बेगूसरायः चर्चा से बाहर पर रेस से बाहर नहीं गठबंधन उम्मीदवार तनवीर हसन

  • 14 अप्रैल 2019
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बेगूसराय में कौन जीतेगा, इस पर खूब चर्चा हो रही है, ख़ासकर राष्ट्रीय मीडिया में. चुनावी लड़ाई भाजपा उम्मीदवार गिरिराज सिंह और सीपीआई उम्मीदवार कन्हैया कुमार के बीच दिखाई जा रही है.

वहीं, गठबंधन की तरफ से राजद उम्मीदवार तनवीर हसन पूरी तरह से मीडिया कवरेज से गायब हैं.

2014 के लोकसभा चुनावों में बेगूसराय की सीट भाजपा के खाते में गई थी. भाजपा के भोला सिंह को क़रीब 4.28 लाख वोट मिले थे, वहीं राजद के तनवीर हसन को 3.70 लाख वोट मिले थे. दोनों में क़रीब 58 हज़ार वोटों का अंतर था.

वहीं सीपीआई के राजेंद्र प्रसाद सिंह को करीब 1.92 लाख वोट ही मिले थे.

ये आंकड़े तब थे जब कथित रूप से देश में चुनावों के दौरान मोदी लहर थी और तनवीर हसन विजयी उम्मीदवार से महज़ 58 हज़ार वोट पीछे थे.

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Image caption तनवीर हसन के नामांकन के दौरान उमड़ी भीड़

मीडिया का प्रोपेगेंडा?

तो क्या कन्हैया कुमार के आ जाने से पिछले चुनावों में भाजपा को कड़ी टक्कर देने वाले तनवीर फाइट से बाहर हो गए हैं?

इस सवाल पर बेगूसराय के वरिष्ठ पत्रकार कुमार भावेश कहते हैं, "इसे आप राष्ट्रीय मीडिया का प्रोपेगेंडा कह सकते हैं. कन्हैया को वोट कौन देगा, इस पर कोई बात नहीं कर रहा है. सिर्फ़ उन्हें फाइट में दिखाया जा रहा है."

"जाहिर सी बात है कि सीपीआई के कैडर उन्हें वोट करेंगे, उसके अलावा उनका जनाधार क्या है? जबकि भाजपा और गठबंधन का तय वोट बैंक है."

वो कहते हैं कि कन्हैया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने भाषणों में घेरते हैं. वो अच्छा बोलते हैं. दूसरी तरफ गिरिराज सिंह के बयानों को भी मीडिया में जगह मिलती है, वहीं तनवीर हसन राष्ट्रीय फलक पर चर्चित चेहरा नहीं है. यही कारण है कि दिल्ली की मीडिया उन्हें देख नहीं पाती है.

कुमार भावेश कहते हैं कि राष्ट्रीय मीडिया चुनाव को दो चर्चित चेहरों के बीच का मान रही है. जबकि ऐसा नहीं है.

"जितनी संख्या में कन्हैया कुमार के रोड शो में भीड़ उमड़ी थी, उससे कम तनवीर हसन के नामांकन के वक्त भीड़ नहीं थी, लगभग बराबर कह सकते हैं. हां कन्हैया के रोड शो में चर्चित चेहरे आए थे, जिसने मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींचा."

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Image caption कन्हैया कुमार के रोड शो का नज़ारा

राष्ट्रीय मीडिया में क्यों छाए हैं कन्हैया?

वहीं स्थानीय अख़ाबर प्रभात ख़बर के संपादक अजय कुमार भी गिरिराज बनाम कन्हैया की लड़ाई को मीडिया की उपज मानते हैं.

वो कहते हैं, "कन्हैया फाइट में हैं या नहीं है, यह परिणाम से तय होगा. परेशानी यह है कि मीडिया ने अपना एक मिजाज बना लिया है कि बेगूसराय में अगर कन्हैया हैं तो कन्हैया ही मुकाबले में हैं."

"कन्हैया का पूरा एजेंडा मौजूदा सरकार और व्यवस्था के ख़िलाफ़ है. वो मुखर होकर सरकार पर हमला भी बोल रहे हैं, इसलिए वो मीडिया के दिलो दिमाग पर छाए हैं."

अजय कुमार कहते हैं कि बेगूसराय की लड़ाई वोट और सामाजिक व्यवस्था के आधार पर देखेंगे तो मुकाबला तिकोना होने जा रहा है.

"जहां भी रिपोर्ट छप रही है, बात कन्हैया की हो रही है. कन्हैया चुनावी संग्राम में ताजे झोंके की तरह हैं, जो नई राजनीति की बात कर रहे हैं. वो मोदी को चुनौती देने की बात कर रहे हैं और यही वजह है कि यह राष्ट्रीय मीडिया को लुभा रही है."

"पिछले रिकॉर्ड को देखेंगे तो तनवीर हसन का जनाधार मजबूत है. वो फाइट में भी हैं. 2014 के चुनाव भाजपा के भोला सिंह जीते थे और तनवीर हसन दूसरे नंबर पर रहे थे. वोटों का अंतर करीब 58 हजार था. ऐसे में उन्हें सीन से ग़ायब समझना ग़लत है."

Image caption बेगूसराय से किन-किन जातियों के रहे हैं सांसद

ज़मीनी पकड़

राजनीति पर नज़र रखने वाले अभी तक की स्थितियों के मुताबिक़ लड़ाई को त्रिकोणीय बता रहे हैं- गिरिराज सिंह बनाम तनवीर हसन बनाम कन्हैया.

वो यह भी मान रहे हैं कि अंतिम लड़ाई 'मोदी बनाम एंटी मोदी' की ही होगी.

वरिष्ठ पत्रकार कुमार भावेश कहते हैं, "बेगूसराय की लड़ाई मोदी बनाम एंटी मोदी की होगी. ऐसे में जनता के पास मोदी के ख़िलाफ़ जाने के दो विकल्प होंगे. पहला राजद उम्मीदवार और दूसरा कन्हैया.

राजनीति में तनवीर हसन की ज़मीनी पकड़ पुरानी है और कन्हैया अभी इस क्षेत्र में नए-नए हैं. बिहार में महागठबंधन के बनने के बाद जातीय समीकरण के मामले में तनवीर हसन कहीं आगे हैं.

कन्हैया अपने भाषणों में सभी जातियों को लेकर चलने की बात करते हैं, जिसमें अगड़े भी शामिल हैं, पिछड़े भी शामिल हैं. वो जय भीम के नारे भी लगाते हैं. उन्होंने अपने रोड शो में मुस्लिम चेहरों को जगह दी थी.

ऐसे में क्या कन्हैया तनवीर हसन के वोट बैंक में सेंधमारी कर पाएंगे, इस सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार कहते हैं, "इस सप्ताह बिहार की चार सीटों पर जो मतदान हुए हैं, उसमें जातिगत रुझान देखने को मिले हैं. बेगूसराय में भी ऐसा ही देखने को मिल सकता है. कन्हैया इसे बहुत तोड़ पाएंगे, यह कहना मुश्किल है."

वहीं कुमार भावेश भी मानते हैं कि बिहार में जाति के आधार पर वोट डाले जाते हैं. यहां के वोटर किसी की विचारधारा, किसी के भाषण या किसी के कहने से प्रभावित नहीं होते हैं. अगर होते भी हैं तो उनकी संख्या बहुत कम होती, जो जीत हार को प्रभावित नहीं कर पाती.

मुस्लिम वोटर किसकी तरफ

पिछले चुनाव में सीपीआई को 1.92 लाख वोट मिले थे. क्या कन्हैया के आने से यह आंकड़ा सीधे पांच लाख पार कर जाएगा और वो जीत दर्ज कर पाएंगे, इस सवाल पर कुमार भावेश कहते हैं कि ऐसा कभी संभव नहीं है.

"आख़िर इतने वोट कहां से आएंगे. भूमिहार वोट बैंक केवल विचारधारा और विकास के मुद्दे पर बात करने से खिसक जाएगा, ऐसा भी नहीं है. बिहार में ऐसा ट्रेंड कभी नहीं रहा है और न ही बेगूसराय में."

"अभी तक बेगूसराय से 16 सांसद रहे हैं उसमें से 15 भूमिहार जाति से रहे हैं. केवल एक सांसद मुस्लिम समुदाय से रहे हैं."

यह भी कहा जा रहा है कि कन्हैया मुस्लिम वोटरों को साधने में कामयाब होंगे क्योंकि वो मोदी विरोध की सशक्त आवाज़ हैं.

इस पर कुमार भावेश कहते हैं, "इस पर संदेह है कि मुस्लिम वोटर कन्हैया के साथ जाएंगे या नहीं और यह तय होगा चुनाव से पहले आखिरी जुम्मे की नमाज को. लड़ाई मोदी बनाम एंटी मोदी की होगी, ऐसे में जिसका पलड़ा भारी होगा, मोदी विरोध वोट उधर ही जाएगा."

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