अमित शाह: लगातार दो बार मोदी की रणनीति को अंजाम तक पहुंचाने का कारनामा

  • 23 मई 2019
अमित शाह इमेज कॉपीरइट AFP/Getty Images

"मुझे वो दिन याद है जब मैं एक युवा कार्यकर्ता के रूप में नारनपुरा इलाक़े में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के लिए पोस्टर चिपकाता था. वर्षों बीत गए हैं और मैं बहुत बड़ा हो गया हूं लेकिन यादें अब भी ताजा हैं और मुझे पता है कि मेरी यात्रा यहीं से शुरू हुई थी."

30 मार्च को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अपना नामांकन पत्र दाखिल करने से पहले आयोजित रोड शो में ये बातें कही थीं.

गुजरात की गांधीनगर सीट से लोकसभा चुनाव लड़ रहे शाह उस समय की बात कर रहे थे जब 1982 में वो एबीवीपी के युवा कार्यकर्ता थे.

कई साल बीत चुके हैं और वो लड़का जो कभी अटल बिहारी वाजपेयी और भाजपा के दूसरे दिग्गज नेताओं के लिए पोस्टर चिपकाता था, आज खुद पार्टी का पोस्टर बॉय बन चुका है.

2014 में भारतीय जनता पार्टी को शानदार जीत दिलाने के बाद अमित शाह रुके नहीं, उन्होंने पार्टी अध्यक्ष के तौर पर बीजेपी को 2019 में 2014 से भी बड़ी जीत दिलाने का करिश्मा कर दिखाया है.

इमेज कॉपीरइट AFP/Getty Images

एबीवीपी से शुरू हुआ सफ़र

अमित शाह ने अपने जीवन में हर तरह का अच्छा-बुरा वक़्त देखा है. एबीवीपी कार्यकर्ता के रूप में अपनी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत करने वाले शाह आज उस मुक़ाम तक पहुंच गए हैं, जहां वो पार्टी के प्रदर्शन के लिए पूरी तरह जिम्मेदार हैं, चाहे पार्टी चुनाव जीते या हारे. हालांकि विपक्ष अमित शाह पर लगे आपराधिक आरोपों की याद बीजेपी को दिलाता रहता है.

शाह का जन्म 22 अक्तूबर 1964 को मुंबई के एक जैन बनिया परिवार में हुआ था. 14 वर्ष की छोटी आयु में वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शामिल हुए थे और यहीं से उनकी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत समझी जाती है.

गांधीनगर के एक छोटे से शहर मनसा में उन्होंने यह शुरुआत 'तरुण स्वयंसेवक' के रूप में की थी. बाद में अमित शाह अपनी कॉलेज की पढ़ाई के लिए अहमदाबाद आए, जहां उन्होंने एबीवीपी की सदस्यता ली. साल 1982 में बायो-केमेस्ट्री के छात्र के रूप में अमित शाह अहमदाबाद में छात्र संगठन एबीवीपी के सचिव बन गए.

इमेज कॉपीरइट European Photopress Agency

इसके बाद वो भाजपा की अहमदाबाद इकाई के सचिव बने. तब से उन्होंने पार्टी के भीतर पीछे मुड़कर नहीं देखा. 1997 में भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष बने, इसके बाद भाजपा प्रदेश इकाई के उपाध्यक्ष बनाए गए.

हालांकि पदोन्नति का ये सिलसिला कुछ वक़्त के लिए तब थम गया जब उन्हें सोहराबुद्दीन और कौसर बी के फ़र्ज़ी मुठभेड़ मामले में जेल जाना पड़ा.

राजनीतिक पंडित इसे उनकी यात्रा का अंतिम पड़ाव मान रहे थे, लेकिन अमित शाह ने विरोधी लहरों के बीच से पार्टी में ज़बरदस्त वापसी की.

निराशा भरा दौर

दरअसल उनकी ज़िंदगी का निराशाजनक दौर तब शुरू हुआ जब गैंगस्टर सोहराबुद्दीन शेख़ और उनकी पत्नी कौसर बी के कथित फ़र्ज़ी एनकाउंटर में उनका नाम आया. सोहराबुद्दीन और उनकी पत्नी को 2005 में एनकाउंटर में मार दिया गया था, उस समय अमित शाह गुजरात के गृह मंत्री थे.

इसके अलावा अमित शाह का नाम 2006 में सोहराबुद्दीन के साथी तुलसीराम प्रजापति के कथित फ़र्ज़ी एनकाउंटर में भी आया. ये मामले अमित शाह की ज़िंदगी के लिए बेहद उतार-चढ़ाव वाले रहे. इस मामले में कई अहम पड़ाव आए और कई विश्लेषक इस मामले को मशहूर अमरीकी ड्रामा 'गेम ऑफ़ थ्रोन्स' से जोड़कर भी देखते हैं.

सोहराबुद्दीन के परिवार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख़ किया तो 2005 से 2006 के बीच हुए इस मामले की विस्तार से जांच शुरू हुई. इसके बाद कुछ ऐसी जानकारियां निकलकर सामने आईं जिसके आधार पर बीजेपी शासित गुजरात और राजस्थान के पूर्व गृह मंत्रियों अमित शाह और गुलाब चंद कटारिया पर इस कथित फ़र्ज़ी एनकाउंटर में शामिल होने का आरोप लगाया गया.

गुजरात और राजस्थान पुलिस के सिपाही से लेकर आईपीएस स्तर के अधिकारियों पर इसमें शामिल होने के आरोप लगे. एमएन दिनेश, राजकुमार पांडियन, डीजी वंजारा और अमित शाह समेत कई अभियुक्तों को इस मामले में गिरफ़्तार किया गया.

25 जुलाई 2010 को अमित शाह को गिरफ़्तार किया गया और 29 अक्तूबर 2010 को उन्हें ज़मानत मिली. उन पर अक्तूबर 2010 से लेकर सितंबर 2012 तक गुजरात में दाख़िल होने पर रोक थी. आख़िरकार क़ानूनी लड़ाई के बाद सीबीआई कोर्ट ने 30 दिसंबर 2014 को उन्हें इस मामले में बरी कर दिया.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

बेटे के कारण भी घिरे

इसके बाद, अक्तूबर 2017 में वेबसाइट 'द वायर' ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की जिसमें यह दावा किया गया कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने और अमित शाह का बीजेपी अध्यक्ष बनने के बाद उनके बेटे जय शाह की कंपनी का टर्न ओवर 16 हज़ार गुना बढ़ गया.

द वायर ने यह दावा रजिस्ट्रार ऑफ़ कंपनीज़ में दाख़िल दस्तावेज़ों के आधार पर किया था.

वेबसाइट का कहना था कि 2014-15 में जय शाह की स्वामित्व वाली टेंपल एंटरप्राइज़ लिमिटेड कंपनी का राजस्व कुल 50 हज़ार रुपये था जो 2015-16 में बढ़कर 80.5 करोड़ तक पहुंच गया. हालांकि, एक साल बाद अक्तूबर 2016 में जय शाह की कंपनी ने अपनी व्यापारिक गतिविधियों को पूरी तरह बंद कर दिया था.

रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद जय शाह ने द वायर की रिपोर्टर रोहिणी सिंह और संस्थापक सिद्धार्थ वरदराजन समेत सात लोगों पर अहमदाबाद के मेट्रोपॉलिटन कोर्ट में आपराधिक मानहानि का केस किया. फिलहाल ये मामला सुप्रीम कोर्ट में है.

इमेज कॉपीरइट AFP/Getty Images

मोदी को सुपर स्टार बनाने वाले शाह

अमित शाह को करीब से जानने वालों का कहना है कि उन्होंने अपने पूरे दमखम के साथ गांधीनगर सीट पर काम करना शुरू किया और इससे अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी जैसे बड़े नेताओं को फायदा पहुंचाया.

राजनीति पर नजर रखने वालों और पार्टी से जुड़े लोगों का कहना है कि वाजपेयी और आडवाणी की ही तरह उन्होंने नरेंद्र मोदी को राजनीति के राष्ट्रीय फलक पर लाने में मदद की.

दोनों नेताओं के करीब रहने वाले भाजपा के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, "मोदी और शाह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. वो दशकों से एक साथ रहे हैं. वो एक जैसा सोचते हैं. वो एक परफेक्ट टीम की तरह काम करते हैं."

इमेज कॉपीरइट European Photopress Agency

"वे जीवन और राजनीतिक जीवन के प्रति अलग-अलग दृष्टिकोण रखते हुए दिख सकते हैं, लेकिन वे दोनों एक दूसरे को पूरा करते हैं."

2014 की जीत के लिए मोदी उन्हें "मैन ऑफ द मैच" का खिताब देते हैं.

वरिष्ठ नेता ने आगे कहा कि शाह एक फ़िल्म निर्देशक की तरह हैं जो कैमरे के पीछे काम करते हैं और अभिनेताओं को स्टार बनाते हैं. शाह ने कई पॉलिटिकल स्टार बनाए हैं लेकिन सुपर स्टार नरेंद्र मोदी रहे हैं.

इमेज कॉपीरइट AFP/Getty Images

संगठनात्मक कौशल

राजनीति पर नज़र रखने वालों का कहना है कि शाह एक बेहतरीन मैनेजर हैं. उनका अनुशासन सेना की तरह है जो भाजपा कार्यकर्ताओं में देखने को मिलता है.

वो अपने कैडर को ख़ुद अनुशासन का पाठ पढ़ाते हैं. वो दशकों से बूथ मैनेजमेंट पर जोर दे रहे हैं, जिसका परिणाम पहले गुजरात और फिर 2014 के लोकसभा चुनावों में देखने को मिला है.

उनकी रणनीति और प्रशासनिक कुशलता की वजह से पार्टी ने उन्हें साल 2010 में महासचिव का पद दिया और उन्हें उत्तर प्रदेश का प्रभार सौंपा.

शाह ने उत्तर प्रदेश में भाजपा के चुनावी भाग्य को बदल दिया और पार्टी ने शानदार जीत हासिल की. 80 लोकसभा सीटों वाले इस राज्य में पार्टी ने 73 पर बाजी मारी.

उनके प्रभारी रहते हुए महज दो साल में पार्टी का वोट शेयर राज्य में करीब ढाई गुना बढ़ गया. 2014 के चुनावों में शाह भाजपा के चुनावी कमेटी के सदस्य थे और उन्होंने जनसंपर्क, बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचने और नए वोटरों को जोड़ने को ज़िम्मेदारी दी गई थी.

इमेज कॉपीरइट AFP/Getty Images

परिणाम आधारित रणनीति बनाने के उनके कौशल ने 2014 लोकसभा चुनावों में बीजेपी की जीत में अहम भूमिका निभाई थी. मगर साथ ही उनके बारे में ये भी कहा जाता है कि उन्होंने ध्रुवीकरण वाली राजनीति को बढ़ावा दिया है.

ये भी दावा किया जाता है कि वो विपक्षी दलों के सांसदों और विधायकों को तोड़ने और अपने साथ जोड़ने में माहिर हैं. जब भी उनकी पार्टी को इसकी ज़रूरत होती है वो ये कर ही लेते हैं. वो अक्सर ऐसे प्रस्ताव देते हैं जिन्हें नकारा नहीं जा सकता है.

बीजेपी की भीतरी ख़बर रखने वाले कहते हैं कि पार्टी ने देश के उत्तर, मध्य और पश्चिमी क्षेत्रों के राजनीतिक रणक्षेत्र को न सिर्फ़ जीत लिया है बल्कि इस पर अपनी महारथ भी हासिल कर ली है. हालांकि बीजेपी अभी दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत में प्रभावसाली असर बनाने के लिए संघर्ष कर रही है.

बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, "शाह दक्षिणी राज्यों में काफ़ी समय से ख़ामोशी से काम कर रहे हैं. उन्होंने दक्षिणी और पूर्वोत्तर राज्यों में ज़मीनी स्तर पर बहुत काम किया है. ये वो राज्य है जहां अभी तक बीजेपी का कोई भविष्य दिखाई नहीं देता है. वो बीजेपी कार्यकर्ताओं के लिए नए राजनीतिक मोर्चे खोल रहे हैं और उन्हें यहां लड़ने के लिए तैयार कर रहे हैं. उनका काम इन आम चुनावों के नतीजों में दिख सकता है."

सिर्फ़ पार्टी के नेता और कार्यकर्ता ही नहीं बल्कि विपक्षी दलों के नेता भी अमित शाह की सोशल इंजीनियरिंग के कायल हैं. एक वरिष्ठ बीजेपी नेता कहते हैं, "अमित जी की तरह कोई और नेता जाति के धागों को नहीं पिरो सकता है. वो जाति की राजनीति को भीतर और बाहर दोनों तरफ़ से पूरी तरह जानते हैं. उनका अकेले का कौशल कांग्रेस के सभी रणनीतिकारों पर भारी रहता है."

इमेज कॉपीरइट European Photopress Agency

आगे का रास्ता क्या है?

अमित शाह अपनी पार्टी के लिए सिर्फ़ गुलदस्ते ही नहीं बल्कि आलोचना स्वीकार करने के लिए भी तैयार हैं. क्योंकि कई बार वो विनम्रता से स्वीकार कर चुके हैं कि बीजेपी के बिना वो सार्वजनिक तौर पर कुछ भी नहीं हैं.

नारनपुरा के रोड शो में कार्यकर्ताओं और समर्थकों के भारी जमावड़े के बीच पार्टी को अपने आप से ऊपर बताते हुए शाह ने कहा था, "अगर बीजेपी को मेरे जीवन से निकाल लिया जाए तो सिर्फ़ ज़ीरो ही बचेगा. मैंने जो कुछ भी सीखा और देश को दिया है सब बीजेपी का ही है."

शाह का सफ़रनामा

1964, 22 अक्तूबरः मुंबई में अमित शाह का जन्म

1978: आरएसएस के तरुण स्वयंसेवक बने

1982: एबीवीपी गुजरात के सहायक सचिव बने

1987: भारतीय जनता युवा मोर्चा में शामिल हुए

1989: बीजेपी की अहमदाबाद शहर इकाई के सचिव बने

1995: गुजरात की जीएसएफ़सी के अध्यक्ष बनाए गए

1997: भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष बने

1998: गुजरात बीजेपी के राज्य सचिव बने

1999: गुजरात बीजेपी के उपाध्यक्ष बने

2000: अहमदाबाद ज़िला सहकारी बैंक के चेयरमैन बने

2002-2010: गुजरात सरकार में मंत्री रहे

2006: गुजरात शतरंज एसोसिएशन के अध्यक्ष बने

2009: सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ क्रिकेट एसोसिएशन अहमदाबाद के अध्यक्ष और गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के उपाध्यक्ष रहे

2010: शोहराबुद्दीन कौसर बी फ़र्ज़ी एनकाउंटर मामले में गिरफ़्तार किए गए

2013: बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव बने

2014: गुजरात राज्य क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष बने

2014: बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने

2016: सोमनाथ मंदिर ट्रस्ट के सदस्य बने

2016: बीजेपी अध्यक्ष पद के लिए फिर से चुने गए

हिंदुत्व पर आक्रामक होते मोदी-योगी-शाह

गांधीनगर में बीजेपी को हराना इतना मुश्किल क्यों

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार