दिल्ली क्राइम वेबसिरीज़: निर्भया रेप में डीसीपी छाया शर्मा ना होतीं तो

  • 27 मार्च 2019
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Image caption दिल्ली क्राइम में शेफाली शाह ने छाया शर्मा का किरदार वर्तिका चतुर्वेदी के नाम से निभाया है.

दिल्ली में एक बस में निर्भया के साथ गैंग रेप का वाक़या सभी भारतीयों को याद है. यह भयावह अपराध 2012 में 16 दिसंबर को हुआ था. एक युवती फ़िल्म देखने के बाद शाम में घर लौट रही थी तभी उस पर हमला हुआ था. इस हमले ने पूरे भारत के दिलो दिमाग को झकझोर दिया था.

इस ख़ौफ़नाक हमले पर नेटफ़्लिक्स के लिए पुलिस की जांच और उसकी प्रक्रियाओं पर ड्रामा सिरीज़ बनाई गई है. कई लोग पूछ रहे हैं कि इसकी ज़रूरत क्या है? अभिनेत्री शेफाली शाह का कहना है कि निर्भया गैंग रेप की कहानी को कहने को लेकर कभी कोई सवाल नहीं रहा.

शेफाली ने बीबीसी से कहा, ''एक व्यक्ति और एक महिला के तौर पर मेरे लिए निर्भया गैंग रेप रोशनी का बुझना, दर्द और यंत्रणा है. लेकिन मैंने स्क्रिप्ट पढ़ी तो लगा वो कोई और महिला थी जो पूरी लड़ाई को इंसाफ़ तक ले गई. उसने इस देश की सभी महिलाओं के लड़ाई लड़ी.

डीसीपी छाया शर्मा का होना

वो दूसरी महिला थी छाया शर्मा. तब छाया शर्मा दक्षिणी दिल्ली की डीसीपी थीं. रिची मेहता ने सात एपिसोड वाले 'दिल्ली क्राइम' नाम के इस ड्रामे में छाया शर्मा के किरदार का नाम वर्तिका चतुर्वेदी रखा है. मेहता कहते हैं कि वर्तिका उनकी वेब सिरीज़ की स्टार हैं लेकिन वो छाया शर्मा की ही प्रतिबिंब है. मेहता कहते हैं कि बिना छाया शर्मा के निर्भया रेप कांड की कहानी कुछ और ही होती.

मेहता कहते हैं, ''अगर महिला डीसीपी हॉस्पिटल पहुंचने वाली पहली शख़्स नहीं होती और पीड़िता को देखने का मौक़ा न मिला होता तो अपराधियों को पकड़ना आसान नहीं होता. छाया की प्रतिक्रिया बहुत ही मानवीय थी. एक महिला ने पूरे केस को लीड कर अंज़ाम तक पहुंचाया.''

उस रात की याद छाया शर्मा के मन में आज भी बैठी है. छाया से पूछा कि अगर वहां एक सीनियर ऑफिसर के रूप में वो नहीं पहुंचतीं तो क्या इस केस का नतीजा कुछ और होता. छाया कहती हैं इस पर कुछ भी कहना मुश्किल है. छाया शर्मा ने बीबीसी से कहा, ''मुझे नहीं पता कि अगर इस केस को एक पुरुष डीसीपी देखता तो कुछ अलग होता. मैं इस पर कुछ नहीं कह सकती हूं. यह उसकी संवेदनशीलता पर निर्भर करता है, चाहे वो पुरुष हो या महिला.''

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छाया कहती हैं, ''एक महिला होने के नाते इस केस में मुझ पर लोगों ने भरोसा किया. जब ये रेप हुआ तो ऐसा लगा कि मेरे भीतर भी कुछ घटित हुआ है. पीड़िता की स्थिति बिल्कुल ख़राब थी और उसे देख मैं अंदर से विचलित हो गई थी. लोग पीड़िता की स्थिति को लेकर अलग-अलग बातें कर रहे थे.''

रेप को भयानक तरीक़े से अंज़ाम दिया गया था. सरिया से भी हमला किया गया था. इसकी वजह से हालात और बिगड़ गए थे क्योंकि अंदरूनी ज़ख़्म बहुत ही डरावने थे. डॉक्टर ने ज़ख़्मों के बारे में जो बताया है उसे सुनने के बाद सांस रुक जाती है.

दिल्ली क्राइम में डीसीपी वर्तिका चतुर्वेदी का किरदार निभाने वाली शेफाली शाह से छाया शर्मा ने कहा कि प्रोफ़ेशन और ख़ुद के व्यक्तित्व में एक दूरी होनी चाहिए. लेकिन इस मामले में कुछ अलग ही स्थिति थी. उस वक़्त पूरे देश में लोगों की भावना में समानता थी.

वो कहती हैं, ''अगर आप किसी और की बेटी को नहीं बचा सकते हैं तो अपनी बेटी की रक्षा क्या करेंगे? मैंने इसे तटस्थ होकर नहीं देखा बल्कि पूरी हमदर्दी के साथ देखा. मेरा मानना है कि इस रेप में जो हुआ था वैसा कोई कैसे कर सकता है. कई बलात्कार हुए हैं लेकिन इस मामले में जो ज़ख़्म दिया गया था वो हिलाने वाला था. मैंने जैसा महसूस किया वैसे ही इस केस को आगे बढ़ाया.''

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छाया शर्मा छह दिनों तक दिन रात दफ़्तर में ही रहीं

छाया शर्मा एक बार फिर से अगले तीन दिनों के लिए घर नहीं गईं. शर्मा की टीम का पूरा ध्यान गुनाहगारों को पकड़ने पर था क्योंकि उन्हें पता था कि थोड़ी सी भी चूक हुई तो मामला हाथ से फिसल जाएगा. भारतीय अख़बारों में इस वेब सिरीज़ की आलोचना भी हो रही है कि इसका पूरा फ़ोकस पीड़िता पर होने के बजाय पुलिस पर है.

हफ़पोस्ट इंडिया में पियाश्री दासगुप्ता ने लिखा है, ''इसमें केवल पुलिस का मानवीय चेहरा दिखाया गया है. बाक़ी के किरदारो में- प्रदर्शनकारी, दोषियों के परिवार, पीड़िता के संबंधी, मीडिया, नेताओं और सिविल सोसायटी को बहुत ही बनावटी दिखाया गया है ताकि का दिल्ली पुलिस को दिखाया जा सके कि वो कैसे बहादुरी से काम कर रही थी. दिल्ली पुलिस ने जो किया ये उसकी जॉब है और इसके लिए उसे पैसे मिलते हैं.''

हालांकि भारत में पुलिस पर लोगों के भरोसे के लेकर आम धारणा है कि वो ठीक से काम नहीं करती. ख़ास करके यौन अपराधों के मामले में पुलिस की भूमिका को लोग संदिग्ध मानते हैं. नवंबर 2017 में ह्यूमन राइट्स वॉच की एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी.

इस रिपोर्ट के अनुसार ज़्यादातर पीड़िताएं यौन अपराधों को लेकर रिपोर्ट दर्ज कराने गईं तो उन्हें पुलिस ने अपमानित किया. यहां तक कि मामले भी नहीं दर्ज किए गए.

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि इन मामलों में इंसाफ़ मिलने की दर काफ़ी चिंताजनक है. बीबीसी ने हाल ही में एक रियलिटी चेक रिपोर्ट प्रकाशित की थी और हमने पाया था कि इन मामलों में एक तिहाई मुक़दमें ही मुकाम तक पहुंच पाते हैं. निर्भया केस में पुलिस की सफलता का कारण मेहता बताते हैं कि इसमें बड़ी टीम बनी थी और अच्छे अधिकारियों को शामिल किया गया था.

इस रेप केस को लेकर भारत में काफ़ी ग़ुस्सा था. आख़िर ऐसा क्यों हुआ? मेहता मानते हैं कि निर्भया केस बहुत ही दर्दनाक था. यह भारतीय समाज और सिस्टम की बड़ी नाकामी थी. इस केस में दिल्ली पुलिस ने वो सबकुछ किया जो किया जाना चाहिए था.

इस वेब सिरीज़ में दिल्ली पुलिस के पास संसाधनों के अभाव को भी दिखाया गया है. एक फोरेंसिक टीम के लिए कैसे दिल्ली पुलिस को जूझना पड़ा.

शेफाली शाह कहती हैं कि हम केवल ये कहकर आगे नहीं बढ़ सकते कि दिल्ली पुलिस ने अपना काम किया. वो कहती हैं मसला ये है कि दिल्ली पुलिस ने किन हालात में काम किया. पूरी टीम ने जिन हालात में काम किया और मुकाम तक पहुंचाया इसकी तारीफ़ होनी चाहिए थी लेकिन नहीं हुई.

कुछ अधिकारियों की परिवार वालों से एक से दो महीने बाद मुलाक़ात हुई. पूरी टीम ने कम संसाधनों में दिन रात काम किया. शेफाली कहती हैं कि यह टीम जितना बेहतर कर सकती थी उससे कहीं ज़्यादा किया.

मेहता इस पर पहले वेब सिरीज़ बनाने को लेकर अनिच्छुक थे क्योंकि उन्हें डर था कि यह मामला इतना संवेदनशील है कि कहीं कुछ गड़बड़ ना हो जाए.

मेहता कहते हैं, ''मुझे शुरू में लगा कि इस पर ड्रामा सिरीज़ बनाना ठीक नहीं होगा. मुझे लगा कि इस पर किसी को फ़िल्म नहीं बनानी चाहिए. लेकिन कोर्ट के फ़ैसले को पढ़ने के बाद और इस जांच में शामिल लोगों से मिलकर मेरा मन बदला.'' शेफाली शाह कहती हैं कि यह केवल रचनात्मक मामला नहीं था बल्कि इसमें इतनी परतें हैं कि उनसे गुजरते हुए हम सब पर इसका प्रभाव पड़ा.

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