लोकसभा चुनाव भागलपुरः मंडल और मंडल की लड़ाई में कमंडल कहां है?

  • 14 अप्रैल 2019
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Image caption भागलपुर रेलवे स्टेशन

बिहार की राजधानी पटना से करीब 250 किमी दूर है भागलपुर. रेल और सड़क मार्ग के जरिए यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है.

ज़िला प्रशासन की वेबसाइट के अनुसार यह "बिहार की रेशम नगरी" है. वेबसाइट पर ही ज़िले का संक्षिप्त इतिहास भी पढ़ने को मिल जाएगा. जिसके अनुसार भागलपुर का वर्तमान चंपानगर और पूर्व में "चंपा" के नाम से जाना जाने वाला यह शहर अंग प्रदेश की राजधानी भी थी.

बौद्ध साहित्य के अनुसार पूर्व का चंपा एक बहुत ही खुबसूरत नगर था. जहां बुद्ध का भी आए थे. और कहते हैं कि बुद्ध को चंपा इतना अच्छा लगा कि अपने महापिरिनिर्वाण से पूर्व उन्होंने चंपा आने की इच्छा भी जताई थी.

आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया की ओर से प्रकाशित 1879-80 में ए. कन्निंघम के बिहार और बंगाल दौरे की एक रिपोर्ट में कहलगांव की रिपोर्टिंग के दौरान लिखा था कि उस वक़्त बिहार में कहलगांव को लेकर एक लोकोक्ति प्रचलित थी,

"भागलपुर के भगलिया

कहलगांव के ठग

पटना का दिवालिया

तीनों नामजद"

मतलब "भागलपुर के उचक्के, कहलगांव के ठग और पटना के दीवालिया लोग, ये तीनों बुरे होते हैं.

ये सब पुरानी बातें हो गईं. आज का भागलपुर बिहार का सिल्क सिटी है. यहां की आबादी 30 लाख से अधिक हो गई है. छह विधानसभा क्षेत्र हैं. जिसमें 16 प्रखंड और 1515 गांव हैं.

इस बार के लोकसभा चुनाव में कुल नौ प्रत्याशी मैदान में है. लेकिन टक्कर दो के बीच ही मानी जा रही है. यूपीए गठबंधन ने राजद के अपने वर्तमान सांसद बुलो मंडल को फिर से मैदान में उतारा है.

जबकि एनडीए में ये सीट जदयू के खाते में चली गई है. जदयू ने बुलो के ख़िलाफ़ नाथनगर के अपने विधायक अजय मंडल को सामने किया है. बाकी अन्य पार्टियां मसलन बसपा, आप और निर्दलीय उम्मीदवार भी चुनाव लड़ रहे हैं. लेकिन उन्हें रेस से बहुत दूर माना जा रहा है.

इस तरह भागलपुर में लोकसभा चुनाव का सबसे बड़ा फैक्टर मंडल फैक्टर बन गया है. एक मंडल बुलो तो थे ही, अब उनके ख़िलाफ़ अजय मंडल को खड़ा करके एनडीए ने एक बड़ा दांव खेला है.

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Image caption ए. कन्निंघम की किताब

मंडल-मंडल की लड़ाई

लेकिन मंडल और मंडल की इस लड़ाई में इस बार कमंडल कहां है? इस सवाल का जवाब देने से पहले ही तिलकामांझी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ योगेंद्र मुस्कुराने लगे. उन्होंने पूछा "क्या आपका मतलब बीजेपी से है?"

दरअसल सवाल तो यही है कि बीजेपी ने यह सीट क्यों छोड़ दी? जबकि पिछली बार उनके उम्मीदवार शाहनवाज हुसैन करीब 9000 के मामूली वोटों के अंतर से ही हारे थे.

आखिर भाजपा भागलपुर से क्यों नहीं लड़ी?

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Image caption जेडीयू के उम्मीदवार अजय मंडल

डॉ योगेंद्र जो पिछले लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के टिकट पर चुनाव भी लड़े थे, कहते हैं, "ये मजबूरी में लिया गया फ़ैसला था. कोई भी अपने हारे हुए उम्मीदवार को मैदान में नहीं उतारना चाहता. भाजपा की हारी हुई सीटें इस बार जदयू को मिली हैं. भागलपुर में भी ऐसा ही हुआ. पिछली बार जिस तरह शाहनवाज हारे थे और उन्होंने भीतरघात का आरोप लगाए थे, कमोबेश वैसी ही परिस्थितियां इस बार भी थी. यही वजह है भाजपा ने यह सीट जदयू के खाते में डालकर बहुत सेफ खेला है."

सवाल यह भी उठता है कि क्या इस फ़ैसले से स्थानीय भाजपाई नेताओं में असंतोष और ज्यादा नहीं बढ़ेगा?

डॉ योगेंद्र कहते हैं, "असंतोष तो है ही. बहुत दिनों तक तो भाजपा के स्थानीय नेताओं ने चुनाव प्रचार से दूरी बना ली थी लेकिन मोदी की सभा होने के बाद से माहौल फिर बदला है. अब मोदी के नाम पर वोट मांगे जा रहे हैं."

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Image caption आरजेडी के उम्मीदवार बुलो मंडल

भाजपा के भीतर असंतोष

बीते पांच साल से भागलपुर में भाजपा के तीन बड़े नेता शाहनवाज हुसैन, अश्विनी चौबे और निशिकांत दूबे अपने लिए लोकसभा टिकट की तैयारी कर रहे थे. लेकिन एनडीए के सीट बंटवारे में जब भागलपुर जदयू के खाते में चला गया तो तीनों नेताओं ने भागलपुर की ज़मीन छोड़ दूसरे जगहों पर अपना आसन जमा लिया.

टिकट कटने के बाद ट्विटर पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाम लेकर दुख जताने वाले शाहनवाज इन दिनों स्टार प्रचारक बनकर पश्चिम बंगाल चले गए हैं. निशिकांत दूबे को गोड्डा से टिकट मिल गया है और अश्विनी चौबे पार्टी ने उन्हें बक्सर में भेज दिया है.

डॉ योगेंद्र कहते हैं, "ये तीनों नेता अकेले नहीं गए हैं. बल्कि अपने साथ कार्यकर्ताओं और समर्थकों को भी साथ ले गए हैं. भागलपुर में चुनावी प्रचार में मुश्किल से आपको बीजेपी कार्यकर्ता-समर्थक दिख जाएं."

क्या इससे एनडीए के उम्मीदवार अजय मंडल को नुकसान नहीं होगा? डॉ योगेंद्र का कहना है, "नुकसान तो वैसे भी हो रहा है. पिछली बार जिन कारणों से बीजेपी हारी थी, वही कारण आज जदयू के लिए है. पिछली बार नोटा के करीब 11 हजार वोट पड़े थे. इस बार हो सकता है कि वो संख्या ज्यादा हो जाए.''

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Image caption चुनाव प्रचार के दौरान अजय मंडल (सबसे दाएं)

किस मंडल की तरफ जाएंगे मतदाता?

इसमें कोई दो राय नहीं कि भागलपुर की इस लड़ाई में 'मंडल फैक्टर' सबसे आगे है. ऐसा नहीं है कि बीजेपी ने बहुत आसानी से भागलपुर सीट जेडीयू के नाम कर दी. बल्कि उन्हें पता था कि मंडल समुदाय के करीब 4.5 लाख वोट महत्वपूर्ण हो सकते हैं.

लेकिन मंडल समुदाय के ये वोट किस मंडल को मिलेंगे? बुलो को या फिर अजय को?

दैनिक भास्कर भागलपुर के स्थानीय संपादक राजेश रंजन कहते हैं, "इसके लिए हमें मंडल वोटों के गणित को समझना होगा. गणित ये है कि मंडल भी दो समूहों में बंटे हुए हैं. एक मंडल वो हैं जो गंगा के इस पार के हैं. दूसरे मंडल गंगा के उस पार के हैं. उन्हें गंगौता पुकारा जाता है.''

''बुलो मंडल गंगा के उस पार के हैं. अजय मंडल इस पार से हैं यानी नाथनगर से, इसलिए इनका समर्थन इस क्षेत्र में अधिक है. लेकिन अगर पूरे मंडल समुदाय की बात की जाए तो उसमें बुलो मंडल की पैठ ज्यादा अच्छी है.''

''इसके पीछे ढेर सारी वजहें हैं. पहला तो बुलो की छवि एक जननेता के रूप में रही है. दूसरी तरफ अजय व्यापारी जगत से राजनीति में आए हैं."

हालांकि डॉ योगेंद्र इस पर दूसरा नजरिया रखते हैं, वे कहते हैं, "पिछली बार शाहनवाज के हारे हुए वोटों का अंतर नोटा से अधिक था. इस बार भी नोटा को पड़ने वाले वोट बहुत मायने रखेंगे. मुझे आशंका इस बात की भी है कि कहीं बीजेपी को पड़ने वाले वोट अजय मंडल और जदयू के नाम के कारण नोटा पर नहीं चला जाए."

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Image caption आपस में चर्चा करते भागलपुर के लोग

शहनवाज पर सवाल

पिछली दफा चर्चा थी कि शहनवाज इसलिए हार गए क्योंकि भीतरघात हो गया था. इस बार तो वो रेस में नहीं हैं. क्या वो अब भीतरघात नहीं करेंगे?

दैनिक भास्कर के संपादक राजेश के अनुसार, "यह बात केवल शाहनवाज के लिए ही नहीं, बल्कि दूसरों के लिए भी है. कोई भी भाजपा का नेता यह सीट जदयू को देने के लिए तैयार नहीं था. अब जब यह सीट जेडीयू को मिल ही गई है तो भाजपा के स्थानीय नेता इसे जितवाकर जेडीयू के पास ही नहीं रहने देना चाहेंगे."

सवाल ये है कि आखिर जनता क्या सोचती है? इसके लिए हम पहुंचे नाथनगर इलाके में जहां से अजय मंडल विधायक हैं. नाथनगर विधानसभा क्षेत्र भी है. जहां मुसलमान आबादी सबसे अधिक है.

बौद्ध साहित्य में वर्णित चंपानगर से होते हुए नाथनगर पहुंचने के क्रम में इस इलाक़े की बदहाली नज़र आ जाती है. चंपानगर की सड़कों से गुजरते हुए ऐसा लगा जैसे ये भागलपुर की सबसे खराब सड़क हो. सड़क पर बह रही नालियां और गलियों में गंदगी का अंबार.

सड़क के किनारे चाय की एक दुकान के ठीक सामने बैठकी जमाये कुछ लोगों से जब हमने इस गंदगी पर सवाल किया तो जवाब मिला, "हां ये वही चंपा है जिसे देख भगवान बुद्ध मोहित हो गए थे लेकिन अब ये हमारा चंपानगर है जहां कोई नहीं आता."

एक स्थानीय निवासी मो. फिरोज कहते हैं, "आप बुलो मंडल या अजय मंडल से पूछिए. जब से चुनाव जीतकर गए हैं यहां नज़र नहीं आए. अब तो चुनाव भी इतना करीब आ गया है, मगर कोई वोट मांगने भी नहीं आया."

नाथनगर और चंपानगर का इलाका मुसलमान बहुल है, शाहनवाज हुसैन के नाम पर वहां के मुस्लिम वोटरों में सहानुभूति देखने को मिल जाती है.

चंपानगर के बुनकर कामरान वारसी कहते हैं, "शाहनवाज को जानबूझकर टिकट नहीं दिया गया. ये मोदी और शाह की साजिश है. अगर शाहनवाज को बीजेपी टिकट दी होती तो हमें कोई दिक्कत नहीं थी. जो कुछ भी चंपानगर और नाथनगर में दिख रहा है वो शाहनवाज साहब की देन है."

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Image caption भाजपा नेता शाहनवाज़ हुसैन

चुनाव प्रचार पर ज़ोर

जहां तक बात चुनाव प्रचार की है तो सारे उम्मीदवार जोर-शोर से चुनाव प्रचार में जुटे हैं. जदयू के अजय मंडल से संपर्क करने पर जवाब मिला कि अभी केवल चुनाव प्रचार होगा. वहीं बुलो मंडल ने कहा कि वे घर-घर घूमकर जनसंपर्क अभियान में लगे हैं, तो बात करने के लिए उनके साथ घूमना पड़ेगा.

पीएम नरेंद्र मोदी की 11 अप्रैल को भागलपुर में रैली हो चुकी है. जिसमें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और लोजपा अध्यक्ष रामविलास पासवान भी मौजूद थे.

मोदी ने मंच से कहा था, "आज तीर पर बटन दबाइएगा तो वोट सीधा मोदी को जाएगा."

हांलाकि विपक्ष मोदी के प्रचार के इस स्टाइल पर सवाल खड़े कर रहे हैं. क्योंकि अपने पूरे संबोधन में उन्होंने ने एक बार भी भागलपुर के जदयू उम्मीदवार अजय मंडल का नाम तक नहीं लिया.

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