कांग्रेस की 'आय पर चर्चा' क्या बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती साबित होगी?

  • 28 मार्च 2019
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Image caption कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला के साथ

48 सालों बाद कांग्रेस पार्टी की तरफ़ से एक बार फिर से 'ग़रीबी हटाओ' का नारा बुलंद हो रहा है- हां, इस बार इसे पार्टी 'न्याय' के नाम से पुकार रही है.

पार्टी की घोषणा के मुताबिक़ ये योजना देश की सबसे ग़रीब 20 फ़ीसदी जनता को एक न्यूनतम आमदनी मुहैया करवाने की कोशिश का हिस्सा है.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सोमवार को दिल्ली में कहा कि उनकी पार्टी की सरकार बनने पर देश के हर ग़रीब परिवार को सालाना 72 हजार रुपये दिए जाएंगे.

इसे ग़रीबी पर 'आखिरी प्रहार' क़रार देते हुए युवा नेता ने कहा कि इससे देश के पांच करोड़ परिवारों को या 25 करोड़ लोगों को ग़रीबी से बाहर निकाला जा सकेगा.

कांग्रेस आक्रामक

कांग्रेस पार्टी के इस ऐलान पर हालांकि मीडिया और कई अर्थशास्त्रियों ने सवाल उठाए हैं. भारतीय जनता पार्टी तो ये कहकर मज़ाक़ भी उड़ा रही है कि कांग्रेस यही नारा बार-बार लगाती रहती है.

लेकिन पार्टी के जानकार मानते हैं कि लोकसभा चुनाव की गर्मी धीरे-धीरे बढ़ रही है पार्टी ने ये पासा फेंककर उस बहस को एक नया मोड़ दे दिया है, जो हाल तक महज़ पुलवामा, भारत-पाकिस्तान और एयर स्ट्राइक तक ही केंद्रित नज़र आ रहा था.

ये पूछे जाने पर कि क्या ये कांग्रेस के चुनावी हथियारों में से एक है, पार्टी के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला महज़ मुस्कुरा भर देते हैं.

सुरजेवाला सवाल करते हैं, "अपनी 89 विदेश यात्राओं पर 2 हज़ार 10 करोड़ और अपने प्रचार-प्रसार पर पांच हज़ार करोड़ ख़र्च करनेवाले मोदीजी ये बताएं की वो न्याय के पक्षधर हैं या विरोधी, क्या वो देश के सबसे ग़रीब लोगों के रहन-सहन को बेहतर किए जाने की कोशिश के ख़िलाफ़ हैं?"

योजना के बारे और विस्तार से बताते हुए वो कहते हैं, "ये पैसे सीधे महिलाओं के खातों में ट्रांसफर किए जाने की योजना है और इसके चलते पहले से चल रहे किसी भी योजना को बंद नहीं किया जाएगा."

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सुरजेवाला ने मंगलवार सुबह ख़ासतौर पर इसी मुद्दे पर मीडिया से बातचीत की. इसके कुछ घंटे बाद दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने भी बातचीत के लिए प्रेस को बुलाया - यानी चौबीस घंटों के भीतर एक ही मुद्दे पर कांग्रेस ने मीडिया से दो बार बातचीत की.

राजनीतिक विश्लेषक और लेखक नीलंजन मुखोपाध्याय कहते हैं, "कांग्रेस की कोशिश है कि वो चुनावों को मूल आर्थिक मुद्दों जैसे ग़रीबी, बेरोज़गारी जैसे मुद्दों की तरफ़ मोड़े."

नरेंद्र मोदी पर एक किताब लिख चुके नीलंजन मुखोपाध्याय कहते हैं, "पुलवामा, बालाकोट, पायलट अभिनंदन की वापसी जैसे मुद्दों की वजह चुनाव में बहस राष्ट्रवाद के मुद्दे तक सिमटती दिख रही थी, बीजेपी ख़ुफ़िया एजेंसियों की नाकामी पर सवाल उठाने तक को भारतीयता से जोड़ने में कामयाब दिख रही थी जो एक तरह से उसके लिए अच्छा था, क्योंकि उसे अलग-अलग मुद्दों से निपटने के लिए कई तरह की रणनीति नहीं बनानी पड़ती, लेकिन ये विपक्ष के लिए मुश्किलें पैदा कर रहा था."

मुखोपाध्याय हंसते हुए कहते हैं, "आर्थिक मुद्दों के उठने से 'चाय पर चर्चा', अब 'आय पर चर्चा' बन सकती है."

पहले रफ़ाल और अब ग़रीबी

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Image caption पुलवामा के बाद चुनावों में भी एक ही तरह का नरेटिव सुनने में आ रहा था

कांग्रेस पार्टी हाल के दिनों में बहुत आक्रामक तौर पर रफ़ाल लड़ाकू विमान ख़रीद घोटाले का मामला उठाती रही है लेकिन कुछ लोगों का मानना था कि ये मुद्दा वोटरों को उस तरह से नहीं छू पा रहा था.

इसी बीच, भारत प्रशासित कश्मीर के पुलवामा में अर्धसैनिक बल के क़ाफ़िले पर बड़ा हमला हो गया और पूरी बहस राष्ट्रवाद, पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते और उसे सबक़ सिखाने जैसे मुद्दे तक सीमित होने लगी.

पुलवामा के बाद तो कांग्रेस कैंप में कुछ इस तरह की ख़ामोशी छाई कि विश्लेषकों तक ने कहा कि पार्टी सकते में है. हालांकि बाद में ख़ुद राहुल गांधी और पार्टी के कई नेताओं ने सुरक्षा में चूक के मुद्दे को उठाया.

सोमवार को कांग्रेस द्वारा 'न्याय' योजना की बात करने के बाद मीडिया स्पेस में राहुल गांधी का नया चुनावी वायदा पटा पड़ा दिख रहा है.

1971 में भी इंदिरा गांधी ने 'ग़रीबी हटाओ' का नारा दिया था. ये वो वक़्त था जब कांग्रेस दो हिस्सों में बंट चुकी थी कुछ नेतागण 'इंदिरा हटाओ, देश बचाओ' का नारा लगा रहे थे. तब पूर्व प्रधानमंत्री ने ग़रीबी हटाओं का नारा दिया और न सिर्फ़ भारी जीत दर्ज की बल्कि पार्टी में उनकी पकड़ बेहद मज़बूत हो गई.

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