सारा काम चोरी-छिपे बंद दरवाज़ों के भीतर होता है. इनका कहीं रजिस्ट्रेशन नहीं होता है और न ही ये किसी स्थापित कंपनी के तौर पर काम करती हैं. जो लोग यहां काम करने आते हैं वो अच्छे कपड़ों में होते हैं, स्वभाव के अच्छे मालूम पड़ते हैं और ज़्यादातर युवा होते हैं.

जो डेटा ये लोग इस्तेमाल करते हैं, इसके अलावा जो स्क्रिप्ट इन्हें दी जाती है वो क्लाउड आधारित सर्वर पर सेव की जाती है और कर्मचारी ज्यादातर इंकॉनिटो मोड पर गूगल क्रोम का इस्तेमाल करते हैं ताकि किसी भी तरह से नज़र में न आएं. इसके अलावा कंपनियां प्रॉक्सी ब्राउज़र का भी इस्तेमाल करती हैं.

डायरेक्ट इनवार्ड डायलिंग टेक्नॉलजी का इस्तेमाल किया जाता है ताकि दूसरी ओर जो शख़्स फ़ोन उठा रहा है उसे किसी तरह का कोई शक़ न हो. इस टेक्नॉलजी की मदद ले एक टेलीफ़ोन लाइन से कई नंबरों से बात की जा सकती है. इसका मतलब ये हुआ कि एक आदमी एक ही लाइन से कई लोगों को कॉल कर सकता है.

भारत में इस अपराध के लिए आईटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया जाता है और साथ ही आईपीसी की धारा 384, 420 और 419 के तहत भी मामला दर्ज किया जाता है. हालांकि अभी तक जितने भी पीड़ित लोगों के नाम सामने आए हैं वे अमरीका के रहने वाले थे ऐसे में शिकायतकर्ता को खोजना पुलिस के लिए चुनौती भरा है. इसके अलावा कितने रुपये की धोखाधड़ी हुई है ये भी नहीं पता चल पाता. इस वजह से आरोपियों को आसानी से ज़मानत मिल जाती है.

अहमदाबाद पुलिस ने हाल ही में एफ़बीआई को संभावित पीड़ितों की एक सूची सौंपी है. ऐसी उम्मीद की जा रही है कि इन कॉल सेंटर्स के बारे में और जानकारी प्राप्त होने पर इनके जाल को काट पाना आसान होगा.

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