बीजेपी के प्रति लोगों की राय बदलना चाहती हैं माफ़ूज़ा ख़ातून

  • 29 मार्च 2019
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पश्चिम बंगाल में बीजेपी की पहली अल्पसंख्यक महिला उम्मीदवार माफ़ूज़ा ख़ातून पार्टी के प्रति आम लोगों की धारणा बदलना चाहती हैं.

मुर्शिदाबाद ज़िले के जांगीपुर संसदीय सीट से पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पुत्र अभिजीत मुखर्जी के ख़िलाफ़ मैदान में उतरी ख़ातून को अबकी अपनी जीत का भरोसा है.

वह दावा करती हैं, "अबकी इलाक़े में लोगों का भरपूर समर्थन मिल रहा है. सब लोग इस बार यहां कांग्रेस की जगह बीजेपी को जिताने की बात कह रहे हैं."

माफ़ूज़ा ख़ूतून अपने चुनाव अभियान के दौरान इलाक़े के बीड़ी मज़दूरों की समस्याओं को समझने का प्रयास कर रही हैं ताकि जीतने के बाद इस मुद्दे को संसद में उठा सकें.

कांग्रेस के गढ़ में पहली अल्पसंख्यक महिला उम्मीदवार बना कर पार्टी ने उन पर जो भरोसा जताया है उसके लिए वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा अध्यक्ष अमित शाह और प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष के प्रति आभार जताती हैं.

सीपीएम के टिकट पर दक्षिण दिनाजपुर ज़िले की कुमारगंज सीट से दो-दो बार (वर्ष 2001 और 2006) विधायक रहीं माफ़ूज़ा ख़ातून ने वर्ष 2016 के विधानसभा चुनावों में पराजय के साल भर बाद बीजेपी की प्राथमिक सदस्यता ली थी.

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'बीजेपी पहले जैसी नहीं रही'

बीते साल बंगाल में पंचायत चुनावों के दौरान अपने भाषणों से वे सुर्खियों में आईं. उसी वजह से बीजेपी के प्रदेश नेतृत्व ने अबकी माफ़ूज़ा को टिकट देने की सिफ़ारिश की थी.

उम्मीदवारी के एलान के अगले दिन ही जांगीपुर पहुंच कर उन्होंने अपना चुनाव अभियान शुरू कर दिया है.

अब रोज़ाना सुबह आठ बजे से संसदीय क्षेत्र के अलग-अलग इलाक़ों में कड़ी धूप में पैदल प्रचार करना, छोटी-छोटी सभाएं करना और उसके बाद आधी रात तक स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ बैठक में अगले दिन के कार्यक्रम को अंतिम रूप देना उनकी नियमित दिनचर्या बन गई है.

माफ़ूज़ा कहती हैं, "बीजेपी अब पहले जैसी नहीं रही. बंद कमरे में होने वाली बैठकों के दौरान भी पार्टी का कोई नेता अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ नहीं बोलता. लेकिन बाहर से इस बदलाव को समझना मुश्किल है. मैं पार्टी के बारे में वोटरों की धारणा बदलना चाहती हूं. बीजेपी के अल्पसंख्यक-विरोधी पार्टी होने की छवि बना दी गई थी."

उनका दावा है कि कई अल्पसंख्यक संगठन भी यहां बीजेपी का समर्थन कर रहे हैं. मोदी जी के सबका साथ सबका विकास नारे पर लोगों का भरोसा मज़बूत हो रहा है.

लेकिन लंबे अरसे तक सीपीएम में रहने और दो-दो बार विधायक बनने के बाद आपने बीजेपी में शामिल होने का फ़ैसला क्यों किया?

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सीपीएम से बीजेपी में शामिल होने का फ़ैसला

वो कहती हैं, "नरेंद्र मोदी मुस्लिम महिलाओं की तकलीफ़ पर ध्यान देने और उसे दूर करने की दिशा में पहल करने वाले पहले प्रधानमंत्री हैं. उनकी पहल और विकास के एजेंडे से प्रभावित होकर ही मैंने बीजेपी का दामन थामने का फ़ैसला किया."

माफ़ूज़ा कहती हैं कि जांगीपुर इलाक़े के लगभग 24 लाख से ज्यादा की आबादी में से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से 60 फीसदी लोग बीड़ी बनाने के धंधे से जुड़े हैं.

इनकी कई समस्याएं हैं. लेकिन अब तक राज्य सरकार या किसी सांसद ने उन पर ध्यान नहीं दिया था. अब वे उन समस्याओं को समझ रही हैं ताकि दिल्ली में उनको उठा सकें.

खातून को पार्टी ने बीते साल मुर्शिदाबाद ज़िला मुख्यालय बहरमपुर का पर्यवेक्षक बनाया था. जांगीपुर लोकसभा क्षेत्र में बीजेपी का असर बीते कुछ वर्षों में लगातार बढ़ा है.

यह दिलचस्प है कि वर्ष 2009 के लोकसभा चुनावों के बाद हर बार जहां कांग्रेस और सीपीएम के वोटों में लगातार गिरावट दर्ज की गई वहीं बीजेपी के वोट लगातार बढ़े हैं.

वर्ष 2009 में 1.28 लाख वोटों के अंतर से यह सीट चुनाव जीतने वाले प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रपति बनने की वजह से वर्ष 2012 में इस सीट से इस्तीफ़ा दे दिया था.

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Image caption पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के बेटे अभिजीत मुखर्जी

कांग्रेस का घटता जनाधार

उस साल हुए उपचुनावों में प्रणब के पुत्र अभिजीत कांग्रेस के टिकट पर जीत तो गए, लेकिन उनकी जीत का अंतर महज़ ढाई हज़ार वोटों का रहा.

महज़ तीन साल में कांग्रेस के वोटों का आंकड़ा भी 15 फीसदी घट गया. पारंपरिक रूप से यह सीट कांग्रेस का गढ़ मानी जाती है. लेकिन यहां उसकी हालत लगातार कमज़ोर हो रही है.

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को मिलने वाले वोटों में 20 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आई थी और अभिजीत लगभग आठ हज़ार वोटों से चुनाव जीते.

वर्ष 2009 और 2012 में यहां कोई उम्मीदवार नहीं देने वाली तृणमूल कांग्रेस 2014 में तीसरे स्थान पर रही. उसे 18.54 फीसदी वोट मिले थे.

यहां सीपीएम के वोटों में भी लगभग 7.45 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई. वर्ष 2009 के चुनावों में यहां 2.33 फीसदी वोट पाने वाली बीजेपी के वोट बढ़ कर 8.65 फीसदी तक पहुंच गए.

अबकी लेफ्ट फ्रंट ने इस सीट पर अपना उम्मीदवार नहीं उतारा है. लेकिन बावजूद इसके अभिजीत यहां तृणणूल कांग्रेस और भाजपा के साथ तिकोनी लड़ाई में फंसे हैं.

79 फीसदी साक्षरता दर वाले जांगीपुर इलाक़े में खेती और बीड़ी बनाना ही लोगों की रोज़ी-रोटी का मुख्य ज़रिया है.

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अल्पसंख्यक मतदाताओं पर दारोमदार

साल 2011 की जनगणना के मुताबिक़, जांगीपुर की आबादी में 67 फ़ीसदी अल्पसंख्यक हैं. इस जातीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए ही कांग्रेस के अलावा बाक़ी दलों के उम्मीदवार अल्पसंख्यक तबक़े से हैं.

बीजेपी उम्मीदवार माफ़ूज़ा खातून ने इलाक़े की अल्पसंख्यक महिलाओं की सबसे कमज़ोर नस पर हाथ रखा है.

वो कहती हैं, "ट्रिपल तलाक़ से मुस्लिम महिलाओं का जीवन नर्क हो गया है. मुर्शिदाबाद में इसकी शिकार महिलाओं की तादाद लगभग दो लाख है."

क्या खातून कांग्रेस के इस गढ़ में सेंध लगा सकेंगी? राजनीतिक विश्लेषक अभिजीत घोषाल कहते हैं, "ख़ातून को सुनने के लिए भीड़ तो जुट रही है. ख़ासकर महिलाओं के बीच उनकी लोकप्रियता भी बढ़ रही है. लेकिन उनके सामने इस भीड़ को वोटों में बदलने की कठिन चुनौती है."

घोषाल के अनुसार, "इसमें सफल होने की स्थिति में ही वे यहां इतिहास बनाने में कामयाब होंगी."

शायद यही इतिहास रचने के लिए माफ़ूज़ा कड़ी धूप की परवाह किए बिना इलाक़े का भूगोल मापने में जुटी हैं.

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