इलाहाबाद जैसे ‘गढ़’ में कांग्रेस को उम्मीदवार के पड़े लाले?

  • 16 अप्रैल 2019
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इलाहाबाद लोकसभा सीट एक समय तक न सिर्फ़ कांग्रेस पार्टी का गढ़ समझी जाती थी बल्कि यह शहर कांग्रेस पार्टी के इतिहास से भी न सिर्फ़ गहरे संबंध रखता है, बल्कि कई दिग्गज नेताओं की कर्मभूमि भी रही है.

इस सीट पर अब तक हुए 15 लोकसभा के आम चुनाव और 2 उपचुनाव में कांग्रेस पार्टी ने सबसे ज़्यादा यानी सात बार जीत दर्ज की है, लेकिन अब स्थिति यह है कि पार्टी को स्थानीय स्तर पर कोई ऐसा नेता नहीं मिल रहा है जिसे लोकसभा चुनाव में पार्टी का उम्मीदवार बनाया जा सके.

भारतीय जनता पार्टी ने इलाहाबाद से जिन रीता बहुगुणा जोशी को उम्मीदवार बनाया है वो दो साल पहले विधानसभा चुनाव के ठीक पहले कांग्रेस पार्टी का प्रचार करते-करते अचानक एक दिन बीजेपी में शामिल हो गई थीं. बीजेपी ने उन्हें लखनऊ में उसी सीट पर विधानसभा का टिकट दे दिया जिस पर वो पिछला चुनाव कांग्रेस पार्टी के टिकट पर जीत चुकी थीं. रीता जोशी कांग्रेस में तमाम बड़े पदों पर रहने के साथ ही प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं.

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फ़िलहाल वो उत्तर प्रदेश में कैबिनेट मंत्री हैं और इलाहाबाद की ही रहने वाली हैं. इलाहाबाद से उम्मीदवार बनने के बाद जब वो पहली बार अपने शहर पहुंचीं तो कांग्रेस पार्टी में लोग एक-दूसरे को आशंका भरी निग़ाहों से देखने लगे कि कौन रीता जोशी के संपर्क में है और कौन कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में जा सकता है. ऐसा इसलिए क्योंकि जानकारों के मुताबिक़ कांग्रेस पार्टी की ज़िला इकाई में अभी लगभग वही कार्यकारिणी काम कर रही है जिसे रीता जोशी ने बनाया था.

वहीं दूसरी ओर, कांग्रेस पार्टी अब तक इस सीट पर किसी उम्मीदवार का नाम नहीं तय कर पाई है. हालांकि ज़िला इकाई ने कई नाम भेजे ज़रूर हैं लेकिन अभी अंतिम फ़ैसला किसी भी नाम पर नहीं लिया जा सका है. कांग्रेस प्रवक्ता द्विजेंद्र त्रिपाठी कहते हैं, "नाम घोषित हो जाएगा, ऐसी कोई बड़ी बात नहीं है. अभी कई सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा बाक़ी है और इलाहाबाद में तो अभी सपा-बसपा गठबंधन ने भी उम्मीदवार नहीं घोषित किया है."

द्विजेंद्र त्रिपाठी इसे भले ही सामान्य मामला बता रहे हों लेकिन इलाहाबाद शहर के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर ख़ासी मायूसी है. स्थानीय कार्यकर्ता इस वजह से भी काफ़ी 'हताश' महसूस कर रहे हैं क्योंकि रीता बहुगुणा जोशी, बीजेपी उम्मीदवार के तौर पर लगातार और युद्ध स्तर पर प्रचार कार्य में लगी हैं.

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बताया जा रहा है कि पार्टी ने कुछ स्थानीय नेताओं से लेकर कई बड़े नामों पर भी विचार किया है लेकिन अभी तक कोई रुझान स्पष्ट तौर पर नहीं आ सका है. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का कहना था कि इलाहाबाद सीट से किसी 'आयातित उम्मीदवार' पर भी दांव लगाया जा सकता है.

दरअसल, इलाहाबाद में कांग्रेस पार्टी की स्थिति इस समय बेहद दिलचस्प है. पार्टी में बहुगुणा परिवार यानी रीता बहुगुणा जोशी और अशोक वाजपेयी कभी एक-दूसरे के धुर विरोधी माने जाते थे. लेकिन आज दोनों ही लोग कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो चुके हैं. 2014 में कांग्रेस पार्टी से इसी सीट से चुनाव लड़ने वाले नंद गोपाल नंदी भी इस समय राज्य में कैबिनेट मंत्री हैं.

रीता जोशी के पिता हेमवती नंदन बहुगुणा केंद्रीय मंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री रह चुके हैं जबकि अशोक वाजपेयी की मां राजेंद्र कुमारी वाजपेयी भी केंद्रीय मंत्री और उपराज्यपाल रह चुकी हैं.

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Image caption हेमवती नंदन बहुगुणा

स्थानीय पत्रकार अखिलेश मिश्र कहते हैं, "कांग्रेस में चुनाव लड़ने के लिए नेता की कमी नहीं है लेकिन हां, कार्यकर्ता की कमी ज़रूर है. पिछले कई चुनाव से कांग्रेस दूसरे नंबर पर भी नहीं रही या यों कहें कि मुक़ाबले में ही नहीं रही. ऐसे में कांग्रेस पार्टी इलाहाबाद में पुराने जुड़ाव और आनंद भवन के चलते सक्रिय ज़रूर दिखती है लेकिन ज़मीन पर उसके लोग न के बराबर हैं. रही सही कसर रीता बहुगुणा जैसे उन नेताओं ने पूरी कर दी जो हाल ही में पार्टी छोड़कर बीजेपी में चले गए."

इलाहाबाद सीट पर कांग्रेस पार्टी बीस साल पहले मतों का आंकड़ा एक लाख से ऊपर कर पाई थी और उस समय पार्टी की उम्मीदवार रीता बहुगुणा जोशी ही थीं. उसके बाद कांग्रेस पार्टी को इस सीट पर पचास हज़ार वोट पाने के भी लाले पड़ गए. ऐसी चर्चाएं पिछले दिनों काफ़ी गरम थीं कि प्रियंका गांधी को पार्टी इसी सीट से चुनाव लड़ा सकती है लेकिन फ़िलहाल इसकी संभावना कम ही नज़र आ रही है.

हालांकि लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र कहते हैं कि इस चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने जिस तरीक़े से टिकटों का बँटवारा किया है उसे देखते हुए लगता है कि वो यहां से किसी हाईप्रोफ़ाइल उम्मीदवार को टिकट दे सकती है. उनके मुताबिक़, "पार्टी के सामने चुनौती सिर्फ़ बीजेपी ही नहीं बल्कि रीता बहुगुणा भी हैं. इसलिए आसानी से और आसान उम्मीदवार कांग्रेस यहां से उतारेगी, ऐसा लगता नहीं है."

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इलाहाबाद में कांग्रेस पार्टी ने आख़िरी चुनाव 1984 में जीता था जब अमिताभ बच्चन ने लोकदल उम्मीदवार और रीता बहुगुणा जोशी के पिता हेमवती नंदन बहुगुणा को हराया था. बहुगुणा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके थे, कभी कांग्रेस के क़द्दावर नेता माने जाते थे लेकिन बाद में उन्होंने पार्टी छोड़ दी थी.

दिलचस्प बात ये है कि 1989 का चुनाव उनकी पत्नी और रीता बहुगुणा की मां कमला बहुगुणा ने कांग्रेस पार्टी से लड़ा लेकिन वो जनता दल उम्मीदवार जनेश्वर मिश्र से हार गईं.

हालांकि रीता बहुगुणा जोशी की चुनौती भी इतनी आसान नहीं है जितनी कि समझी जा रही है. जानकारों के मुताबिक़ यदि कांग्रेस पार्टी की ओर से कोई मज़बूत उम्मीदवार मैदान में आ गया और गठबंधन ने भी ऐसा ही उम्मीदवार उतार दिया तो रीता जोशी का चुनाव जीतना मुश्किल हो सकता है. प्रियंका गांधी की इलाहाबाद से ही जलमार्ग के ज़रिए चुनावी अभियान शुरू करने को भी इसी लिहाज़ से देखा जा रहा है.

इलाहाबाद में कांग्रेस पार्टी के उपाध्यक्ष रहे अभय अवस्थी कहते हैं, "यह ठीक है कि कांग्रेस के तमाम लोगों ने इलाहाबाद में रीता जी के साथ काम किया है लेकिन ऐसा नहीं है कि वो सब उनके साथ बीजेपी में चले गए हैं या चले जाएंगे. रीता जी ख़ुद कई बार पार्टी बदल चुकी हैं और अभी जिस पार्टी में हैं, उसी में उनका काफ़ी विरोध हो रहा है. कांग्रेस पार्टी के पास उम्मीदवारों की कमी नहीं है लेकिन घोषणा में देरी ज़रूर हो रही है. लेकिन अभी तक तो गठबंधन ने भी नहीं उम्मीदवार उतारा है तो फिर कांग्रेस को ही क्यों कहा जा रहा है कि वो देर कर रही है."

Image caption इलाहाबाद यूनिवर्सिटी

कांग्रेस पार्टी के एक वरिष्ठ नेता नाम न बताने की शर्त कहते हैं कि रीता के मुक़ाबले उनके भाई शेखर बहुगुणा को भी इलाहाबाद से उतारा जा सकता है. शेखर बहुगुणा कांग्रेस पार्टी की प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्य हैं, वरिष्ठ नेता हैं, कई बार विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं लेकिन कभी जीते नहीं हैं. लेकिन इस बात को लेकर इलाहाबाद के कांग्रेसियों में कोई उत्साह नहीं है क्योंकि उनकी नज़र में शेखर बहुगुणा रीता जोशी के बड़े भाई ज़रूर हैं लेकिन उनका राजनीतिक क़द उतना बड़ा नहीं है कि वो रीता जोशी को चुनौती दे सकें.

इलाहाबाद सीट का इतिहास न सिर्फ़ कांग्रेस पार्टी के लिहाज़ से बल्कि हाईप्रोफ़ाइल उम्मीदवारों की वजह से भी काफ़ी अहम रहा है. इस सीट से दो प्रधानमंत्री- लाल बहादुर शास्त्री और वीपी सिंह भी चुनाव लड़ चुके हैं जबकि दो पूर्व मुख्यमंत्री- वीपी सिंह और हेमवती नंदन बहुगुणा भी यहां का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं.

इस सीट पर कांग्रेस पार्टी 1952 से लेकर 1971 तक लगातार जीतती रही लेकिन 1977 में भारतीय लोकदल के उम्मीदवार जनेश्वर मिश्र ने कांग्रेस उम्मीदवार वीपी सिंह को हराकर इस सिलसिले को तोड़ दिया.

बीजेपी यहां से चार बार जीत चुकी है. 1996 से लेकर 1999 तक लगातार तीन बार बीजेपी के मुरली मनोहर जोशी ने यहां से जीत दर्ज की जबकि 2014 में इलाहाबाद से बीजेपी के टिकट पर लोकसभा पहुंचने वाले श्यामा चरण गुप्त 2019 में बांदा से समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं.

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