मोदी कितने मज़बूत हैं लोकसभा चुनाव 2019 में - नज़रिया

  • 7 अप्रैल 2019
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कुछ महीनों पहले तक ऐसा लग रहा था कि बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को कांग्रेस से चुनौती मिल सकती है. इसलिए भी क्योंकि पिछले साल कांग्रेस ने तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव जीते थे जिससे लगा कि कांग्रेस उबर रही है.

लेकिन पुलवामा हमले के बाद अब 2019 का समीकरण बदलता नज़र आ है. राष्ट्रवाद के घोड़े पर सवार बीजेपी ने पुलवामा के बाद ये चुनावी समीकरण अपने पक्ष में कर लिया है.

कम-से-कम हिंदी राज्यों में तो उसने अपने नुकसान को काफ़ी कम कर लिया है और कांग्रेस के साथ-साथ दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों को भी अपनी रणनीति पर दोबारा सोचने पर मजबूर किया है.

सवाल पहले ये था कि क्या बीजेपी 2019 में वापसी कर पाएगी? पुलवामा हमले के बाद अब सवाल ये है कि बीजेपी 2019 में कितनी सीटें जीत पाएगी?

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क्या बीजेपी 2014 से ज़्यादा सीटें जीतेगी?

पुलवामा हमले से पहले भी बीजेपी 2019 के चुनावों की रेस में आगे थी लेकिन पुलवामा के बाद बीजेपी हिंदी राज्यों में कांग्रेस और क्षेत्रीय पार्टियों से भी थोड़ा आगे निकल गई है.

बालाकोट एयरस्ट्राइक से बीजेपी सरकार की छवि भी बनी कि ये सरकार पाकिस्तान को जवाब दे सकती है.

साथ ही बीजेपी को इस बात से भी फ़ायदा हो रहा है कि लोगों को नरेंद्र मोदी का विकल्प नज़र नहीं आ रहा. पुलवामा के बाद मोदी और मज़बूत दिखाई दे रहे हैं और उनकी लोकप्रियता जो कम होती दिखाई दे रही थी, उसे फिर से उछाल मिल गया.

हालांकि, इससे अलग भी एक मत है कि अगर अटल बिहारी वाजपेयी जैसे लोकप्रिय नेता को 2004 में कमज़ोर कांग्रेस और बंटा हुआ विपक्ष हरा सकते हैं तो क्या लोकप्रिय नरेंद्र मोदी को 2019 में नहीं हराया जा सकता?

1999 के लोकसभा चुनाव भी करगिल युद्ध के बाद हुए थे.

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क्या अटल सरकार की तरह मोदी सरकार की हार नहीं हो सकती?

कोई पार्टी ये दावा नहीं कर सकती कि वो अजेय है और यही बात बीजेपी पर भी लागू होती है. लेकिन 2019 को 2004 से तुलना नहीं कर सकते क्योंकि इन दोनों चुनावों में कांग्रेस का वोट बेस अलग है.

जब 2004 में कांग्रेस ने चुनाव लड़ा तो उसके पास 28% वोट थे और अब कांग्रेस का वोट 19.6% ही रह गया है.

अगर कांग्रेस 6-7 फीसदी की बढ़ोतरी कर भी लेती है तब भी 100 सीटों से ज़्यादा नहीं मिल पाएंगी.

अगर किसी लोकप्रिय सरकार को हराना है जैसे कि बीजेपी सरकार तो विपक्ष को सत्ताधारी पार्टी से ज़्यादा मज़बूत नज़र आना होगा और अगर कोई एक विपक्षी पार्टी बहुत मज़बूत नहीं हैं तो सत्ताधारी पार्टी को हराने के लिए विपक्षी पार्टियों को एक साथ आना होगा.

फिलहाल जो परिस्थिति है उसमें इन दोनों में से कुछ नज़र नहीं आ रहा. कांग्रेस उत्तर प्रदेश में महागठबंधन नहीं बना पाई और कई कोशिशों के बाद भी आज तक आम आदमी पार्टी से भी गठबंधन नहीं कर पाई है.

कांग्रेस अकेले बीजेपी को इस समय नहीं हरा सकती. विपक्ष साथ आता तो ज़रूर मोदी के लिए एक चुनौती होता लेकिन फिर भी बीजेपी को 200 सीटों से नीचे ना ला पाता.

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जीत का अंतर बहुत बड़ा

पहले राष्ट्रीय स्थिति की बात करते हैं और उसके बाद राज्यों की. 2014 लोकसभा चुनावों में बीजेपी को कई क्षेत्रों में बड़े अंतर से जीत मिली. बीजेपी को इन सीटों पर तभी हराया जा सकता है जब बड़ा नकारात्मक वोट विपक्ष के खाते में स्विंग हो.

बीजेपी ने 42 लोकसभा सीटों पर तीन लाख वोटों से भी ज़्यादा के अंतर से जीत मिली थी और 75 लोकसभा सीटों पर दो लाख से ज़्यादा के अंतर से.

38 लोकसभा सीटों पर डेढ लाख वोटों के अंतर से जीत हासिल की थी और 52 लोकसभा सीटों पर 1 लाख से ज़्यादा वोटों के अंतर से.

2019 में विपक्षी पार्टियों के लिए इतने अंतर को पाटना आसान नहीं होगा. ये तभी संभव है अगर सत्ताधारी बीजेपी के ख़िलाफ़ लोगों में गुस्सा हो.

पहले लोगों में बीजेपी को लेकर गुस्सा था लेकिन पुलवामा के बाद अब स्थिति बदल गई है. विपक्षी पार्टियों के लिए इन वोटों को अपने पक्ष में करना मुश्किल हो सकता है.

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क्या विधानसभा चुनावों में जीत का फ़ायदा कांग्रेस को नहीं?

2019 में अलग-अलग तरह के मुक़ाबले पर नज़र डालते हैं और देखते हैं कि बीजेपी 2019 में कैसा प्रदर्शन करेगी.

ऐसा माना जा रहा है कि उन हिंदीभाषी राज्यों में बीजेपी को नुक़सान हो सकता है जहां मुक़ाबला दोतरफ़ा है.

ये सही है कि हिंदीभाषी राज्यों में बीजेपी अपने 2014 के प्रदर्शन से बेहतर नहीं कर सकती जहां दो-तरफ़ा मुक़ाबला है लेकिन ये भी सच है कि बीजेपी को गुजरात, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड में ज़्यादा नुक़सान नहीं होगा बशर्ते कुछ नाटकीय मोड़ ना आ जाए.

बेशक मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में हार के बाद भी बीजेपी मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस से थोड़ा फ़ायदे में है.

अगर हम इन विधानसभा चुनावों के वोट को संसदीय चुनाव में तब्दील करें तो मध्य प्रदेश में बीजेपी 18 लोकसभा सीटों पर आगे है और कांग्रेस 11 सीटों पर.

राजस्थान में विधानसभा वोटों को संसदीय चुनाव के हिसाब से देखें तो बीजेपी 13 सीटों पर आगे है और कांग्रेस 12.

सिर्फ़ छत्तीसगढ़ में कांग्रेस निर्णायक स्थिति में है. हालांकि यहां भी पुलवामा के बाद बीजेपी का वोट शेयर बढ़ने की संभावना है.

अगर हम सोचें कि कांग्रेस का वोट शेयर 2014 की तुलना में 2019 में बढ़ेगा तो कांग्रेस को दोतरफ़ा चुनावों का फ़ायदा उठाने के लिए बहुत ज़्यादा वोट स्विंग करना पड़ेगा. सिर्फ 5-6% बीजेपी से कांग्रेस में आने से बीजेपी को इन राज्यों में ज़्यादा फर्क नहीं पड़ेगा और कांग्रेस के लिए भी इतना वोट शिफ्ट करना आसान नहीं होगा.

इन हिंदीभाषी राज्यों में कांग्रेस और बीजेपी के वोट शेयर में बहुत बड़ा अंतर है. यानी कांग्रेस अकेले अपने दम पर नहीं जीत पाएगी.

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क्या क्षेत्रीय पार्टियों का गठबंधन बीजेपी को चुनौती दे सकता है?

ऐसे कई राज्य हैं जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, झारखंड, पंजाब, जम्मू कश्मीर और दिल्ली जहां बीजेपी का प्रदर्शन अच्छा रहा. इन राज्यों में बीजेपी ने या तो क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठबंधन किया और जहां क्षेत्रीय पार्टियां बंटी हुई थी तो बीजेपी विरोधी वोट भी बंट गईं और उसका फ़ायदा बीजेपी को मिला.

ये सही है कि विपक्षी पार्टियों का गठबंधन बीजेपी को कई राज्यों में बैकफ़ुट पर ला सकता है जैसे उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पंजाब, झारखंड, हरियाणा, महाराष्ट्र. बिहार में विपक्ष का गठबंधन एनडीए का नुक़सान नहीं कर सकता.

कांग्रेस ने कर्नाटक, तमिलनाडु, झारखंड, महाराष्ट्र, बिहार में गठबंधन किया है लेकिन ये बीजेपी को चुनौती देने के लिए काफ़ी नहीं.

पश्चिम बंगाल, ओडिशा में 2014 लोकसभा चुनावों में बीजेपी का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा था लेकिन 2019 में बीजेपी के पास यहां मज़बूत होने का अच्छा मौक़ा है अगर 2014 जैसे ही परिस्थितियां रही तो यानी कि विपक्ष बंटा हुआ रहे तो.

पिछले कुछ सालों के सर्वे इसी तरफ़ इशारा कर रहे हैं. सर्वे कहते हैं कि बीजेपी पिछले कुछ सालों में इन राज्यों में पहले से मज़बूत हुई है. विपक्ष गठबंधन नहीं करेगा तो बीजेपी के लिए इन राज्यों में राह आसान होगी.

दक्षिण में तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में बीजेपी की स्थिति करीब-करीब 2014 जैसी ही है सिर्फ केरल में बीजेपी का समर्थन बढ़ा है लेकिन लोकसभा सीटें जीतने के लिए काफ़ी नहीं है.

ये सभी परिस्थितियां और आंकड़े इसी तरफ इशारा करते हैं कि 2019 में नरेंद्र मोदी को हराना लगभग नामुमकिन है.

(प्रोफेसर संजय कुमार सेंटर फ़ॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटी(सीएसडीएस), दिल्ली में निदेशक हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है.)

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