सेंसेक्स पहली बार 39000, क्या चुनाव से जुड़े हैं तार?

  • 1 अप्रैल 2019
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भारत में आम चुनावों का बिगुल बज चुका है और पहले चरण की वोटिंग का काउंटडाउन भी शुरू हो चुका है. काउंटडाउन नई सरकार के लिए भी है और मई ख़त्म होते-होते तस्वीर साफ़ हो जाएगी कि अगली सत्ता किसके हाथ होगी.

भारत के पड़ोसियों की ही नहीं, पूरी दुनिया की नज़रें इन चुनावों पर लगी हैं. सियासत के दांव-पेंचों से जुड़ी हर ख़बर के साथ दुनियाभर के उन निवेशकों की सांसें ऊपर-नीचे हो रही हैं, जिनका पैसा भारतीय बाज़ारों में लगा हुआ है और मोटे मुनाफ़े की उम्मीद में वो लगातार भारतीय बाज़ारों पर भरोसा बनाए हुए हैं.

मार्च के महीने में तो शेयर बाज़ारों को मानों पंख ही लग गए और अप्रैल की पहली तारीख़ को सेंसेक्स ने इतिहास ही रच दिया. पहली बार सेंसेक्स 39,000 के आंकड़े को भी पार कर गया.

तो भारतीय अर्थव्यवस्था में ऐसा क्या हो गया कि शेयर बाज़ारों में हर तरफ़ ख़रीदारी का माहौल है या फिर ये चुनावों की वजह से है और ये सेंटिंमेंट भी कि अगली सरकार स्थिर और आर्थिक सुधारों को आगे ले जाने वाली होगी?

अकेले मार्च में ही बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का संवेदी सूचकांक सेंसेक्स और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी 7 फ़ीसदी से अधिक उछल गया.

बाज़ार में बुल रन

कहा ये जाता है कि शेयर बाज़ार अटकलों पर अधिक चलता है. कहावत भी है....बॉय ऑन रूमर्स एंड सेल ऑन न्यूज़ (अफ़वाहों पर ख़रीदो और ख़बर आने पर बेच दो). तो बाज़ार में ऐसी क्या अटकलें चल रही हैं कि हर कोई शेयरों में ख़रीदारी करता हुआ दिख रहा है?

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आर्थिक मामलों के जानकार सुदीप बंद्योपाध्याय कहते हैं, "बाज़ार का चतुर खिलाड़ी वही है जो राजनीतिक या आर्थिक फ़ैसलों का तुरंत विश्लेषण कर पाता हो, उस फ़ैसले का दूरगामी असर क्या होगा और कितना होगा. मसलन अमरीका का केंद्रीय बैंक जब भी कुछ अहम घोषणा करता है तो इसका असर दुनियाभर के शेयर बाज़ारों पर होता है. लेकिन इस घोषणा का फ़ायदा उठाने के लिए निवेशक को फॉर्मूला रेसर जैसी तेज़ी दिखानी होती है."

लेकिन सुदीप मानते हैं कि शेयर बाज़ार की मौजूदा रैली विदेशी निवेशकों के बूते आई है.

रिकॉर्ड ख़रीदारी

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफ़पीआई) ने रिकॉर्ड ख़रीदारी की है. मार्च में अब तक एफ़पीआई 34 हज़ार करोड़ रुपये से अधिक की ख़रीदारी कर चुके हैं, जो कि भारतीय शेयर बाज़ार के इतिहास में अब तक किसी महीने में सबसे अधिक ख़रीदारी का रिकॉर्ड है.

इससे पहले, मार्च 2017 में एफ़पीआई की ख़रीदारी का आंकड़ा 30,906 करोड़ रुपये रहा था.

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दिल्ली स्थित एक सिक्योरिटीज़ ब्रोकरेज़ फ़र्म से जुड़े रिसर्च हेड आसिफ़ इक़बाल कहते हैं कि एफ़पीआई की ये रणनीति वाक़ई चौंकाने वाली है. विदेशी निवेशकों ने शेयरों के अलावा डेट मार्केट में भी मोटी रक़म डाली है और मार्च में तक़रीबन 13 हज़ार करोड़ रुपये शेयरों के मुक़ाबले अधिक सुरक्षित माने जाने वाले डेट मार्केट में लगाया है. यानी विदेशी निवेशकों का मार्च का कुल निवेश देखें तो ये 43 हज़ार करोड़ रुपये से अधिक का हो जाता है.

हालाँकि मार्च में ही घरेलू संस्थागत निवेशकों यानी म्यूचुअल फंड्स ने 15,654 करोड़ रुपये की बिकवाली की थी. तो घरेलू और विदेशी निवेशकों की रणनीति में ये अंतर क्यों है?

आसिफ़ इक़बाल कहते हैं, "मार्च में म्यूचुअल फंड्स पर रिडम्पशन का दबाव रहता है. बड़ी संख्या में लोग म्यूचुअल फंड्स से पैसा निकालते हैं. इसके अलावा चुनाव भी चल रहे हैं, बाज़ार में पैसे की ज़रूरत है."

इसके अलावा, वैश्विक स्तर पर भी कुछ वजहों से विदेशी निवेशकों ने नफ़े के लिए भारत का रुख़ किया है. सुदीप बंद्योपाध्याय कहते हैं, "यूरोप और अमरीका में कारोबारी गतिविधियां कुछ सुस्त हुई हैं. यहाँ तक कि कुछ अर्थशास्त्री इसे मंदी के संकेत तक मान रहे हैं. ऐसे में मुनाफ़े के लिए विदेशी निवेशकों को ज़बर्दस्त खपत वाले भारतीय बाज़ार मुफ़ीद लग रहे हैं."

अमरीका में मंदी की आशंका

अमरीकी बॉन्ड बाज़ार में उलटा यील्ड कर्व देखने को मिला है. ऐसा अक्सर तब देखने को मिलता है, जब लंबी अवधि के डेट इंस्ट्रूमेंट की यील्ड छोटी अवधि के डेट इंस्ट्रूमेंट की यील्ड से कम हो जाती है. हर मंदी से पहले अमरीका में ऐसा यील्ड कर्व देखने को मिला है और इसे मंदी का संकेत माना जाता है.

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हालाँकि अमरीका में मंदी आएगी ही, ये ज़रूरी नहीं है. अर्थशास्त्री सुनील सिन्हा कहते हैं, "अभी मंदी की घोषणा कर देना जल्दबाज़ी है. हमें अमरीका में इस महीने के विकास दर के आंकड़ों का इंतज़ार करना चाहिए. साथ ही ये भी देखना चाहिए कि डोनल्ड ट्रंप सरकार इसकी समीक्षा किस रूप में करती है."

एक और फ़ैक्टर है जो भारतीय बाज़ारों को अभी रास आ रहा है. कच्चा तेल नियंत्रण में है और जब विदेशी निवेशक डॉलर लेकर आ रहे हैं तो रुपये की सेहत तो सुधरनी ही है. डॉलर के मुक़ाबले रुपया मज़बूत हुआ है और अब एक डॉलर की क़ीमत तक़रीबन 69 रुपये है, जो पिछले साल अक्तूबर में साढ़े 74 रुपये थी.

करेंसी एक्सपर्ट एस सुब्रमण्यम कहते हैं, "कच्चे तेल की क़ीमतों का नियंत्रण में होना बड़ी वजह है. भारत को बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा पेट्रोल-डीज़ल की ख़रीद पर ख़र्च करनी होती है. ज़ाहिर है जब तेल सस्ता मिलेगा तो विदेशी मुद्रा की बचत तो होगी है. उस पर से विदेशी फंडों का भारत में निवेश और समय-समय पर रिज़र्व बैंक की डॉलर नीलामी की प्रक्रिया से रुपये में मज़बूती आई है."

सस्ते क़र्ज़ की उम्मीद

इसके अलावा एक और उम्मीद ने भारतीय शेयर बाज़ारों को पंख लगाए हैं और वो है सस्ते क़र्ज़ की उम्मीद. अगले महीने दो अप्रैल से भारतीय रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति यानी एमपीसी की बैठक होगी. तीन दिन तक चलने वाली इस बैठक में रेपो रेट (वह दर जिस पर रिज़र्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को उधारी देता है) में कटौती का फ़ैसला हो सकता है.

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आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने 25 मार्च को वित्त मंत्री अरुण जेटली से मुलाक़ात की थी, हालाँकि शक्तिकांत दास ने इस मुलाक़ात को 'सामान्य मुलाक़ात' बताया था. उन्होंने कहा, "परंपरा है कि मौद्रिक नीति की समीक्षा से पहले गवर्नर, वित्त मंत्री से मुलाक़ात करता है. तो ये इसी का हिस्सा है."

रिज़र्व बैंक ने फ़रवरी में ब्याज दरों में 0.25 फ़ीसदी कटौती की थी और अभी ये 6.25 फ़ीसदी है. 18 महीनों के लंबे इंतज़ार के बाद उसने ग्राहकों के लिए क़र्ज़ और सस्ता किया था.

आसिफ़ इक़बाल कहते हैं, "खुदरा महंगाई दर नियंत्रण में है. फ़रवरी में 2.57 प्रतिशत के स्तर पर थी और चार महीने की ऊंचाई पर थी, लेकिन अब भी ये आरबीआई के 4 प्रतिशत के बेंचमार्क से नीचे है. ऐसे में रेपो रेट में चौथाई बेसिस प्वाइंट (0.25%) कटौती की गुंजाइश तो है ही."

हालाँकि ये बात अलग है कि कई बैंकों ने आरबीआई की इस कटौती का पूरा लाभ ग्राहकों को नहीं दिया था और सिर्फ़ ब्याज दरों में 10 बेसिस प्वाइंट की ही कटौती की थी.

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