लोकसभा चुनाव 2019: यूपी में एसपी की नैया छोड़ अब बीजेपी का बेड़ा पार कराएँगे निषाद?

  • 31 मार्च 2019
योगी- अखिलेश यादव इमेज कॉपीरइट Getty Images

सचमुच राजनीति भी क्रिकेट की तरह ही संभावनाओं का खेल है.

महज एक साल पहले जिस डॉ संजय निषाद ने तीन दशक से गोरक्षपीठ का पर्याय बन चुकी गोरखपुर संसदीय सीट को उससे छीन लेने में कामयाबी हासिल की थी, अब कुल 380 दिन बाद अपने राजनीतिक सफ़र की अचानक डगमगाई नाव सँभालने के लिए उसी गोरक्षपीठ को मज़बूत बनाने में लग गए हैं.

यह मामूली उलटफेर नहीं है क्योंकि महज तीन दिन पहले निषाद पार्टी के यही राष्ट्रीय अध्यक्ष विपक्षी गठबंधन के नेता अखिलेश यादव की प्रेस कांफ्रेंस में उनके बगल में विराजमान थे.

उस दिन खबरें तो यहाँ तक थीं कि गोरखपुर संसदीय सीट - जहाँ से उनके पुत्र प्रवीण निषाद ने समाजवादी पार्टी के चुनाव चिन्ह पर पिछले उपचुनाव में ऐतिहासिक जीत हासिल की थी - के अलावा पूर्वी उत्तर प्रदेश की एक और अहम सीट महाराजगंज से खुद डॉ संजय निषाद भी गठबंधन के प्रत्याशी हो सकते हैं.

हालांकि प्रेस कांफ्रेंस में यह सवाल पूछे जाने पर भी अखिलेश ने इसका कोई संकेत नहीं दिया.पिछले कुछ हफ़्तों से आशंकाओं और अटकलों का दबाव झेल रहा ये रिश्ता दरअसल उसी दिन चटक गया था.

एक दिन बाद ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने मुस्कुराहट बिखेरते संजय निषाद की तस्वीर वायरल-पथ पर दौड़ लगा रही थी.

ये ऐसी खबर थी जिसने उनके अपने समर्थकों से ज्यादा भारतीय जनता पार्टी के उस स्थानीय काडर को भौंचक कर दिया जो निषाद के खिलाफ लड़ी जाने वाली जंग के लिए नारे गढ़ रहा था.

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हैरत इसलिए भी थी क्योंकि हर कोई यह मान कर चल रहा था कि सपा और निषाद पार्टी के कब्ज़े में जा चुकी इस प्रतिष्ठापरक सीट को दोबारा हासिल करने के लिए इस बार बीजेपी भी निषाद समुदाय के ही किसी नेता को टिकट देगी.

इन अटकलों को तब और पंख लगे जब इस इलाके के सबसे प्रभावशाली निषाद परिवार के वारिस अमरेन्द्र निषाद ने कुछ हफ्ते पहले सपा छोड़कर बीजेपी की सदस्यता ग्रहण कर ली. ऐसा माना जाने लगा था कि मौजूदा सांसद प्रवीण निषाद के खिलाफ़ वे ही बीजेपी का चेहरा होंगे और यह लड़ाई निषाद वोटों के असली हकदार का चेहरा भी तय कर देगी.

सांसद का पता- गोरखनाथ मंदिर

गोरखपुर संसदीय सीट पर आज़ादी के बाद शुरूआती परचम भले ही कांग्रेस का फहराता था मगर बीते तीन दशक से यह बीजेपी की सर्वाधिक सुनिश्चित और सुरक्षित सीट बन गयी थी. इतनी कि हर चुनाव में पार्टी उम्मीदवारों की पहली सूची में इस सीट का नाम भी शामिल होता था और बीते तीन दशक से तो गोरखपुर के सांसद का पता गोरखनाथ मंदिर ही लिखा जाता था.

इसके पीछे इस इलाके में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बेहद ठोस नेटवर्क के अलावा उस गोरक्षपीठ की भी बड़ी भूमिका थी जो इस अंचल की पहचान और आस्था का सबसे बड़ा केंद्र रहा है. यही वजह थी कि 1951 से अब तक के 58 वर्षों में से 32 वर्ष तक गोरखपुर संसदीय सीट पर इसी पीठ के महंत सांसद होते रहे . इस अवधि में हुए 18 चुनावों में से 10 में जीत इस पीठ को ही हासिल होती रही.

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लेकिन पिछले साल हुए उपचुनाव में भाजपा हार गयी. यह न केवल पार्टी के लिए अप्रत्याशित था बल्कि सच कहें तो 2014 की मोदी लहर से पस्त हो चुके विपक्ष में नई जान फूंकने का काम भी गोरखपुर,फूलपुर और कैराना के उपचुनावों ने ही किया था.

अलबत्ता इस सीट से लगातार सांसद रहते आये योगी आदित्यनाथ के लिए ये बेहद असहज करने वाले नतीजे थे . यह अजीब संयोग था कि पिछले पचीस सालों में जबकि सूबे और एक बार को छोड़कर केंद्र में लगातार गैर भाजपाई सरकारें सत्ता में होती थीं तब योगी विपक्ष में होते हुए भी इस इलाके में बीजेपी का झंडा फहराते रहे थे लेकिन तब जबकि केंद्र और राज्य दोनों जगह उन्ही की पार्टी सत्ता में थी और वे खुद मुख्यमंत्री थे तब वे यह सीट गँवा बैठे थे.

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Image caption विजयी मुद्रा में प्रवीण निषाद

जाति का जादुई रसायन और निषाद पार्टी

गोरखपुर-बस्ती मंडल में निषाद राजनीति सियासत के केन्द्र बिंदु में है. गोरखपुर संसदीय क्षेत्र में निषादों की संख्या 3 से 3.50 लाख के बीच बताई जाती है. देवरिया में एक से सवा लाख, बांसगांव में डेढ़ से दो लाख, महराजगंज में सवा दो से ढाई लाख तथा पड़रौना में भी ढाई से तीन लाख निषाद बिरादरी के मतदाता हैं. मंडल के 28 विधानसभा क्षेत्रों में भी लगभग 30 से 50 हज़ार के बीच निषाद मतदाता माने जाते हैं.

पूर्वीं उत्तर प्रदेश में निषाद राजनीति का उभार स्व. जमुना निषाद के दखल के बाद माना जाता है. निषाद बिरादरी में आई राजनीतिक चेतना के बल पर सपा के टिकट पर जमुना निषाद ने 1999 के लोकसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ को कड़ी टक्कर दी और तब योगी की जीत का अंतर सिमट कर 7,339 वोट तक जा पहुंचा था.

एक ज़माने में निषाद बिरादरी की ये ताकत देखकर ही दस्यु सुंदरी से सांसद बनीं फूलन देवी के पति उमेद सिंह ने भी पिपराइच विधानसभा से अपना राजनीतिक भविष्य तलाशने की नाकाम कोशिश की थी. भोजपुरी फिल्म अभिनेत्री काजल निषाद भी इसी ताकत में ग्लैमर के तड़के के बल पर चुनावी मौसम में गोरखपुर का रूख करने से नहीं चूकती हैं. वे कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ चुकी हैं.

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यही वजह है कि तकरीबन सभी प्रमुख दलों में निषाद नेताओं की मौजूदगी दिखती है. जमुना निषाद की असामयिक मौत के बाद उनकी पत्नी राजमति सपा के टिकट पर पिपराइच सीट से विधायक रह चुकी हैं तो पुत्र अमरेन्द्र भी बीते विधानसभा चुनाव में पिपराइच सीट से सपा के टिकट पर मैदान में थे, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था.

बहरहाल बीते उपचुनाव से शुरू निषाद पार्टी और सपा के 'हनीमून' से उपेक्षित महसूस कर रहे मां-बेटे ने अब बीजेपी की सदस्यता ग्रहण कर ली है.

कभी चौरीचौरा से बसपा के टिकट पर विधायक रहे जयप्रकाश निषाद भी बदले परिदृश्य में बीजेपी का दामन थाम चुके हैं.

एक समय बसपा सरकार में मंत्री रहे रामभुआल निषाद की गिनती भी जाति के दबंग और ताकतवर नेताओं में होती है. इस बार सपा ने उन्हीं को गठबंधन का प्रत्याशी बनाया है.

कांग्रेस में भी निषाद नेताओं की कमी नहीं है. वर्ष 1985 में गोरखपुर जिले के पहले निषाद विधायक बने लालचंद निषाद सहित कई निषाद नेता कांग्रेस में हैं.

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गोरखपुर और आसपास निषादों की संख्या के चलते ही यहां निषादों को अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र और आरक्षण देने की मांग भी उठी थी. डॉ संजय निषाद इसी लहर पर सवार होकर निषादों के नेता बने. संजय निषाद भी राजनीति में आने से पहले पूर्वांचल मेडिकल इलेक्ट्रो होम्योपैथी एसोसिएशन नाम का संगठन चलाते थे.

उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की शुरुआत 2008 में हुई जब उन्होंने ऑल इंडिया बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी वेलफेयर एसोसिएशन का गठन किया मगर वे पहली बार 7 जून 2015 को सुर्खियों में तब आये थे जब गोरखपुर से सटे सहजनवां के कसरावल गांव के पास निषादों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर उनके नेतृत्व में ट्रेन रोकी गई थी और हिंसक प्रदर्शन के बीच एक आंदोलनकारी की पुलिस फायरिंग में मौत के बाद आंदोलनकारियों ने बड़ी तादाद में गाड़ियों को आग लगा दी थी.

2016 में संजय निषाद ने निषाद पार्टी का गठन किया. इस निषाद (N I S H A D ) संक्षिप्त अक्षर का विस्तार 'निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल' था.

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पिछले विधानसभा चुनाव में निषाद पार्टी ने पसमांदा मुसलमानों पर अच्छी पकड़ रखने वाली पीस पार्टी के साथ मिलकर प्रदेश की 80 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा था. खुद संजय निषाद ने भी गोरखपुर ग्रामीण सीट से चुनाव लड़ा था लेकिन वह हार गए थे. उनकी पार्टी को ज्ञानपुर सीट से जीत हासिल हुई थी जहां से विजय मिश्रा चुनाव जीते थे.

बहरहाल जब गोरखपुर उपचुनाव की सुगबुगाहट शुरू हुई तो निषाद बहुल इस सीट पर उनकी सक्रियता को देखते हुए सपा ने निषाद पार्टी को विलय का प्रस्ताव दिया था लेकिन संजय निषाद ने उसे मना कर दिया.

बाद में सपा ने उनको तवज्जो देते हुए उनके बेटे प्रवीण निषाद को अपने प्रत्याशी के तौर पर इस चुनाव में उतारा और ये चुनाव जीत कर उन्होंने अचानक अपनी ताकत कई गुना बढ़ा ली.

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