राहुल गांधी क्या अमेठी में हार के डर से वायनाड गए?: नज़रिया

  • 1 अप्रैल 2019
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लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी दो सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं. कांग्रेस ने आधिकारिक तौर पर ऐलान कर दिया है कि राहुल गांधी पहले से तय परंपरागत सीट अमेठी से चुनाव तो लड़ेंगे ही, साथ ही केरल का वायनाड से भी मैदान में उतरेंगे.

कांग्रेस का दावा है कि दक्षिण भारत में कांग्रेस की पकड़ को मजबूत करने के लिए राहुल गांधी ने ये फैसला लिया है. हालांकि जैसे ही ये घोषणा हुई बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने राहुल गांधी पर निशाना साधा कि वो बीजेपी के डर से भाग रहे हैं.

कांग्रेस का दावा है कि राहुल गांधी को दक्षिण भारत के इन तीनों राज्यों से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव भेजा गया था. केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक की प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने एक प्रस्ताव पारित कर कहा था कि राहुल गांधी उनके प्रदेश में कहीं से भी चुनाव लड़ें.

वायनाड ही क्यों?

वैसे राहुल गांधी के लिए वायनाड ही क्यों चुना गया. उसका एक कारण है कि केरल का वायनाड कांग्रेस का मजबूत गढ़ रहा है.

कांग्रेस नेता एमआई शनवास पिछले दो बार से चुनाव जीत चुके हैं और यहां बीजेपी रेस में भी नहीं रही है. 2014 में एमआई शनवास ने सीपीआई को हराकर इस सीट पर जीत दर्ज की थी.

इतना ही नहीं, 2009 में भी एमआई शनवास ने सीपीआई के एम रहमतुल्लाह को हराया था. बता दें कि यह सीट 2008 में परिसीमन के बाद सियासी अस्तित्व में आई थी. यह सीट कन्नूर, मलाप्पुरम और वायनाड संसदीय क्षेत्रों को मिलाकर बनी है.

वायनाड में पिछले चुनाव के वोट शेयर देखें तो कांग्रेस को 41.21 फीसदी मिले थे, वहीं बीजेपी को करीब 9 फीसदी और सीपीआई को करीब 39 फीसदी वोट मिले थे.

वोट शेयर में भी कांग्रेस की चिंता बीजेपी से कम और सीपीआई से ज्यादा है. सीपीआई कड़ा मुकाबला दे सकती है लेकिन कुछ समय से केरल में वाम सरकार से भी लोगों का मोह भंग होता दिख रहा है.

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वायनाड में पार्टी की आंतरिक कलह

कांग्रेस के सूत्रों के मुताबिक इस सीट को चुनने के पीछे का एक कारण पार्टी की भीतरी कलह को ख़त्म करना था. केरल कांग्रेस के दो बड़े नेता रमेश चेन्नीथ्ला और ओमान चांडी के बीच वायनाड सीट को लेकर मतभेद था.

तय नहीं हो पा रहा था कि वायनाड सीट से कौन उम्मीदवार हो. अब राहुल गांधी को मैदान में उतार कर इसका हल निकाला गया है.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि केरल में चुनाव लड़ने के पीछे एक और संदेश छुपा है. कांग्रेस कोशिश कर रही है कि वो अपना वर्चस्व पूरे देश में स्थापित करे और मुक़ाबला सिर्फ बीजेपी के साथ नहीं बल्कि हर उस पार्टी के ख़िलाफ़ है जो कांग्रेस का विरोध कर रही है.

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अमेठी से कांग्रेस का एक भी विधायक नहीं

साल 2014 में राहुल गांधी अमेठी से लगातार तीसरी बार सांसद बने थे. उन्होंने अपने प्रतिद्वन्दी बीजेपी की उम्मीदवार स्मृति ईरानी को 1,07,000 मतों से हराया था. जबकि 2009 में कांग्रेस अध्यक्ष की जीत का अंतर 3,50,000 से भी ज्यादा का रहा था.

उसके बाद से बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में बाकयदा अपना प्रभाव कायम किया. और उसका नतीजा दो साल पहले उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में दिखा.

बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में 404 विधानसभा सीटों में से 312 पर कब्ज़ा किया. आलम ये था कि अमेठी लोकसभा सीट के तहत पांच विधानसभा सीटें आती हैं. इनमें अमेठी ज़िले की तिलोई, जगदीशपुर, अमेठी और गौरीगंज सीटें शामिल हैं.

जबिक रायबरेली ज़िले की सलोन विधानसभा सीट आती है. 2017 के विधानसभा चुनाव में 5 सीटों में से 4 सीटों पर बीजेपी और महज एक सीट पर एसपी को जीत मिली थी.

हालांकि सपा-कांग्रेस गठबंधन करके चुनाव मैदान में उतरी थी, फिर भी जीत नहीं सकी थी. सपा ने तो गौरीगंज सीट जीत ली, लेकिन कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली.

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अमेठी उतनी सुरक्षित नहीं?

राहुल गांधी इससे पहले सिर्फ़ अमेठी से ही चुनाव लड़ते रहे हैं. राहुल गांधी लगातार तीन बार से उत्तर प्रदेश के अमेठी लोकसभा क्षेत्र से सांसद हैं.

ऐसी खबरें हैं कि अमेठी से स्मृति ईरानी राहुल गांधी को टक्कर दे रही हैं और इसके अलावा मेनका गांधी के सुल्तानपुर से चुनाव लड़ने के बाद से अमेठी में भी उसका असर पड़ सकता है.

इसे देखते हुए ही राहुल गांधी ने दो जगह से चुनाव लड़ने की रणनीति अपनाई है.

इंदिरा और सोनिया भी लड़ चुकीं हैं दक्षिण भारत से चुनाव

ऐसा नहीं है कि ये पहली बार है कि कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने एक साथ दो सीटों से चुनाव लड़ा है.

इंदिरा गांधी ने 1978 में कर्नाटक की चिकमंगलूर सीट से लोकसभा उपचुनाव जीता था. वहीं, सोनिया ने 1999 में कर्नाटक की ही बेल्लारी सीट जीती थी. उन्होंने सुषमा स्वराज को हराया था.

दो स्थान में चुनाव लड़ने में वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भी नाम आता है. उन्होंने 2014 चुनाव में वाराणसी और वडोदरा सीटों से लोकसभा चुनाव लड़ा था.

दोनों ही सीटों पर उन्होंने जीत हासिल की थी. हालांकि बाद में उन्होंने वडोदरा सीट को छोड़ दिया था और वाराणसी सीट को चुना था.

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अब कांग्रेस की कोशिश है कि राहुल गांधी भी दो स्थानों से चुनाव लड़े और जीत हासिल करें. अमेठी में राहुल गांधी की टक्कर सीधे तौर पर भाजपा की केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी से होगी.

वहीं, वायनाड में कांग्रेस नीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट का सामना लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट से है. अब इन दोनों सीटों पर राहुल गांधी जीतेंगे और कौन सी सीट रखेंगे ये तो समय बताएगा.

हालांकि कयास ये भी लगाए जा रहे हैं कि राहुल भविष्य में अमेठी वाली सीट अपनी बहन प्रियंका गांधी को दे सकते हैं.

( ये लेखक के निजी विचार हैं )

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