#BBCRiverStories: ना नौकरी, ना ज़रूरी शिक्षा, तो कैसे मिले रोज़गार- लोकसभा चुनाव 2019

  • 1 अप्रैल 2019
नांदेड़ में युवा

''अगर 38 साल के पीएचडी धारक शख़्स को नौकरी नहीं मिल रही है तो इस पर सवाल होना चाहिए कि देश और राज्य का भविष्य क्या होगा?''

बेरोज़गारी के प्रभाव को लेकर सवाल पूछने पर महाराष्ट्र के नांदेड़ के रहने वाले चंद्रकांत गजभरे ने तपाक से ये जवाब दिया. चंद्रकांत पीएचडी कर रहे हैं और उन्हें पैसे कमाने के लिए ऑटोरिक्शा चलाना पड़ता है.

चंद्रकांत 15 सालों से नौकरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं. उनके पास समाज विज्ञान में एमए की डिग्री है. उन्होंने दो बार नेट-सेट की परीक्षा दी है और अब उनकी पीएचडी भी पूरी होने वाली है.

फिर भी उनके पास एक निश्चति आय का ज़रिया नहीं है जिससे उनकी मूलभूत ज़रूरतें पूरी हो सकें.

चंद्रकांत ने नौकरी के लिए हर तरह की कोशिश की. उन्होंने होटल में वेटर तक का काम किया. दूसरे शहरों में भी नौकरी ढूंढने की कोशिश की लेकिन किराये पर रहने के कारण उनके लिए पैसे बचाना मुश्किल हो गया था. इसलिए वो वापस नांदेड़ चले आए.

सुबह के समय वो गेस्ट लेक्चर के तौर पर काम करते हैं लेकिन उससे भी पर्याप्त आय नहीं हो पाती.

उन्होंने दिन में ऑटो चलाने का कारण बताया. चंद्रकांत बताते हैं, ''मेरे जैसे लोगों के लिए शिक्षा ही जीने का एकमात्र रास्ता है. इसलिए मैंने उच्च शिक्षा हासिल की पर मुझे इससे जुड़ी नौकरी नहीं मिली. ऐसे में दूसरे शहर में जाकर किसी कंपनी या होटल में काम करने के बजाय मैंने इसी शहर में रहकर कमाने का फैसले किया.''

Image caption पीएचडी कर रहे चंद्रकांत गजभरे ऑटोरिक्शा चलाते हैं.

चंद्रकांत के लिए कोई भी काम छोटा नहीं है. वह मानते हैं कि किसी भी पेशे को नीची नज़रों से नहीं देख जाना चाहिए. हालांकि, वो अपनी पढ़ाई जारी रखेंगे और नौकरी की तलाश करते रहेंगे.

चंद्रकांत अकेले ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जो उच्च शिक्षा पाने के बाद भी अजीविका के लिए संघर्ष कर रहें हैं. यहां के युवाओं से बात करने पर पता चलता है कि बेरोजगारी किस स्तर पर है और किस तरह की है.

सरकारी नौकरी को प्राथमिकता

पढ़ाई के लिए नांदेड़ आने वाले अधिकतर युवा ग्रामीण इलाकों से होते हैं. इनमें से कई युवा स्थायी भविष्य के लिए निजी कंपनियों के बजाय सरकारी नौकरी को प्राथमिकता देते हैं. यहां तक कि वो इसके लिए कुछ सालों का इंतज़ार करने के लिए भी तैयार रहते हैं.

कंप्यूटर साइंस की डिग्री वाले पंकज कुमार सोनकांबली ने भी सरकारी नौकरी करना चाहते हैं. उन्होंने स्टेनोग्राफर और इलैक्ट्रिशियन का भी प्रशिक्षण ​लिया है. लेकिन, उन्हें लगता है कि ये योग्यता नौकरी के लिए काफी नहीं है.

सरकारी नौकरी की चाह को लेकर वह कहते हैं, ''निजी कंपनियों में पहले अनुभव के बारे में पूछा जाता है. हमारे पास अनुभव नहीं है इसलिए हमें मौका नहीं मिलता.''

पंकज कुमार बताते हैं, ''हमने डिग्री कोर्स में कंप्यूटर की सी, सी++, ओरेकल लैंग्वेज पढ़ी हैं. लेकिन, ये लैंग्वेज लंबे समय पहले ही चलन से बाहर हो चुकी हैं. अगर आज हम नौकरी ढूंढने जाते हैं तो एंड्रॉयड, जावा के बारे में पूछा जाता है. अब मरे पास और कोई कोर्स करने या प्रशिक्षण के लिए पैसा नहीं है.''

Image caption बीसीए की डिग्री रखने वाले भूषण कांबले शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं.

बीसीए की डिग्री रखने वाले भूषण कांबले का अनुभव भी कुछ ऐसा ही है. वह शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, ''अगर हमें डिग्री के साथ आधुनिक जानकारी मिलती तो नौकरी के बाजार में आज हमारा भी कोई महत्व होता. हर कोई अतिरिक्त कोर्स नहीं कर सकता.''

भूषण इस बात पर भी जोर देते हैं कि शिक्षा और सरकारी नौकरियों में सिर्फ आरक्षण देना काफी नहीं है. वह कहते हैं, ''इस बात को लेकर गलतफहमी है कि आरक्षण से नौकरी की गारंटी मिलती है. ऐसा नहीं है. अगर कोई आरक्षण के तहत आता भी है तो उसे नौकरी पाने और काम करने के लिए संघर्ष करना ही पड़ता है.''

नौकरी की तलाश कर रहीं लड़कियों की कहानी कुछ और ही है. पेशे से इंजीनियर और सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहीं स्याली भरद कहती हैं कि आज भी महिलाएं कई तरह की मुश्किलों का सामना करती हैं.

वह कहती हैं, ''अगर हमें किसी और शहर में जाकर काम करना हो तो उसके लिए परिवार का बहुत दबाव झेलना पड़ता है. वो आसानी से इसके लिए नहीं मानते. मैंने पुणे में एक साल तक काम किया है लेकिन मुझे कुछ कारणों से वापस जाना पड़ा. मेरे परिवार का मानना है कि लड़कियों के लिए सरकारी नौकरी ही ज़्यादा सही है क्योंकि उसमें निजी कंपनियों जैसा काम का बोझ नहीं होता.''

बीएड और एमए कर चुके आनंद भिसे इस समस्या के एक अलग पक्ष की बात करते हैं. वह कहते हैं, ''नांदेड़ में अच्छे शिक्षण संस्थान हैं और यहां जो प्रशिक्षण मिलता है वो सरकारी नौकरी के लिए काफ़ी है. यहां कई कॉलेज भी हैं लेकिन उद्योग नहीं हैं और इसलिए यहां नौकरियां भी नहीं हैं.''

Image caption स्याली भरद ने लड़कियों के सामने आने वाली मुश्किलों के बारे में बताया.

कं​पनियों में कुशल कर्मचारियों की मांग

कई लोग स्थायी नौकरी की तलाश करते हैं लेकिन ये मिलना बहुत मुश्किल है. चाहे वो महिला हो या पुरुष, आरक्षित हो या अनारक्षित, हर किसी को नांदेड़ में रोजगार के लिए संघर्ष करना पड़ता है.

नांदेड़ से उद्योगपति और महाराष्ट्र चैंबर ऑफ कॉमर्स के सदस्य हर्शद शाह कहते हैं, ''कंपनियों को एक कुश्ल और पूर्णरूप से प्रशिक्षित कर्मचारी की ज़रूरत होती है लेकिन वो मिलना मुश्किल हो गया है और दूसरी तरफ़, लोग शिकायत करते हैं कि उन्हें नौकरियां नहीं मिल रही हैं.''

गोदावरी नदी के किनारे पर बसा नांदेड़ महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण शहर है. इस जिले की सीमाएं तेलंगाना और कर्नाटक से मिलती हैं. इसी शहर में सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह ने अपने जीवन का आखिरी समय बिताया था और यहां पर हुज़ूर साहिब गुरुद्वारा भी है. यही कारण है कि पूरी दुनिया से सिख नांदेड़ में आते हैं.

शहर में पानी और जमीन की कोई कमी नहीं है. इसकी सड़क, रेल और हवाई मार्ग से कनेक्टिविटी बेहतरीन है. हर्षद शाह के मु​ताबिक यहां पर उद्योगों और स्व-रोजगार के लिए बहुत संभावनाएं हैं.

वह कहते हैं, ''नांदेड़ में बहुत अच्छी कनेक्टिविटी है लेकिन यह उद्योग के लिए फायदेमंद नहीं है. यह यात्रियों के लिए ज़्यादा उपयुक्त है. नांदेड़ में सर्विस इंडस्ट्री अच्छा काम कर रही है लेकिन कुल मिलाकर स्थिति उद्योगों के लिए अनुकूल नहीं है.''

लेकिन, नांदेड़ ही नहीं कई और जगहों पर भी यही हालात हैं. खासतौर पर देश के अंदरूनी हिस्सों में.

Image caption नांदेड़ से उद्योगपति और महाराष्ट्र चैंबर ऑफ कॉमर्स के सदस्य हर्शद शाह

भारत में बेरोज़गारों की संख्या?

भारत सरकार के श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय द्वारा 2015-16 में जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक भारत में बेरोज़गारी दर 3.7 प्रतिशत थी.

न्यूज़ वेबसाइट बिजनस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय ने साल 2017-18 में यह आंकड़ा 6.1 बताया था लेकिन नीति आयोग ने इससे इनकार किया है.

हाल ही में सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी ने बेरोज़गारी दर 7.1 प्रतिशत बताई थी. हालांकि, भारत सरकारी की ओर से आधिकारिक आंकड़े जारी करना अब भी बाकी है.

सरकारी आंकड़े न होने के बावजूद भी वरिष्ठ अर्थशास्त्री एच.एम. देसारदा मानते हैं कि रोज़गार रहित विकास कुछ समय की हकीकत रहा है.

Image caption नांदेड़ में बंद पड़ी ऑयल मिल

बेरोज़गारी का समाधान

देसारदा कहते हैं, ''क्या लोग (डिग्री धारक भी) वाकई बेरोज़गार हैं या बेरोज़गारी एक व्यापक मसला है. 1990 के दशक में नौकरियां देने वाले संगठित उद्योग और सर्विस सेक्टर में अब रोज़गार पैदा नहीं हो रहा है.''

वह कहते हैं, ''इन नौकरियों के लिए ज़रूरी कुशलता और प्रशिक्षण ग्रामीण स्तर तक भी उपलब्ध करा दिया गया है. लेकिन, शिक्षा के मानक और स्तर अब भी अलग हैं. कंपनियों को उनकी ज़रूरत के मुताबिक कुशल कर्मचारी नहीं मिल रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ, सार्वजनिक क्षेत्र, सहकारी समितियों और बैंकों में नौकरियां कम हुई हैं. यहां तक कि सार्वजनिक क्षेत्र और शिक्षण संस्थानों में अनुबंध पर नौकरी देने को प्राथमिकता दी जाती है.''

देसारदा भी बताते हैं कि अधिकतर युवा खेती, स्व-रोजगार और नए विकल्पों से ज़्यादा सरकारी नौकरी पसंद करते हैं.

वह कहते हैं, ''जब यहां पुलिस और मंत्रालय में नौकरी निकलती है तो हम उम्मीदवारों की लंबी-लंबी लाइनें देखते हैं. दरअसल, निजी कंपनियों या स्व-रोजगार में कोई गारंटी या सुरक्षा नहीं है. खेती को भरोसेमंद विकल्प के तौर पर नहीं देखा जाता और इसलिए किसान, गरीब परिवार से आए युवा नौकरी पर ज़्यादा ध्यान देते हैं जो उन्हें एक स्थायी और सुरक्षित आय दे सके.''

ऐसे में समाधान क्या है? बेरोजगारी के दुष्चक्र को कैसे तोड़ा जाए?

देसारदा कहते हैं, ''विकेंद्रीकृत कृषि और उस पर आधारित उद्योग का विकास, इसका जवाब हो सकता है. लोगों की ज़रूरतों के मुताबिक कौशल सिखाने पर ज़्यादा ध्यान देना चाहिए जैसे कि रोज़ाना इस्तेमाल की चीज़ों की मरम्मत, सर्विस सेक्टर उद्योग आदि. इससे लोगों को आजीविका कमाने में मदद मिलेगी. एक बार गांधी जी ने कहा था कि बड़े पैमान पर उत्पादन नहीं बल्कि लोगों की बड़ी संख्या से उत्पादन हो. हमें इसी की ज़रूरत है.''

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