झारखंड पुलिस की हिरासत में तीन घंटे रहे ज्यां द्रेज

  • 28 मार्च 2019
ज्यां द्रेज

मशहूर सोशल एक्टिविस्ट ज्यां द्रेज को झारखंड के गढ़वा में पुलिस ने हिरासत में लेने के बाद छोड़ दिया. उनके साथ दो और लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया था.

तब सुबह के दस बजे थे. गढ़वा जिले के बिशुनपुरा पोखरा चौक पर करीब 60-70 लोगों की भीड़ थी. वे मशहूर अर्थशास्त्री और सोशल एक्टिविस्ट ज्यां द्रेज से मिलने पहुंचे थे. इसके लिए 'राइट टू फूड' कैंपेन ने एक कार्यक्रम का आयोजन किया था.

तभी झारखंड पुलिस ने वहां पहुंचकर ज्यां द्रेज और उनके साथियों को हिरासत में ले लिया. इस कारण उनकी मीटिंग नहीं हो सकी.

पुलिस उन्हें लेकर बिशुनपुरा थाने पहुंची और करीब तीन घंटे की हिरासत के बाद दोपहर सवा एक बजे उन्हें रिहा कर दिया.

उनके साथ हिरासत में लिए गए 'राइट टू फूड' कैंपेन के विवेक ने बताया कि हिरासत के दौरान पुलिस ने पहले तो कई धाराओं में एफ़आईआर की धमकी दी. बाद में एक बॉन्ड भरने को कहा गया. उस पर लिखा था कि उन्हें प्रशासन या पुलिस से कोई शिकायत नहीं है.

ज्यां द्रेज ने ऐसा लिखकर देने से इनकार कर दिया. इसके कुछ देर बाद पुलिस ने हम लोगों को थाने से ही रिहा कर दिया.

विवेक ने बीबीसी से कहा, "हिरासत के दौरान पुलिस ने हमें बताया कि हमारे खिलाफ आचार संहिता के उल्लंघन समेत कुछ संज्ञेय धाराओं में रिपोर्ट दर्ज करायी जाएगी और हमे जमानत लेनी होगी. हम लोगों ने इसका विरोध किया, क्योंकि हमारी सभा कहीं से गैरवाजिब नहीं थी."

"हिरासत के दौरान पुलिस ने हमें फोन पर बातचीत नहीं करने दी और थाना प्रभारी की निगरानी में रखा गया."

"अब हम लोग एक मीटिंग कर आगे की रणनीति तय करेंगे. यह पुलिस कार्रवाई हमारे लिए सदमे की तरह है."

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अधिकारियों के तर्क

अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक और झारखंड पुलिस के प्रवक्ता एम एल मीणा ने बताया कि आदर्श आचार संहिता लगी होने के कारण किसी भी सभा के लिए प्रशासनिक अनुमति ली जानी चाहिए थी. ज्यां द्रेज के कार्यक्रम के आयोजकों ने यह इजाजत नहीं ली थी. इसलिए उन्हें हिरासत में लिया गया था.

वहीं, गढ़वा की एसपी शिवानी तिवारी ने कहा कि ज्यां द्रेज से बातचीत के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया है. उनसे किसी भी तरह के कागजात पर दस्तख़त नहीं कराए गए हैं.

एसपी शिवानी तिवारी ने बीबीसी से कहा - "संभव है कि ज्यां द्रेज को भी यह पता नहीं रहा हो कि उनके कार्यक्रम के लिए प्रशासनिक अनुमति नहीं ली गयी है. हम लोगों ने उन्हें बताया कि लोकसभा चुनाव के कारण निषेधाज्ञा लगी है. उन्हें किसी भी तरह की मीटिंग के लिए इजाजत लेनी चाहिए थी. इसके बाद जरुरी औपचारिकताएं पूरी कर उन्हें रिहा कर दिया गया."

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कैसा है यह लोकतंत्र?

बीबीसी संवाददाता आदर्श राठौर से बातचीत में ज्यां द्रेज ने कहा कि उन्हें प्रशासन और पुलिस से शिकायत है. वो कहते हैं, "मीटिंग की अनुमति के लिए लिखित में दस दिन पहले आवेदन भी दिया गया था लेकिन "प्रशासन ने मीटिंग की अनुमति क्यों नहीं दी. चुनाव के समय ये बेहद ज़रूरी है कि लोग अपने मुद्दों के बारे में बात करें और चर्चा के लिए जगहें हों."

"पुलिस के दोहरे मापदंड क्यों हैं? इसी गांव में बीती रात को एक बड़ी बैठक का आयोजन हुआ था. लेकिन पुलिस ने कोई कदम नहीं उठाया."

"मुझे गठ़वा में आयोजित कार्यक्रम में बतौर वक्ता के रूप में बुलाया गया था. इस मीटिंग में किसी राजनीतिक पार्टी की भागीदारी का कोई सवाल नहीं था."

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ज्यां द्रेज कहते हैं, "मुझे लगता है कि मूल मुद्दा ये है कि इस तरह की मीटिंग और चर्चाओं को बंद करने की कोशिश की जा रही है. साथ ही ये चिंता का भी विषय है कि हर तरह की अभिव्यक्ति को ख़त्म करने की कोशिश हो रही है."

ज्यां द्रेज ने कहा, "अगर लोगों को चुनाव के समय शांतिपूर्ण ग़ैर-राजनीतिक मीटिंग करने का भी अधिकार नहीं है तो लोकतंत्र का कोई अर्थ नहीं रह जाता है."

इस बीच राइट टू फूड कैंपेन के सिराज दत्ता ने बताया कि पुलिस की कार्रवाई बेहद निंदनीय और अलोकतांत्रिक है. चुनाव आचार संहिता का बहाना लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार करना और उन्हें डराना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं है. इसका विरोध किया जाना चाहिए.

राहुल गांधी ने की निंदा

इस बीच कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने फेसबुक पोस्ट कर ज्यां द्रेज को हिरासत मे लिए जाने की निंदा की है.

उन्होंने कहा है कि झारखंड में भाजपा ने वैसे सभी लोगों के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा है, जो गरीबों और वंचित समुदाय के लोगों के लिए काम करते हैं. उन्होंने कहा कि मैं ज्यां द्रेज को हिरासत में लिए जाने से चिंचित हूं.

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