अखिलेश यादव: क्या 'टीपू' बनेंगे 'सुल्तान'?

  • 9 अप्रैल 2019
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मुलायम सिंह यादव परिवार के बच्चों के नाम बहुत दिलचस्प होते हैं, टीपू, तेजू, बिल्लू, सिल्लू, टिल्लू, छोटू और न जाने क्या क्या. आप इनके औपचारिक नाम पूछिए और सीनियर यादव जवाब के लिए बगलें झांकते नज़र आएंगे. इनके ज़्यादातर बच्चों के नाम अ से शुरू होते हैं, अखिलेश, असित, अनुराग, अंकुर वगैरह, वगैरह.

अखिलेश के बेटे का नाम अर्जुन है तो शिवपाल सिंह यादव के बेटों के नाम अंकुर और आदित्य है. एक और दिलचस्प बात ये कि इनमें से अधिकतर का जन्मदिन जुलाई महीने में पड़ता है, इसलिए नहीं कि इनकी पैदाइश इस महीने की है, बल्कि इसलिए कि उत्तर प्रदेश के स्कूलों का पढ़ाई का सत्र इसी महीने से शुरू होता है.

कैसे टीपू बने अखिलेश यादव?

मुलायम सिंह यादव के पारिवारिक दोस्त और उनके पुश्तैनी सैफ़ई गाँव के ग्राम प्रधान दर्शन सिंह ने उनके बेटे का नाम टीपू रखा था. एक बार जब उनका नाम टीपू पड़ गया तो परिवार में किसी ने पंडित बुला कर उनका औपचारिक नामकरण करने की ज़रूरत ही नहीं समझी.

अखिलेश यादव की जीवनी 'अखिलेश यादव - विंड्स ऑफ़ चेंज' लिखने वाली सुनीता एरॉन लिखती हैं, 'जब मुलायम के एक बहुत क़रीबी दोस्त एसएन तिवारी उनके चार साल के बेटे का दाखिला कराने स्कूल ले गए तो वहाँ के अध्यापक ने उनका नाम पूछा. उन्होंने जवाब दिया, 'टीपू.' अध्यापक ने कहा, लेकिन इसको तो फॉर्म में नहीं लिखा जा सकता. तब तिवारी ने हंसते हुए टीपू को कुछ नाम सुझाए और पूछा, 'क्या तुम्हें अखिलेश नाम पसंद है ?' बच्चे ने अपना सिर हिलाया और टीपू अखिलेश यादव हो गए.'

मुख्यमंत्री बनने के बाद भी सत्ता की चाबी मुलायम के हाथ

अखिलेश यादव इटावा के सेंट मेरीज़ स्कूल में नर्सरी से कक्षा 3 तक पढ़े. उस ज़माने में उनके चाचा रामपाल सिंह उन्हें साइकिल पर बैठा कर स्कूल लाते थे.

यही साइकिल बाद में समाजवादी पार्टी का चुनाव निशान बनी. उन दिनों टीपू को पेड़ पर चढ़ने का शौक था.

वो पेड़ से तभी नीचे उतरते थे जब उन्हें कंपट यानी संतरे की टॉफी का लालच दिया जाता था. अखिलेश के पिता मुलायम सिंह उस इलाके के मशहूर पहलवान थे.

उनके गाँव के लोग अभी भी उनके 'चर्खा दाँव' को याद करते हैं जिसमें वो दूसरे पहलवानों को हाथों का इस्तेमाल किया बिना अपने सिर से चित कर देते थे.

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1977 में मुलायम सिंह यादव को जब राम नरेश यादव मंत्रिमंडल में सहकारिता मंत्री बनाया गया तो उनकी उम्र 38 साल की थी. इसी उम्र में उनके बेटे अखिलेश यादव नें 2012 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. तब उनके समर्थक हंसते हुए कहा करते थे, 'टीपू बन गया सुल्तान.'

उस समय अखिलेश के लिए 'शिष्ट,' 'विनीत,' 'सभ्य' और 'शरीफ़' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाता था.

समाजवादी पार्टी के पूर्व नेता शाहिद सिद्दीकी कहा करते थे, 'समस्या ये थी कि वो इतने शरीफ़ थे कि सरकार चलाना उनके बस की बात नहीं थी.'

जब उन्होंने मुख्यमंत्री पद का शपथ ली तो राजनीतिक हल्कों में माना जाता था कि सत्ता की असली चाबी तो उनके पिता मुलायम सिंह यादव और उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव, राम गोपाल यादव और मुलायम के ख़ासमख़ास आज़म ख़ाँ के पास ही रहेगी.

उनका पाँच साल का कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी राजनीतिक टीकाकारों की उनके बारे में ये धारणा बदली नहीं.

उस ज़माने में उत्तर प्रदेश में ये मज़ाक प्रचलित था कि उत्तर प्रदेश को साढ़े चार मुख्यमंत्री चला रहे हैं. बाद में इस सूची में एक और नाम का इज़ाफ़ा हो गया आईएएस अफ़सर अनीता सिंह का जिनका उत्तर प्रदेश सचिवालय के पंचम तल में ख़ासा रसूख हुआ करता था.

साधना गुप्ता से मुलायम सिंह यादव की दूसरी शादी

16 सालों के दांपत्य जीवन के बाद मुलायम सिंह यादव और मालती देवी के यहाँ 1973 में अखिलेश का जन्म हुआ था.

मालती शुरू से ही बहुत बीमार रहती थीं और उनको मिर्गी के दौरे आते थे.

बहुत इलाज के बावजूद उनका ये रोग ठीक नहीं हुआ और 25 मई, 2003 को उनका निधन हो गया.

पत्नी मालती के निधन के बाद मुलायम सिंह यादव ने साधना गुप्ता से विवाह किया.

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मुलायम के इस रिश्ते को हमेशा छुपा कर रखा गया. लोगों को इसके बारे में पहली बार पता तब चला, जब आय से अधिक संपत्ति रखने के मामले में सुप्रीम कोर्ट में चल रहे एक मुकदमें में मुलायम सिंह यादव ने एक हलफ़नामा दायर किया जिसमें स्वीकार किया गया कि उन्होंने साधना गुप्ता से विवाह किया है.

मुलायम सिंह यादव ने इस संबंध को अपनी पहली पत्नी के निधन के बाद सार्वजनिक किया, हालांकि इससे पहले ही, साधना उनके कालिदास रोड वाले निवास में प्रवेश कर चुकी थीं.

साधना गुप्ता को पहली बार सार्वजनिक रूप से मुलायम सिंह यादव के साथ 1999 में अखिलेश और डिंपल यादव की शादी के समारोह में देखा गया.

साधना की पहले फ़र्रुख़ाबाद के चंद्र प्रकाश गुप्ता से शादी हुई थी. लेकिन ये शादी चली नहीं और उनका 80 के दशक में तलाक हो गया था.

सुनीता एरॉन लिखती हैं, 'मुलायम की दूसरी शादी के दौरान अखिलेश न सिर्फ़ सांसद थे बल्कि उनकी खुद की शादी हो गई थी और उनकी एक बेटी भी थी. अखिलेश कहते हैं कि शुरू में इस संबंध के बारे में मेरा कुछ दुराव था और मैं परेशान भी था लेकिन इस बारे में कभी अपने पिता से नहीं कहा. मुलायम भी स्वीकार करते हैं कि अखिलेश ने इस संबंध पर हमेशा एक उदार रवैया अपनाया है और मेरे दूसरी बार शादी करने के फ़ैसले का सम्मान किया है. '

ढोलपुर के सैनिक स्कूल में पढ़ाई

अपने एक मित्र अवध किशोर बाजपेई की सलाह पर मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश को पढ़ने के लिए ढोलपुर के सैनिक स्कूल भेज दिया.

उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव उनका दाखिला कराने उनके साथ वहाँ गए. अखिलेश के सैनिक स्कूल प्रवास के दौरान मुलायम उनसे मिलने सिर्फ़ दो बार गए.

उन्होंने एक बार उन्हें पत्र लिखा, जिसे पत्र न कह कर एक टेलिग्राम कहा जा सकता है. उस पत्र में सिर्फ़ दो वाक्य थे- 'पढ़ने में मेहनत करो. काम आएगा.'

सैनिक स्कूल में अखिलेश दूसरे लड़को की तरह अपने कपड़े खुद धोते थे और अपने जूते भी स्वयं पॉलिश करते थे.

छात्रों से अपेक्षा की जाती थी कि वो दिन में कम से कम 8 किलोमीटर चलें. ढोलपुर से अखिलेश इंजीनयरिंग की पढ़ाई के लिए मैसूर चले गए. इस बार उनका दाखिला कराने मुलायम सिंह यादव के प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्रा गए.

ये वहीं नृपेंद्र मिश्रा हैं जो इस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रधान सचिव हैं.

मैसूर के जयचमरेंद्र इंजीनयरिंग कालेज में पढ़ाई के दौरान उनकी दोस्ती मशहूर तेज़ गेंदबाज़ जवागल श्रीनाथ से हो गई. जब 1996 में वो इंजीनयर बन कर लौटे तो मुलायम सिंह यादव देवेगौड़ा मंत्रिमंडल में रक्षा मंत्री थे.

सिडनी में पर्यावरण इंजीनयरिंग की पढ़ाई

उसी साल अखिलेश को पर्यावरण इंजीनयरिंग में मास्टर्स करने ऑस्ट्रेलिया भेज दिया गया.

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उन दिनों सिडनी में अखिलेश के साथ पढ़ने वाले गीतेश अग्रवाल बताते हैं, 'अखिलेश को मेरी बनाई गई 'कड़क चाय' बहुत पसंद थी. वो उन दिनों भी बहुत तड़के उठ जाया करते थे. हम अक्सर खाने में पुलाव बनाते थे, लेकिन उसे पुलाव न कह कर 'तहरी' कहते थे. अमिताभ बच्चन उनके पसंदीदा अभिनेता होते थे और उनको 'सॉफ्ट' गाने बहुत पसंद थे. एक बार हम कैनबरा गए थे और अखिलेश बार बार गुलाम अली की मशहूर ग़ज़ल 'तेरे शहर में हम आए हैं मुसाफ़िर' सुन रहे थे.'

'वो पढ़ने लिखने में बहुत अच्छे नहीं थे लेकिन दूसरे नेताओं के लड़कों की तरह उनमें कोई ऐब नहीं था. वो न तो सिगरेट पीते थे और न ही शराब. हमें वहाँ रहने के लिए बहुत कम पैसे मिला करते थे. मुझे याद है मुझे हर हफ़्ते 120 डॉलर मिला करते थे जबकि अखिलेश तो सिर्फ़ 90 डॉलर में अपना काम चलाया करते थे. उनके पास तब कोई मोबाइल फ़ोन नहीं था, जबकि भारत में एक साल पहले ही मोबाइल फ़ोन की शुरुआत हो चुकी थी. आस्ट्रेलिया में अपने दो साल के प्रवास के दौरान अखिलेश एक बार भी अपने घर भारत नहीं आए.'

डिंपल रावत से शादी

अखिलेश से डिंपल रावत की पहली मुलाकात उनके ऑस्ट्रेलिया जाने से पहले हुई थी. ऑस्ट्रेलिया में भी वो पत्रों के ज़रिए एक दूसरे के संपर्क में रहे.

डिंपल के पिता कर्नल एस सी रावत उन दिनों बरेली में तैनात थे. नवंबर 1999 में सांसद बनने के बाद अखिलेश और डिंपल की शादी हुई. डिंपल को घुड़सवारी और पढ़ने का शौक है.

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शादी के बाद उन्होंने खाना बनाना भी सीखा है, क्योंकि अखिलेश खाने के शौकीन हैं.

कारवाँ पत्रिका में अखिलेश की जीवनी 'एवरी बडीज़ ब्रदर' लिखने वाली नेहा दीक्षित लिखती हैं कि शुरू में मुलायम अखिलेश और डिंपल की शादी के खिलाफ़ थे. लेकिन अखिलेश नहीं माने. उस समय अखिलेश को सबसे अधिक समर्थन मिला, उस समय मुलायम के ख़ास दोस्त और बाद में उनके विरोधी बने अमर सिंह से. अमर सिंह से मुलायम की दोस्ती के खिलाफ़ झंडा उठाने वालों में अखिलेश भी थे. एक पत्रकार से बातचीत में उन्होंने कहा था, 'उन्होंने खटिया पर सोने वाले मेरे बाप को फ़ाइव स्टार की आदत लगा दी.'

अमर सिंह सबसे पहले लाए थे अखिलेश को सामने

दिलचस्प बात ये है कि मुलायम सिंह ने नहीं , बल्कि अमर सिंह ने अखिलेश यादव को महत्वपूर्ण भूमिका देने में ख़ास भूमिका निभाई थी.

जब 2007 में समाजवादी पार्टी मायावती से हार गई तो अमर सिंह ने अपने लोदी स्टेट वाले निवास में एक भोज दिया.

बहुचर्चित किताब 'कनटेंडर्स- हू विल लीड इंडिया टुमॉरो' लिखने वाली प्रिया सहगल बताती हैं, 'इस भोज में मुलायम सिंह के अलावा जया प्रदा, जया बच्चन और राम गोपाल यादव भी मौजूद थे. यहाँ अमर सिंह ने कहा कि नए युग की राजनीति के लिए नए युग के नेताओं की ज़रूरत है. उन्होंने अपनी दोनों जुड़वां बेटियों से पूछा कि तुम दोनों टीवी पर कौन से सीरियल देखते हो. दोनो ने जवाब दिया 'हाना मोन्टाना.' अमर सिंह बोले मैं अपने बच्चों के ज़रिए नई पीढ़ी के लोगों के साथ संपर्क में रहता हूँ. मुझे पता रहता है कि वो क्या चाहते हैं? इसलिए मैं पार्टी के अध्यक्ष के रूप में अखिलेश यादव का नाम प्रस्तावित करता हूँ.'

'मुलायम सिंह के अलावा भोज में उपस्थित हर शख़्स इस प्रस्ताव से सहमत था. शायद वो नहीं चाहते थे कि पार्टी के अगले नेता के चुनाव का आधार 'हाना मोन्टाना' देखने के आधार पर किया जाए. उन्होंने कहा कि वो इस बारे में पार्टी के वरिष्ठ नेता जनेश्वर मिश्र से सलाह ले कर ही कोई फ़ैसला करेंगे.'

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जनेश्वर मिश्र ने न सिर्फ़ इस प्रस्ताव पर मोहर लगाई, बल्कि अखिलेश को अपना पूरा समर्थन भी दिया.

जनेश्वर मिश्र थे अखिलेश के गुरु

प्रिया सहगल आगे कहती हैं, 'वास्तव में अखिलेश के जीवन में मुलायम सिंह यादव नहीं, बल्कि जनेश्वर मिश्र ने एक बुज़र्ग सलाहकार की भूमिका निभाई है. जब अखिलेश पार्टी के अध्यक्ष बन गए, तो जनेश्वर मिश्र ने उनसे कहा कि दो साल खूब मेहनत करो. और मैं तुम्हारी रैली में खुद आ कर 'अखिलेश ज़िंदाबाद' का नारा लगाउंगा और पार्टी के बाकी लोग भी तुम्हें अपना नेता मानेंगे.'

'जनेश्वर मिश्र ने ही अखिलेश यादव को उनके राजनीतिक जीवन की पहली सीख दी थी. वो 35 साल की उम्र हो जाने के बावजूद पार्टी के सीनियर नेताओं के पैर छूते थे. मिश्र ने कहा, 'अगर तुम इसी तरह इनके पैर छूते रहे तो इनको अनुशासित कौन करेगा? तब अखिलेश ने हंसते हुए कहा था कम से कम मुझे अपने पिताजी के पैर तो छू लेने दीजिए.' जब अखिलेश मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने लंदन के हाइड पार्क की तर्ज़ पर जनेश्वर मिश्र की याद में लखनऊ में जनेश्वर मिश्रा पार्क बनवाया.'

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'उम्मीद की साइकिल'

वर्ष 2009 में अखिलेश ने दो चुनाव क्षेत्रों कन्नौज और फ़िरोज़ाबाद से चुनाव लड़ा. वो दोनों जगह से जीते. बाद में उन्होंने फ़िरोज़ाबाद की सीट छोड़ दी. अखिलेश को उस समय बहुत बड़ा राजनीतिक धक्का लगा जब वहाँ हुए उप चुनाव में कांग्रेस के राज बब्बर ने उनकी पत्नी डिंपल यादव को हरा दिया.

2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए अखिलेश ने पेशवर लोगों की ज़बरदस्त टीम बनाई जिसमें शामिल थे फ़िल्म संगीतकार निखिल कामत और पत्रकार और रेडियो शो करने वाले नीलेश मिश्रा.

उन्होंने ही उनके प्रचार की मशहूर टैग लाइन बनाई, 'उम्मीद की साइकिल.' इसके अलावा मशहूर फ़िल्म नील और निकी के निर्देशक अर्जुन सबलोक ने उनके चुनाव प्रचार की ज़िम्मेदारी निभाई.

साइकिल पर उत्तर प्रदेश का भ्रमण

अखिलेश ने अक्तूबर, 2011 में पूरे राज्य की साइकिल पर यात्रा की.

सुनीता एरॉन लिखती हैं, 'अपने सफ़ेद कुर्ते पायजामे और लाल टोपी में अखिलेश अपने साइकिल पर उत्तर प्रदेश के गाँव- गाँव गए. उन्हें राज्य प्रशासन ने नोएडा- आगरा एक्सप्रेस वे पर चलने की अनुमति नहीं दी. उन्होंने तुरंत कीचड़ से भरी सर्विस लेन पर चलने का फ़ैसला लिया. उन्होंने अपने समर्थकों से कहा कि एक दिन मैं ही इस 'एक्सप्रेस वे' का उद्घाटन करूँगा जो उन्होंने सत्ता में आने के बाद किया भी. उस विधानसभा चुनाव में उन्होंने राहुल गांधी से पूरे दो महीने पहले अपना चुनाव प्रचार शुरू कर दिया था, जिसका फ़ायदा भी उन्हें चुनाव में मिला.'

ज्याँ द्रेज़ से मुलाकात

नेहा दीक्षित लिखती हैं, 'सत्ता में आने के दस महीनों बाद सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक दल उनके पास खाद्य सुरक्षा कानून को राज्य में लागू करने की मांग को ले कर उनके पास गया. उनके सचिव ने उन्हें अखिलेश से मिलने के लिए 35 मिनट का समय दिया. उसमें से शुरुआती 20 मिनट उन्होंने बेल्जियन मूल के अर्थशास्त्री ज्याँ द्रेज़ से ये पूछने में लगाए कि आप इतनी अच्छी हिंदी कैसे बोल लेते हैं.'

'इस बैठक में मौजूद एक शख़्स ने मुझे बताया कि जब हमने उन्हें कुछ नक्शे दिखाए तो उनका उन पर कोई असर नहीं हुआ, जबकि उनके पास इंजीनयरिंग की डिग्री थी. एक कार्यकर्ता ने जब उनसे कहा कि हम केंद्र से पहले खाने का अधिकार अधिनियम अपने राज्य में लागू कर सकते हैं, अखिलेश ने राज्य योजना आयोग के प्रमुख एन सी बाजपेई की तरफ़ देख कर कहा, आप हमारे खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्री को तो जानते हैं. सिर्फ़ नेताजी ही उन्हें मना सकते हैं. उनका इशारा अपने मंत्री रघुराज प्रताप सिंह की तरफ़ था जो राजा भैया के नाम से भी मशहूर थे.'

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2017 का विधानसभा चुनाव अखिलेश ने चुनावी नारे 'काम बोलता है' पर लड़ा था. लेकिन ये नारा पूरे किये गए कामों से अधिक परियोजनाओं के शिलान्यास पर अधिक आधारित था. उनका कार्यकाल समाप्त होते होते उनकी अपनी पार्टी की पुरानी पीढ़ी के लोगों से ठन गई थीं. उन्होंने अपने-आप को उनसे दूर करने की कवायत शुरू भी की थी.

अखिलेश ने पहला तीर तब छोड़ा जब उन्होंने अपने चाचा शिवपाल यादव के करीबी रहे दो राज्य मंत्रियों को भ्रष्टाचार के आरोप में अपने मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया. मुलायम के कहने पर बाद में उन्होंने उन्हें वापस ले ज़रूर लिया लेकिन अपने पिता के खिलाफ़ ही विद्रोह का बिगुल उन्होंने बजा दिया था.

दिसंबर में मुलायम सिंह यादव ने विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी के उम्मीदवारों की सूची जारी की जिसमें अखिलेश मंत्रिमंडल के कई चेहरों को जगह नहीं मिली. अखिलेश ने जवाबी कार्रवाई करते हुए अपनी सूची जारी की जिसमें इन लोगों को शामिल किया गया.

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मुलायम ने अपने बेटे को पार्टी की सदस्यता से छह महीने के लिए निलंबित कर दिया. इस अंदरूनी टूट का नतीजा ये रहा कि कांग्रेस से गठबंधन के बावजूद उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अखिलेश की हार हुई और भारतीय जनता पार्टी की एक बार फिर सत्ता में वापसी हुई.

कई राजनीतिक विश्लेषकों ने उनके कांग्रेस पार्टी को 105 सीटें देने के फ़ैसले की भी काफ़ी आलोचना की, क्योंकि उस समय उत्तर प्रदेश विधानसभा में कांग्रेस के मात्र 28 सदस्य थे.

मायावती से संपर्क

हार के बाद अखिलेश ने आत्म-ग्लानि में समय न बरबाद करते हुए पहले पार्टी पर अपना नियंत्रण मज़बूत किया. फिर वो उन्होंने अपने पिता की धुर- विरोधी मायावती से मिल कर कहा कि बीजेपी को हराने के लिए हमारी पार्टियों को साथ आना चाहिए.

उन्होंने यहाँ तक कहा कि अगर वो प्रधानमंत्री बनना चाहती हैं, तो वो उनका समर्थन करेंगे. चुनाव में हार के एक साल के भीतर ही उन्होंने फूलपुर और गोरखपुर के उप चुनाव लड़ने के लिए मायावती से हाथ मिलाया.

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इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की हार हुई और करीब करीब राजनीतिक हाशिए पर चले गए अखिलेश यादव ने फिर से वापसी की. दो महीने बाद उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल के साथ यही फ़ॉर्मूला अपनाया और कैराना लोकसभा उप चुनाव में भी उनकी पार्टी की ही जीत हुई.

प्रिया सहगल कहती हैं, 'अखिलेश यादव की नाक टूटी हुई है. उनको ये चोट फुटबाल के एक मैच में लगी थी. अखिलेश कहते हैं कि ये उनके लिए एक 'लकी चार्म' है. शायद एक हद तक वो सही हैं. इससे पहले राजनीति में सिर्फ़ एक महिला इंदिरा गाँधी की टूटी नाक रही है. शायद इसी लिए उन्हें भारतीय राजनीति की वास्तविक 'कमबैक - क्वीन' कहा जाता है. अखिलेश इस बार अपने पिता के आज़मगढ़ लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे हैं. देखना है लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव का 'कम बैक' होता है या नहीं?

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