2019 में दलित मतदाताओं का रुझान किस ओर है?

  • 14 अप्रैल 2019
इमेज कॉपीरइट Getty Images

अगर मौजूदा लोकसभा चुनाव में किसी की लहर नहीं चल रही है और यह चुनाव सामाजिक, जाति आधारित स्थानीय मुद्दों पर ही लड़ा जा रहा है तो सबसे अहम सवाल क्या होगा- मौजूदा चुनाव में दलितों का वोट किस तरफ है?

दलितों को परंपरागत तौर पर कांग्रेस का वोटर माना जाता रहा है या फिर उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में दलितों का वोट मायावती की बहुजन समाज पार्टी को मिलता रहा है, लेकिन 2014 के आम चुनाव में इस बात के संकेत मिले कि दलित बीजेपी के करीब आ गए हैं. तब मोदी लहर थी और उनसे स्थानीय जातिगत समीकरण को अप्रभावी बना दिया था. लेकिन क्या इस चुनाव में यही स्थिति है?

इस सवाल के जवाब में हमें ये भी देखना होगा कि बीजेपी के बीते पांच साल के शासन में क्या कुछ हुआ है. ये कहा जाता रहा है कि दलितों पर अत्याचार के मामले बढ़े हैं. देश के कई अहम राज्यों से दलितों पर अत्याचार के मामले लगातार सामने आते रहे हैं.

इन अत्याचारों के विरोध में प्रदर्शन की खबरें भी आयीं. हैदराबाद में रोहित वेमुला की आत्महत्या का मामला हो या फिर गुजरात के उना में दलितों की पिटाई का मामला रहा हो या फिर महाराष्ट्र में भीमा कोरेगांव का मामला हो- इन सबके खिलाफ देश भर में प्रदर्शन देखने को मिले. कुछ राज्यों के विधानसभा चुनाव के दौरान भी दलित समुदाय का मुद्दा महत्वपूर्ण साबित हुआ.

ऐसे में अहम सवाल यही है कि इस आम चुनाव में दलितों का रूझान किस तरफ है? जिन राज्यों में दलितों पर अत्याचार उन राज्यों में दलितों के वोटिंग पैटर्न पर कोई असर पड़ा है, कोई बदलाव हुआ है?

महाराष्ट्र का वंचित बहुजन अघाड़ी तेज बहस के केंद्र में है. प्रकाश आंबेडकर ने एमआईएम के असुद्दीन ओवैशी से हाथ मिला कर दलित और मुस्लिम मतदाताओं को एकजुट करने की कोशिश की. वे महाराष्ट्र के प्रयोग को फिर से दोहाराना चाहते हैं.

महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में हिंसा, एक जनवरी को भड़की थी, जहां यलगार परिषद को लेकर विवाद हुआ था.

हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों को इस पृष्ठभूमि में भी देखा जा सकता है. महाराष्ट्र में जिस तरह से नए राजनीतिक गठबंधन बने हैं, उसे देखते हुए माना जा सकता है कि इस चुनाव में महाराष्ट्र के अंदर दलितों की भूमिका निर्णायक होने वाली है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

लेकिन लोकसभा की सीटों का दायरा बहुत बड़ा होता है और वंचित अघाड़ी के समर्थकों का असर अपेक्षाकृत छोटे हिस्सों में नजर आता है. इसलिए ये समर्थक वंचित अघाड़ी को कोई कामयाबी दिला पाएंगे, इसको लेकर संदेह होता है. हालांकि यह भी कहा जा रहा है कि जो वोटर अब तक कांग्रेस-एनसीपी को वोट कर रहे थे अब वे वंचित अघाड़ी को वोट करेंगे, ऐसे में इसका फायदा बीजेपी-शिवसेना गठबंधन को हो सकता है.

महाराष्ट्र में दलितों का कितना असर

महाराष्ट्र में दलितों के मुद्दे पर लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार अरुण खोरे कहते हैं, "दलितों में जो लोग पहली बार वोट करेंगे या स्थापित तौर पर मिडिल क्लास में शामिल हो चुके दलित, अभी भी मोदी के खिलाफ नहीं हैं."

तो इस बार के चुनाव में बदलाव क्या महसूस किया जा रहा है, ये पूछे जाने पर खोरे बताते हैं, "लेकिन दलितों का बड़ा समूह भीमा कोरेगांव की हिंसा के बाद प्रकाश आंबेडकर के साथ है. मैं ने ये भी देखा है कि अब तक रामदास अठावले की रिपब्लिकन पार्टी का समर्थन करने वाले समूह भी आंबेडकर के साथ हो गए हैं. भीमा कोरेगांव की हिंसा के बाद जब आंबेडकर ने तीन जनवरी को महाराष्ट्र बंद का ऐलान किया था तब अठावले की पार्टी के कई कार्यकर्ताओं ने सड़क पर उतरकर बंद कराया था."

प्रकाश आंबेडकर अपनी बहिरपा बहुजन महासंघ के जरिए राजनीति में बीते कई सालों से सक्रिय थे. लेकिन राज्य में दलितों की राजनीति का रिपब्लिकन आंदोलन कई हिस्सों में बंटा हुआ है. इनमें पहले कांग्रेस-एनसीपी के साथ रहे और अभी बीजेपी के साथी रामदास अठावले का प्रभाव सबसे ज्यादा है.

हालांकि भीमा-कोरेगांव की हिंसा के बाद प्रकाश आंबेडकर ने जिस तरह का स्टैंड लिया है, उससे वो अभी सबसे आगे दिख रहे हैं. खोरे का मानना है कि इसका असर इस लोकसभा चुनाव के साथ साथ आने वाले दिनों में होने वाले विधानसभा चुनाव पर भी साफ दिखेगा.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

वे कहते हैं, "आज महाराष्ट्र में, प्रकाश आंबेडकर जितना आक्रामक रिपब्लिकन आंदोलन का कोई दूसरा नेता नहीं दिखता. खासकर अठावले की पार्टी की ओर से अभी कोई मैदान में भी नहीं आया है. खावाडे और गावाई का समूह भी कांग्रेस की छाया में काम कर रहा है. इन दोनों की अपनी पहचान नहीं है. ऐसे समय में प्रकाश आंबेडकर ने सीधा स्टैंड लिया है. पहले उन्होंने अपनी बहरिपा बहुजन महासंघ का विलय वंचित बहुजन अघाड़ी में किया और उसके बाद एमआईएम से हाथ मिलाकर मुस्लिम मतों को जुटाने की कोशिश की है. इन सबका असर तो पड़ेगा."

बीते कई सालों से राजनीतिक पत्रकारिता कर रहे समर खड़से का मानना है कि दलित समूहों का साथ तो प्रकाश आंबेडकर को मिल रहा है लेकिन यह चुनाव मोदी के इर्द गिर्द हो रहा है, ऐसे में इसका असर दलित मतदाताओं पर भी पड़ेगा.

वे कहते हैं, "2014 में दलितों का वोट बीजेपी को मिला था, मैं इस राय से सहमत नहीं हूं. हर पार्टी को हर जाति समूह का वोट मिला था. लेकिन दलितों में, बौद्धों का मत बीजेपी-शिवसेना को नहीं मिला था. इस बार के चुनाव में दलित प्रकाश आंबेडकर के प्रति आकर्षित हो रहे हैं, लेकिन महाराष्ट्र में इस वक्त मोदी ही केंद्रीय मुद्दा हैं."

"इस वक्त स्थिति मोदी और मोदी विरोधी के रूप में बंट चुकी है. दलितों के खिलाफ अत्याचार के मामलों से नाराज दलित प्रकाश आंबडेकर के साथ जा सकते हैं. लेकिन अभी भी इस समुदाय का बड़ा हिस्सा कांग्रेस और एनसीपी को वोट देगा. ऐसा नहीं हुआ, तो कुछ हिस्सों में जो करीबी लड़ाई दिख रही है वो करीबी नहीं रह जाएगी."

आंबेडकर ने ओवैशी से हाथ मिलाया है और मुस्लिम समुदाय के कई पिछड़ों को उम्मीदवार भी बनाया है ताकि गठबंधन का असर हो सके. वे खुद को दलित मतदाताओं तक सीमित नहीं रखना चाहते हैं.

हालांकि इस गठबंधन का कितना असर होगा, ये देखना अभी बाकी है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

समर खड़से बताते हैं, "आंबेडकर और ओवैशी को लेकर उलझन की स्थिति है. मुस्लिम समुदाय पूरी तरह से एमआईएम के साथ नहीं है. अगर मुसलमान किसी बात पर नाराज होते हैं तो वे कांग्रेस से अलग कुछ स्टैंड लेते हैं. जैसे कि बाबरी मस्जिद को गिराए जाने के बाद महाराष्ट्र में भी मुसलमानों ने समाजवादी पार्टी को वोट दिया था."

"लेकिन पिछले पांच साल सालों की बात करें, तो मुस्लिम समुदाय एमआईएम के प्रति आकर्षित होता नजर आया है. लेकिन जब आप मोदी सरकार के पांच साल को देखें तो, मुझे लगता है कि मुस्लिम समुदाय कांग्रेस-एनसीपी के साथ ही रहेगा. ऐसे में प्रकाश आंबेडकर को बौद्ध समुदाय का वोट मिलेगा."

"हालांकि उनका दावा ये भी कि उन्हें 12 बलुतेदार जातियों का वोट भी मिल रहा है, लेकिन ये समुदाय उनके साथ नहीं दिख रहे हैं. दरअसल ऐसे प्रयोग आसानी से कामयाब नहीं होते. उन्हें कई साल काम करना पड़ता है. कई समीकरणों को साधना होता है. प्रकाश आंबेडकर के साथ वैसा कोई समीकरण नहीं दिखता है. इसलिए वंचित बहुजन अघाड़ी की कामयाबी पर संदेह है."

अतीत में भी, दलितों का वंचित अघाड़ी की तरह आरडीएलएफ ( रिपब्लिकन डेमोक्रेट लेफ्ट फ्रंट) बना था. उस वक्त भी भीमा कोरेगांव की हिंसा की तरह खैरलांजी का मुद्दा गर्माया हुआ था. लेकिन उसका असर चुनावी राजनीति पर बहुत ज्यादा नहीं पड़ा. ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या इस बार तस्वीर बदलेगी?

अरुण खोरे बताते हैं, "खैरलांजी तो एक तरह से विरोध करने की सजा थी. लेकिन भीमा कोरेगांव कि हिंसा ने पहचान को भी बदला है. विरोध और उसको दबाए जाने की घटना अतीत में कई बार हो चुकी है. लेकिन उस दौरान लोग ये मानते थे कि मौजूदा सरकार वैचारिक रूप से हमारे साथ है. लेकिन भीमा कोरेगांव की घटना ने पहचान को झकझोरा है."

"आंबेडकर आंदोलन से जुड़े युवाओं को लग रहा है कि उनकी पहचान को चुनौती दी जा रही है. दलितों को फिर से ये लगने लगा है कि जाति के नाम पर उनको दबाने की कोशिश फिर होगी. यही वजह है कि वंचित बहुजन अघाड़ी की सभाओं में भीड़ काफी जुट रही है."

महाराष्ट्र में कोशिश की जा रही है कि दलित और मुस्लिम मतों को उसी तरह एक साथ लाया जा सके जिस तरह से उत्तर प्रदेश में यादव और दलित वोट बैंक एकजुट हुआ है.

ऐसे अहम सवाल ये भी है कि उत्तर प्रदेश में क्या होगा? क्योंकि उत्तर प्रदेश के बिना देश के दलितों की बात नहीं हो सकती है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

उत्तर प्रदेश में 80 लोकसभा सीटें हैं, इस वजह से भी यह भी सबसे महत्वपूर्ण राज्य है. खास बात यह है कि यहां दलित किसी दूसरे समुदाय के साथ मिलकर विनिंग कांबिनेशनल बनाते रहे हैं. राज्य में करीब 12 फीसदी दलित मतदाता हैं जो मायावती की बहुजन समाज पार्टी के करीब मानी जाती है जबकि अखिलेश यादव के अपने समुदाय की आबादी नौ फीसदी के आसपास है.

चूंकि दोनों पार्टी आपस में हाथ मिला चुकी है, ऐसे में दुनिया भर की नजरें यूपी पर ही टिकी हैं. यह कहा जाता रहा है कि 2014 में हिंदुत्व के नाम पर दलितों ने बीजेपी को वोट किया था जिसके चलते बीजेपी को राज्य में 73 सीटें मिल गई थीं जबकि एक समय में राज्य में बहुमत में रही मायावती की पार्टी का खाता तक नहीं खुला. लेकिन इस बार स्थिति क्या होगी, उसमें कोई बदलाव होगा?

दलितों पर बढ़ा है अत्याचार

उत्तर प्रदेश के रामपुर में रहने वाले वरिष्ठ लेखक-चिंतक कंवल भारती कहते हैं, "दलित वोट हमेशा बंटते हैं. इस बार भी यही होगा. जिन दलितों में जागरूकता है वे एसपी-बीएसपी गठबंधन को वोट करेंगे. लेकिन दलितों में पिछड़े हुए लोग बीजेपी को वोट करेंगे. इन लोगों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिंदुत्व का असर है. हिंदुत्व के असर से जो बाहर नहीं निकल पाएंगे वो बीजेपी को वोट करेंगे. यही स्थिति पिछड़ा वर्ग की भी है. यादव को छोड़ दें तो दूसरे अति पिछड़े बीजेपी के साथ जा सकते हैं."

फारवर्ड प्रेस के संपादक और राजनीतिक मामलों पर नजर रखने वाले प्रमोद रंजन भी मानते हैं कि दलितों का एक छोटा हिस्सा बीजेपी के साथ जा सकते हैं. वे कहते हैं, " 2014 में बीजेपी की जीत की मुख्य वजह दलितों और पिछड़ों का वोट रहा था. उस वक्त नरेंद्र मोदी ने खुद को पिछड़ा बताकर लोगों से वोट मांगे थे. उन्होंने ये भी वादा किया था कि उनकी सरकार दलितों-पिछड़ों और गरीबों की सरकर होगी."

प्रमोद रंजन ये भी बताते हैं, "सीएसडीएस के सर्वे के मुताबिक 29 प्रतिशत दलित मतदाताओं ने बीजेपी को वोट दिया था. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. लेकिन इस बार स्थिति दूसरी है. अब दलित और पिछड़े सामाजिक बराबरी का हक मांग रहे हैं और बीजेपी की ब्राह्मणवादी ताकतें इनके खिलाफ काम कर रही हैं. चाहे वो सहारनपुर का मामला हो या फिर भीमा कोरेगांव का मसला रहा हो, सामाजिक रूप से पिछड़े और दलितों को काफी अपमान झेलना पड़ा है."

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के सामने अस्तित्व का संकट है, ऐसे में दोनों पार्टियों ने हाथ मिलाकर यादव और दलितों के वोट को एकजुट करने की कोशिश की है. हालांकि अतीत में मायावती और मुलायम सिंह यादव में राजनीतिक दुश्मनी रही है और दोनों एक दूसरे के विरोधी रहे हैं. लेकिन 2014 को लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की लहर को देखते हुए एसपी-बीएसपी ने सोशल इंजीनियरिंग का सहारा लिया है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

कंवल भारती कहते हैं, "यूपी में ओबीसी और दलितों के बीच हमेशा से संघर्ष रहा है लेकिन राजनीति में तो कुछ भी संभव है. अभी उनके सामने अस्तित्व का संकट है, लिहाजा वे एकसाथ हो गए हैं. यह एकतरह से समझदारी ही है. यह गठबंधन यूपी में बेहद मजबूत है. उनकी सीटें बढ़ेंगी और बीजेपी को इसका नुकसान होगा."

लेकिन इस गठबंधन के अलावा एक और बात अहम है, मौजूदा मोदी सरकार के शासन में दलित समुदाय पर अत्याचार के मामले लगातार सामने आते रहे हैं.

कंवल भारती कहते हैं, "राज्य में भी बीजेपी की सरकार है. इस दौरान दलितों को पीटा जा रहा है, उनका रोजगार छिना जा रहा है, आरक्षण पर खतर है. दलितों के जो मुद्दे हैं, उन पर बीजेपी बात नहीं करती है. बीजेपी केवल राष्ट्रवाद की बात कर रही है. दलित मतदाता ऐसे राष्ट्रवाद का मतलब नहीं समझते. वे अत्याचार, आरक्षण और रोजमर्रे की चुनौतियों को देख रहे हैं."

"बीजेपी ने दलितों के मुद्दों पर कुछ नहीं किया है. अब बीजेपी वाले कह रहे हैं कि आंबेडकर मुस्लिमों के ख़िलाफ़ थे. वे इन बयानों से दलितों और मुस्लिम मतों को एकजुट होने से रोकना चाहते हैं. यह बात तय है कि बीजेपी को यूपी में नुकसान होगा और दलित मतदाता उसकी सबसे बड़ी वजह होंगे. दलितों के बाद मुस्लिम वोट भी अहम वजह साबित होंगे."

लेकिन क्या इसका फायदा केवल समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को होगा.

दलित मतदाता ना केवल उत्तर प्रदेश में निर्णायक स्थिति में हैं, बल्कि बिहार में भी वे निर्णायक भूमिका में हैं. ऐसे में एक सवाल यह भी है कि वहां क्या होगा? क्या बिहार में दलितों के खिलाफ होने वाली हिंसा कोई मुद्दा है? प्रमोद रंजन मानते हैं कि बीजेपी को नुकसान होगा और इसका फायदा कांग्रेस को होगा.

प्रमोद रंजन बताते हैं, "उत्तर भारत में कांग्रेस को फायदा होगा. एसपी, बीएसपी, आरजेडी का दावा दलितों और पिछड़ों के समर्थक होने का है लेकिन ये पार्टियां स्वार्थी राजनीति में शामिल हैं. कांग्रेस की स्थिति भी कोई बेहतर नहीं है. लेकिन दलितों के सामने विकल्प नहीं है, ऐसे में लोग राहुल गांधी के साथ हो सकते हैं. मेरे ख्याल से देश दो दलों वाली राजनीतिक व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है."

इमेज कॉपीरइट Getty Images

उत्तर प्रदेश में, अखिलेश यादव और मायावती के गठबंधन के अलावा चंद्रशेखर आजाद रावण की भीम आर्मी का भी दलितों पर असर है. सहारनपुर में दलितों के खिलाफ हुई हिंसा के बाद चंद्रशेखर युवा नेता के तौर पर उभरे, उन्होंने खुद के वाराणसी सीट से लड़ने का ऐलान भी किया है, देखना होगा कि वे मायावती के वोट बैंक में सेंघ लगा सकते हैं?

दक्षिण भारतीय राज्यों में दलित मतदाताओं को लेकर क्या रूझान दिखता है? आंध्र प्रदेश-तेलंगाना में दलित मतदाताओं का असर है. रोहित वेमुला की आत्महत्या का मामला हो या फिर प्रणय कुमार की ऑनर किलिंग का मामला रहा हो, इन सबको लेकर विरोध प्रदर्शन देखने को मिला था. ऐसे में क्या इन राज्यों में भी दलितों का रूझान निर्णायक भूमिका निभाएगा.

पिछड़ों और दलितों के मुद्दे पर लिखने वाली पत्रकार पद्मजा शॉ कहती हैं, "इस सरकार के कार्यकाल के दौरान तेलंगाना और पड़ोसी राज्यों में दलितों पर काफी अत्याचार के मामले सामने आए हैं. तेलंगाना में इस तरह के मामले पहले कभी नहीं देखे गए. सारे पिछड़े और दलित एकजुट होकर अलग तेलंगाना राज्य की मांग कर रहे थे. इससे पहले इन लोगों ने एकजुट होकर निजाम या फिर भूस्वामियों से संघर्ष किया था."

"लेकिन तेलंगाना राज्य बनने के बाद स्थिति में बदलाव दिखा. दलितों पर अत्याचार के मामले तेजी से बढ़े हैं. निजी तौर पर मैं 30 मामले बता सकती हूं जिसमें दलितों के साथ काफी अत्याचार किया गया. अत्याचार करने वाले, मौजूदा सरकार का समर्थन करने वाला वर्ग है. किसी एक मामले में न्याय नहीं हुआ है. ऐसे में दलित नाराज तो हैं ही."

लेकिन इस नाराजगी का असर लोकसभा चुनाव में कितना दिखेगा?

इमेज कॉपीरइट Getty Images

पद्मजा शॉ बताती हैं, "तेलंगाना की राजनीति विचित्र है, हाल मे हुए राज्य चुनाव के दौरान लोग नाराज थे, अपने विधायकों को अपने इलाके में घुसने नहीं दे रहे ते लेकिन रूलिंग पार्टी चुनाव जीत गई, उनके विधायक 30 से 40 हजार के बड़े अंतर से चुनाव जीतने में कामयाब हुए. इस बार देश का चुनाव है लेकिन मुद्दे तो वही हैं. जमीनी स्तर पर दलितों की स्थिति और राजनीतिक समीकरण, मेरे ख्याल से अलग अलग चीजें हैं. ये दोनों एक दूसरे पर बहुत असर नहीं डालते. पैसा, राजनीतिक प्रभाव और पुलिस-प्रशासन गठजोड़ के चलते राजनीतिक दल जैसा चाहते हैं वैसा होता रहा है."

चार महीने पहले तेलंगाना में विधानसभा चुनाव हुए थे, जिसमें तेलंगाना राष्ट्र समिति को बहुमत मिला है. इस चुनाव के दौरान दलितों पर अत्याचार का मामला नहीं उठा. बीजेपी यहां हिंदुत्व को अपना मुद्दा बना रही है, लेकिन उसे अब तक कामयाबी नहीं मिली है. आंध्रा में चंद्रबाबू नायडू बीजेपी से अलग हो चुके हैं, ऐसे में कहा जा रहा है कि केसीआर बीजेपी के नजदीक जा सकते हैं.

लेकिन इन समीकरणों के बीच दलित मतदाता कहां हैं?

इसके जवाब में पद्मजा नायडू बताती हैं, "परंपरागत तौर पर इलाके का दलित मतदाता कांग्रेस का वोटर रहा है. लेकिन कांग्रेस में नेतृत्व का संकट था, लिहाजा दलित उनसे दूर हो गए. इस बार कांग्रेस ने अच्छे उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है, लेकिन इसका कोई असर होगा, ये बात दावे से नहीं कही जा सकती. चुनावी रैलियों में शराब और पैसा भी बड़े पैमाने पर बंटता है. इनका मतदाताओं पर असर होता है. ये तय है कि दलितों का वोट इस बार भी बंटेगा."

विश्लेषकों की मानें, तो दलितों पर हुए अत्याचार और उसके बाद राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शनों का असर दलितों पर पड़ा है और वे रणनीतिक वोटिंग कर रहे हैं. वे स्थानीय तौर पर उन उम्मीदवारों को वोट दे सकते हैं जो बीजेपी और सहयोगियों के उम्मीदवार को हरा सकें. खासकर जिन जगहों पर दलित निर्णायक भूमिका में हैं वहां वे बीजेपी का सिरदर्द बढ़ा रहे हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए