लोक सभा चुनाव 2019: पश्चिम बंगाल में अर्श से फर्श तक कैसे पहुंचा वामपंथ- नज़रिया

  • 5 अप्रैल 2019
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लगभग 60 साल तक बंगाल की राजनीति में हर जगह नज़र आने वाले वामदलों की चर्चा इस बार के लोकसभा चुनावों में लगभग अनुपस्थित रहने के लिए हो रही है.

अगर आंकड़ों की नज़र से देखें तो वाम मोर्चा बंगाल में मौजूद है, लगभग हर सीट से चुनाव भी लड़ रहा है लेकिन लोगों के बीच होने वाली बहस, तमाम ओपिनियन पोल और चुनावी अभियान के नज़ारे, एक ही इशारा कर रहे हैं: वामदल कहीं गिनती में नहीं हैं.

एक ऐसे राजनीतिक निकाय के लिए, जो छह दशक तक लगातार सत्ता में रहा हो, उसके लिए ये बहुत बड़ी गिरावट है. इस बार के चुनावी समर में पश्चिम बंगाल में बस दो पार्टियां हैं- सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस और मुख्य विपक्षी भारतीय जनता पार्टी. लेफ़्ट और कांग्रेस सिमटकर न के बराबर हो गए हैं.

लेकिन ऐसा हुआ क्यों? इतने लंबे वक़्त तक सब पर भारी लेफ़्ट बंगाल में अचानक अप्रासंगिक कैसे हो गया?

इसका जवाब जानने के लिए हमें दो अलग-अलग वजहों की पड़ताल करनी होगा: बाहरी और अंदरूनी.

पहले अंदरूनी वजह की बात करते हैं: वाम मोर्चे की पहली और दूसरी सरकारों के शुरुआती वक़्त में, वामदल (ख़ासकर सीपीआईएम) सत्ता में अपने बने रहने को लेकर आश्वस्त नहीं थे.

1967 और 1969 के कड़वे अनुभवों की वजह से वो केंद्र को शक़ की नज़र से देखने लगे थे. इसलिए उन्होंने विशाल जनसमर्थन बनाने पर अपना ध्यान केंद्रित किया, ख़ासकर ग्रामीण बंगाल में.

भूमि सुधार से लेकर तीन स्तरीय पंचायत व्यवस्था शुरू करके वामदलों ने बंगाल के ग्रामीण इलाकों को सशक्त कर दिया. इस तरह बंगाल में उनका वोट बैंक मज़बूत हो गया और वो कई वर्षों तक सत्ता में बने रहे.

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आधार मजबूत होने से कमज़ोर पड़ने तक

चूंकि बंगाल का जनसंख्या घनत्व देश में सबसे ज़्यादा है इसलिए यहां खेती के लिए उपलब्ध ज़मीन कम है. साल 2000 के आंकड़ों के मुताबिक़ ग्रामीण बंगाल में एक व्यक्ति के पास एक बीघे से कम ज़मीन है

किसान परिवारों में ज़मीन पीढ़ी-दर-पीढ़ी बंटती जाती है इसलिए वो धीरे-धीरे और कम हो जाती है. नतीजन, इतनी कम ज़मीन पर खेती करना बेहद मुश्किल हो जाता है. ऐसे में निर्मल के. मुखर्जी और देबब्रत बंदोपाध्याय जैसे विशेषज्ञों ने वाममोर्चे की सरकारों को ज़मीन के छोटे-छोटे टुकड़ों को जोड़ने की सलाह दी लेकिन वामदल ग़रीबों और किसानों के विरोध के डर से ऐसा नहीं कर पाए.

छोटे किसान और ग़रीब ही वामदलों के वोटबैंक थे इसलिए उनकी वो उनकी नाराज़गी मोल लेने का ख़तरा नहीं मोल सके.

ज़मीन की ऐसी हालत की वजह से बंगाल में खेती लगातार कम होती गई. वामदलों ने बड़े स्तर पर औद्योगिक इकाइयों की मदद से हालात संतुलित करने की कोशिश की.

सरकारों ने सोचा था कि ऐसा करके वो किसानों की बड़ी संख्या को कारखानों में ले आएंगे. लेकिन बंगाल के ज़्यादातर किसान इतने पढ़े-लिखे और कुशल नहीं थे कि कारखानों में नौकरी कर सकें.

इसलिए छोटे किसानों को मजबूरी में खेती तक ही सीमित रहना पड़ा. यही वजह है कि सरकार ने सिंगूर और नंदीग्राम के लिए किसानों से ज़मीन लेने की कोशिश की, किसानों ने विद्रोह किया और वामदलों का जनाधार अपने आप कमज़ोर पड़ गया. इसके बाद जो हुआ, वो किसी से छिपा नहीं है.

वामपंथ की पकड़ दूसरे क्षेत्र में भी कमज़ोर पड़ने लगी.

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समाजवाद के सपने को ज़िंदा रखने की जिद

1990-91 तक सोवियत संघ के साथ शीत युद्ध समाप्त हो गया और पूर्वी यूरोपीय समाजवादी ब्लॉक का विघटन हो गया और पिश्चमी ताकतों की जीत हुई.

चीन ने पूंजीवाद की तरफ रुख किया.

कई दशकों तक भारतीय कम्युनिस्ट समाजवाद के सपने को जीते रहे और दावा किया कि यह सपना हमारे देश में पूरा हो सकता है.

अब जब समाजवादी दुनिया अतीत की बात हो चली है, कम्युनिस्टों के लिए उस सपने को लोगों के बीच बेचना मुश्किल हो गया है.

लगभग उसी समय (1990-91) भारत में दो महत्वपूर्ण घटनाएं घटीं. देश में दो बड़े आंदोलनों की शुरुआत हुई, एक सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन, जिसे मंडल आंदोलन के रूप में जानता जात है. वहीं दूसरा धार्मिक-राजनीतिक आंदोलन, जिसे कमंडल आंदोलन के रूप में याद किया जाता है.

इन दोनों आंदोलनों ने भारत की सदियों पुरानी राजनीति को बदल दिया. 1991 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने देश में नव-उदारवादी आर्थिक सुधार की शुरुआत की, जिसने न केवल निजी क्षेत्र की कंपनियों को एक बड़ा बाजार उपलब्ध कराया बल्कि नौकरी की सुरक्षा को भी ख़त्म कर दिया.

नौकरी पर रखा और निकाला जाना, आम बात होने लगी. इसने सीधे तौर पर श्रमिकों के आंदोलनों को प्रभावित किया.

बंगाल की सत्ता पर काबिज़ कम्युनिस्ट सरकार के सामने यह चुनौती थी कि वो इन बदलावों से कैसे निपटे.

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दिवालियापन

उनकी वैचारिक दिवालियापन तब सामने आई जब उन्होंने समाजवादी क्रांति के सपने को साकार करने की कोशिश में नारा लगायाः मार्क्सवाद सर्व शक्तिशाली है क्योंकि यह सत्य है और यह विज्ञान है.

ज़ाहिर सी बात है कि ये कम्युनिस्ट इस तथ्य से बेखबर थे कि मार्क्सवाद को वैज्ञानिक आधार पर खड़ा करने का दावा आत्मघाती साबित हो सकता था, जैसा कि हरबर्ट मार्क्यूज ने अपनी किताब 'वन डायमेंशनल मैन' में बहुत पहले ही लिखा था.

और इस तरह कम्युनिस्ट केवल क्रांति के खोखले नारों से जनता के एक छोटे से हिस्से को ही प्रभावित कर पाया.

लंबे समय तक ये कम्युनिस्ट संसद भी पहुंचते रहे. अब माओवादियों की सोच के विपरीत सीपीआईएम को यह एहसास हो गया है कि भारत में संसदीय लोकतंत्र का कोई दूसरा विकल्प नहीं है.

लेकिन उनकी पुरानी सोच उन्हें आज लोगों से जोड़ नहीं पा रही है. इस सदी में लोगों की सच्ची भलाई के लिए कार्यक्रम बनाने में ये सोच आड़े आ रही है.

वे अब भी अतीत में जी रहे हैं. जब तक वो अपने पुराने रूढ़िवादी मार्क्सवाद के विचारों से छुटकारा नहीं पा लेते हैं, वो आम लोगों के लिए अप्रासंगिक बने रहेंगे.

( ये लेखक के निजी विचार हैं)

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