पश्चिम यूपी के वे इलाके जहां हिंदू-मुस्लिम का एक-दूसरे के बिन गुज़ारा नहीं

  • 31 मार्च 2019
मेरठ के हाशिमपुरा मोहल्ले के हाजी बाबुद्दीन (सफेद कपड़ों में) और विपिन कुमार रस्तोगी (काले कपड़ों में)
Image caption मेरठ के हाशिमपुरा मोहल्ले के हाजी बाबुद्दीन (सफेद कपड़ों में) और विपिन कुमार रस्तोगी (काले कपड़ों में)

मेरठ के हाशिमपुरा मोहल्ले को एक सड़क चीरती हुई निकलती है और इसे दो भागों में बाट देती है. इसके एक तरफ़ हाजी बाबुद्दीन जैसे मुस्लिम आबाद हैं और दूसरी तरफ विपिन कुमार रस्तोगी जैसे हिन्दुओं की दुकानें हैं.

बाबुद्दीन और रस्तोगी एक दूसरे को 30 साल से जानते हैं लेकिन इनकी दुनिया बिलकुल अलग है.

बाबुद्दीन भारतीय जनता पार्टी के कट्टर विरोधी हैं और रस्तोगी इस पार्टी के कड़े समर्थक. हमेशा की तरह इस बार भी तय है कि 11 अप्रैल को आम चुनाव के पहले चरण में बाबुद्दीन महागठबंधन के प्रत्याशी और पूर्व राज्य मंत्री हाजी याक़ूब क़ुरैशी को अपना वोट देंगे और रस्तोगी दो बार सांसद रह चुके बीजेपी के उमीदवार राजेंद्र अग्रवाल को.

इनके बीच कुछ समान नहीं है. लेकिन, पिछले 30 सालों से एक सच ने इन्हें एक-दूसरे से कस कर बाँध रखा है और वो है कारोबार में एक-दूसरे पर निर्भरता. वहां रहने वाले लोगों के अनुसार ये कारोबार सालाना 300 करोड़ रुपये का है.

बाबुद्दीन 120 पॉवरलूम मशीनों के मालिक हैं और मेरठ के दो सबसे अमीर बुनकरों में से एक हैं. दो मंज़िला घर के ऊपर वो अपने परिवार के साथ रहते हैं जहाँ अभी उन्होंने एक आधुनिक रसोई घर बनवाई है, जिसे वो गर्व के साथ लोगों को दिखाते हैं. हिंदू मुसलमान विवादों के आविष्कार का सियासी फ़ॉर्मूला

मकान के नीचे कपड़ा बनाने वाली मशीनें लगी हैं जिनसे हर वक़्त तेज़ आवाज़ें निकलती रहती हैं.

उनके कारख़ाने में कपड़े बनते हैं जिसे रस्तोगी थोक में ख़रीदते हैं. वो बाबुद्दीन के अकेले ग्राहक नहीं हैं लेकिन उनके सभी हिन्दू थोक ग्राहकों में सबसे ज़्यादा माल ख़रीदने वाले ज़रूर हैं.

Image caption मेरठ के हाशिमपुरा मोहल्ले के हाजी बाबुद्दीन (सफेद कपड़ों में) और विपिन कुमार रस्तोगी (काले कपड़ों में)

'हम परिवार की तरह हैं'

बाबुद्दीन कहते हैं, "हिन्दू थोक दुकानदारों के बग़ैर मेरा काम नहीं चलता और हम बुनकरों के बग़ैर उनका नहीं. हम एक-दूसरे पर पूरी तरह से निर्भर हैं."

रस्तोगी के मुताबिक़, "धंधे में विचारधारा, धर्म और जाती काम नहीं आतीं. बाबुद्दीन को मैं 30 सालों से जानता हूँ. वो एक परिवार की तरह हैं. हमारे विचार अलग हैं. हम वोट अलग-अलग पार्टियों को देते हैं. मज़ाक़ में एक-दूसरे की खिंचाई ज़रूर करते हैं मगर हम धंधे में भावना को जगह नहीं देते."

आर्थिक मजबूरी उन्हें एक-दूसरे से बांध कर रखती है. थोड़े समय के लिए रस्तोगी ने एक अलग व्यापार शुरू किया था जो नहीं चला. जब वो वापस लौटे तो उनका अनुभव बहुत अच्छा था.

वो भावुक होकर कहते हैं, "मुस्लिम बुनकरों ने मेरा ऐसा स्वागत किया कि मुझे लगा कि मैं अपने परिवार में वापस आ गया हूँ."

कपड़ों के अलावा कई दूसरे व्यवसायों में भी हिन्दू-मुस्लिम समाज की एक-दूसरे पर निर्भरता दिखाई देती है जो सराहनीय है क्यूंकि सांप्रदायिक दंगों के इतिहास वाला मेरठ शहर हिन्दू-मुस्लिम के बीच नाज़ुक रिश्ते के लिए जाना जाता है.

अफवाहों के कारण भी यहाँ सांप्रदायिक तनाव पैदा हो जाता है. लेकिन बाबुद्दीन और रस्तोगी जैसे लोगों के बीच घनिष्ट संबंधों के कारण अक्सर मामला बेकाबू नहीं होता.

Image caption कैराना में बीजेपी कार्यकर्ता शिव कुमार चौहान गुर्जर समाज से हैं

शामली में दोनों समुदायों का कारोबार

मेरठ के अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दूसरे शहरों और ग्रामीण इलाक़ों में भी हिन्दू-मुस्लिम आर्थिक निर्भरता की मिसालें मिलती हैं. शामली के सलीम त्यागी कहते हैं कि उनके शहर में गन्ने की काश्त हो या मुरादाबाद में पीतल का काम दोनों समुदायों का एक-दूसरे के बग़ैर गुज़ारा नहीं हो सकता.

कैराना में बीजेपी कार्यकर्ता शिव कुमार चौहान गुर्जर समाज से हैं. जब हमने उनसे बात की तो उनके साथ बीजेपी के कुछ और कार्यकर्ता भी बैठे थे.

हुक़्क़े पे चली चर्चा के दौरान उन्होंने बताया कि यहाँ चुनाव में बीजेपी और गठबंधन दोनों ने गुर्जर उम्मीदवार खड़े किये हैं. समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) के महागठबंधन की उम्मीदवार तबस्सुम हसन आरएलडी की हैं. उन्होंने जब 2018 में उपचुनाव जीता था तो उन्हें हिन्दू और मुस्लिम गुर्जरों दोनों ने वोट दिया था.

जाट और गुर्जर, हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदाय में

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की आबादी 27 प्रतिशत है. राष्ट्रीय औसत केवल 14 प्रतिशत के मुक़ाबले में ये कहीं ज़्यादा है. इनमें 70 प्रतिशत किसान हैं.

यहाँ के अधिकतर मुसलमान ग़रीब हैं. उनके पूर्वज हिन्दू थे. इसलिए जाट और गुर्जर हिन्दू समाज में भी हैं और मुस्लिम समुदाय में भी. अधिकतर मुस्लिम धनी हिन्दू जाटों के खेतों पर काम करते हैं.

Image caption आरएलडी की रैली

पिछले आम चुनाव से पहले मुज़फ़्फ़रनगर और शामली जैसे शहरों और देहातों में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे थे जिसमें हिन्दू जाटों और मुस्लिम समाज के बीच दशकों से चली आ रही सांप्रदायिक सद्भावना प्रभावित हुई थी.

इसका नतीजा ये हुआ कि समाज सांप्रदायिक मुद्दों पर बंट गया. मतों के ध्रुवीकरण के नतीजे में हिन्दुओं ने बीजेपी को वोट दिया और मुसलमानों ने बीजेपी के ख़िलाफ़.

बीजेपी ने यहाँ की तमाम 8 सीटें आसानी से जीत लीं. पहले चरण के रुझान को देखते हुए बाक़ी के चरणों में उत्तर प्रदेश के दूसरे इलाक़ों में भी मत बीजेपी के हक़ में पड़ा. पार्टी ने राज्य की 80 सीटों में से 71 सीटें जीतीं.

Image caption बीजेपी की रैली

'राजनीतिक दलों की साजिश'

भारतीय किसान यूनियन के धर्मेंद्र मलिक कहते हैं, "हिन्दू और मुसलमानों के बीच दंगों के बाद जो दूरियां बढ़ी थीं वो बीजेपी और समाजवादी पार्टी सरकारों का एक प्रोपेगंडा था. इसे दंगे का रूप दिया गया, वो बीजेपी की एक सोची-समझी रणनीति थी कि जाट राजनीति को मुस्लिम से अलग किया जाए. इस दंगे को वो मुस्लिम बनाम जाट बनाने में कामयाब रहे."

लेकिन इस इलाक़े के हिन्दू और मुस्लिम कहते हैं कि इस बार ऐसा नहीं होगा. हालात बदल चुके हैं. हिन्दू-मुस्लिमों के बीच फिर से सद्धभावना का माहौल का बन चुका है.

मुज़फ़्फ़रनगर में सामाजिक कार्यकर्ता असद फ़ारूक़ी कहते हैं, "मुसलमानों और जाटों को अब एहसास हो गया है कि एक का काम दूसरे के बग़ैर नहीं चल सकता. मुस्लिम कामगार जाटों के खेतों में काम करते थे. आज जाटों को मुस्लिम कामगारों की ज़रूरत है और मुसलमानों को जाटों के खेतों में काम करने की ज़रूरत है. आर्थिक दृष्टि से वो एक-दूसरे से अलग नहीं हो सकते."

धर्मेंद्र मलिक के मुताबिक़ उनके संगठन ने दोनों समुदायों के बीच दूरियों को कम करने की पूरी कोशिश की है.

Image caption बीजेपी की रैली

वह कहते हैं, "दोनों बिरादरी को एहसास हुआ कि सत्ता में उनका प्रतिनिधित्व ख़त्म हो चुका है. पिछले साल कैराना में जो लोकसभा का उपचुनाव हुआ उसमें एक बदलाव देखने को मिला कि दोनों समुदायों ने राष्ट्रीय लोक दल की उम्मीदवार तबस्सुम को जिताया."

हमारे साथ बैठे कैराना के बीजेपी समर्थकों ने हुक़्क़े पर कश लेते हुए आश्वासन दिया कि हिन्दू-मुस्लिम दंगे अब नहीं होंगे. शिव कुमार चौहान कहते हैं कि गुर्जर समाज में अब एकता है. वो याद दिलाते हैं कि मुस्लिम गुर्जर 100 साल पहले हिन्दू ही थे. सांस्कृतिक समानता से वो आज भी एक ही समुदाय हैं और एक-दूसरे के त्योहारों और शादियों में शामिल होते रहते हैं.

हो सकता है कि हिन्दू-मुस्लिम दंगे आगे भी हों, सांप्रदायिक तनाव की स्थिति आगे भी पैदा हो, लेकिन जब तक मेरठ वाले हाजी बाबुद्दीन और विपिन कुमार रस्तोगी के बीच कारोबारी निर्भरता बनी रहेगी तब तक इन दंगों और तनावपूर्ण माहौल पर काबू पाना आसान होगा.

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