नवीन पटनायक चुनाव बाद गठबंधन करने लायक नहीं बचेंगेः धर्मेंद्र प्रधान

  • 14 अप्रैल 2019
धर्मेंद्र प्रधान

ओडीशा में बीजेपी के चुनाव अभियान की कमान संभाल रहे केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने बीबीसी से विस्तार से बात. इस दौरान उन्होंने चुनाव बाद बीजेडी के साथ किसी तरह के गठबंधन की संभावना से इनकार किया.

पढ़िए बीबीसी संवाददाता नितिन श्रीवास्तव और धर्मेंद्र प्रधान की बातचीत के अंशः

तेल के दामों और चुनावों को जोड़कर देखा जाता है कि सत्ताधारी पार्टी चुनाव के दौरान तेल के दामों को प्रभावित करती है.

अगर हम भारत के ग्राहकों को, लोगों को सही दामों पर तेल दे रहे हैं तो इसमें किसी को कोई दिक्कत हो सकती है. अगर हम न चुभने वाला दाम दे रहे हैं तो इसमें दिक्कत क्या है? जनता को ठीकठाक सारी व्यवस्था मिले, यही हमारी कोशिश रहती है. एक ज़माना था जब भारत अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में सिर्फ़ ग्राहक था. हमारी मजबूरी होती थी कि जो दाम मिलता था उस पर ही हमें लेना पड़ता है. लेकिन आज दुनिया के तेल उत्पादक देश भारत की ख़रीद क्षमता को पहचान रहे हैं और इसी के नतीजे में तेल के दाम पहुंच से बाहर नहीं है.

आपकी सरकार के कार्यकाल में ही तेल पर एक्साइज़ ड्यूटी दो सौ प्रतिशत तक बढ़ी है?

आप बात को विष्यांतर क्यों कर रहे हो? आज तेल के दाम नियंत्रित है, उसमें किसी को क्या दिक्कत होनी चाहिए?

चुनाव के समय तेल के दाम कम कर दिए जाते हैं और फिर बढ़ा दिए जाते हैं. ऐसे आरोप भी लगते हैं.

जवाबः चुनाव तो अभी है लेकिन हम पांच सालों के प्रबंधन की बात कर रहे हैं. इन पांच सालों में कभी दाम घटे हैं, कभी बढ़े हैं और कभी स्थिर रहे हैं. हमने तेल के कारण महंगाई नहीं बढ़ने दी है.

भारत और ईरान के बीच पुराने रिश्ते हैं. भारत ईरान के तेल का बड़ा ख़रीददार है लेकिन क्या अब अमरीका के दबाव में भारत और ईरान के रिश्ते प्रभावित हो गए हैं?

जवाबः वो दिन लद गए हैं जब भारत किसी के दबाव में काम करता हो.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान ने भी निराशा ज़ाहिर की है कि कई मौकों पर भारत ने ईरान का समर्थन नहीं किया.

मेरे पास ऐसी कोई जानकारी नहीं है. ये मनगढ़ंत बात है

पिछले चुनाव में ओडिशा में बीजेपी को 21 में से सिर्फ़ एक सीट मिल पाई थी. बीते चार पांच सालों में बीजेपी ने ओडिशा में प्रभाव बढ़ाने की एक मुहिम चलाई है जिसमें आपकी अहम भूमिका रही है. ओडिशा को लेकर आपकी रणनीति क्या है.

पिछले चुनाव में देशभर में एक लहर थी. प्रधानमंत्री मोदी के पक्ष में ये लहर होने के बावजूद ओडिशा में हम इसका फ़ायदा नहीं उठा पाए. हम मोदी लहर को वोट में परिवर्तित नहीं कर पाए. हमारी संस्थागत क्षमता कम थी. बीते पांच साल में राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने बार-बार ओडिशा का दौरा किया है और ज़िला स्तर तक पहुंचे हैं, पार्टी के संगठन के विस्तार की बड़ी योजना बनाई, समाज के हर वर्ग के लोगों को पार्टी से जोड़ा है. प्रधानमंत्री की ग़रीब कल्याणकारी योजनाओं की प्रयोगशाला ओडिशा बना हुआ है. ग़रीबों को सबसे ऊपर रखा गया है. वहीं यहां 19 सालों से सत्ता संभाल रही सत्ताधारी पार्टी के पास कोई रणनीति या सोच नहीं है.

इमेज कॉपीरइट BISWARANJAN MISHRA

यही पार्टी पहले आपकी सहयोगी थी. अब क्या हुआ?

आप दस साल पुरानी बात कर रहे हैं. राजनीति में दो दिन भी लंबा समय होता है. आप जो कहानी कह रहे हो ये बहुत पुरानी बात है. ऐसे तो भारत की रजानीति में आज जो पार्टियां हैं, चंद्रबाबू नायडु तो हमारे साथ दो बार आकर गए हैं, तो क्या विषय इसी पर केंद्रित रहेगा? बीजू जनता दल से हमारा गठबंधन दस साल पहले टूट गया है. आज राज्य की जो दुर्दशा है वो सिर्फ़ इस सरकार (नवीन पटनायक सरकार) की वजह से है.

भाजपा का शीर्ष नेतृत्व और बीजेडी का शीर्ष नेतृत्व एक दूसरे की आलोचना करने से थोड़ा बचता है.

वो ग़रीबों की वजह से आलोचना नहीं कर रहे हैं. प्रधानमंत्री का दिया पैसा ग़रीबों को नहीं दे रहे हैं. आयुष्मान भारत योजना उन्होंने यहां लागू नहीं की. किसानों को सालाना छह साल रुपए देने की योजना भी यहां लागू नहीं की गई है. हम चुनाव में बीजेडी के ख़िलाफ़ एढ़ी-चोटी का ज़ोर लगा रहे हैं. ऊपर से नीचे तक बीजेपी का पूरा नेतृत्व और कार्यकर्ता बीजेडी के ख़िलाफ़ एकजुट हैं.

बीजेडी के 12-15 नेता ऐसे हैं जिन्हें टिकट न मिलने पर बीजेपी ने जगह दे दी है. नवीन पटनायक तो यहां तक कह चुके हैं कि बीजेपी उनके घर के बाहर अपने लिए उम्मीदवार खोज रही है.

अगर नवीन बाबू में रत्ती भर नैतिकता है बची है तो बताएं कि वो कितने लोगों को बीजेपी से लिए हैं. उनकी पार्टी में असहमत लोगों को हम लेकर आए हैं. हमारी पार्टी में बार-बार चुनाव हारे लोगों को वो लेकर गए हैं. नवीन बाबू बड़े आदमी है, बहुत पैसा कौड़ी है पास में, इसलिए बार बार ज़ोर ज़ोर से कहकर वो गोएबेल्स थ्यौरी में वो जा चुके हैं.

बीजेडी, बीजेपी या कांग्रेस- ओडिशा में कौन पड़ेगा भारी

लोकसभा चुनाव 2019: वो तीन खिलाड़ी जिन्होंने अपने पत्ते नहीं खोले

प्रभु जगन्नाथ और मोदीजी के आशीर्वाद के भरोसे डॉ. संबित पात्रा

'हेडमास्टर' शाह चेक करेंगे ओडिशा में 'होमवर्क'

आपकी पार्टी में कई ऐसे कद्दावर नेता थे जिन्हें नज़रअंदाज़ किया गया है. बहुत कम अंतर से हारने वालों को भी नज़रअंदाज़ किया गया है?

हमारी पार्टी एक कैडर आधारित पार्टी है. कैडर आधारित पार्टी में धर्मेंद्र प्रधान की भी कोई हैसियत नहीं है. हम सभी संभावनाओं को ध्यान में रखकर उम्मीदवार चयन करते हैं.

आप पार्टी के वरिष्ठ नेता है, आपको मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार क्यों नहीं बनाया गया?

मैं वरिष्ठ नेता नहीं हूं सामान्य कार्यकर्ता हूं. पिछले पैंतीस साल से यही काम कर रहा हूं. मेरे ऊपर बहुत योग्य कार्यकर्ता बैठे हैं. पार्टी बहुमत लाएगी तब तय किया जाएगा कि कौन सीएम होगा.

अगर केंद्र में सीटें कम आती हैं तो क्या बीजेडी से समर्थन लिया जाएगा?

कोई संभावना ही नहीं है, इस बार हम सभी 21 सीटें जीत रहे हैं. बीजेडी समर्थन देने लायक बचेगी ही नहीं.

सवालः आप चुनाव क्यों नहीं लड़ रहे हैं?

हमारी पार्टी की संसदीय बोर्ड ये तय करती है कि कौन लड़ेगा कौन नहीं. मैं पार्टी का सामान्य कार्यकर्ता हूं. पार्टी जो काम देती है मैं वही करता हूं. मैं दूसरे राज्यों से भी राज्यसभा में गया हूं. हमारी पार्टी किसी की व्यक्तिगत मालिकान हक़ वाली पार्टी नहीं है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए