ओडिशा में अचानक क्यों बिखर गई कांग्रेस?

  • 16 अप्रैल 2019
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ओडिशा में इस समय कांग्रेस की स्थिति लम्बी रेस के उस धावक की तरह है जो पहले कुछ चरण तो तेज़ी से दौड़ता है लेकिन अंतिम चरण शुरू होते ही हांफ़ने लगता है.

पिछले दिसम्बर की ही बात है. एक साथ राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव में पार्टी की जीत के बाद ओडिशा में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के हौसले बुलंद थे.

वर्षों से सोया हुआ पार्टी का संगठन हरकत में आता हुआ नज़र आ रहा था. पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए श्रीकांत जेना के पार्टी से निकाले जाने के बाद गुटबाज़ी भी काफ़ी कम हो गई थी.

राहुल गांधी ने जनवरी से मार्च के बीच ओडिशा के चार दौरे किए और हर बार लगा कि उनकी बातों और वादों का लोगों पर असर पड़ रहा है, ख़ासकर पश्चिम और दक्षिण ओडिशा के किसानों पर.

पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार आते ही किसानों के कर्ज़ माफ़ करने और धान के सहायक मूल्य पर 750 रुपये बोनस देने के बाद ओडिशा के किसानों को विश्वास हो रहा था कि राहुल के वादे यहां भी लागू होंगे.

सत्तारूढ़ बीजू जनता दल और बीजेपी के बीच अंदरूनी सांठ-गांठ की चर्चा के बीच कांग्रेस ही ऐसी पार्टी प्रतीत हो रही थी जो दोनों को चुनौती दे सकती है.

Image caption नवीन पटनायक

भाई-भतीजावाद

लेकिन जैसे ही टिकट के बंटवारे की प्रक्रिया शुरू हुई, अचानक कांग्रेस बिखरती हुई नज़र आई. एक समय अगस्त, 2018 तक 50% प्रत्याशियों के नामों की घोषणा कर देने के दावे करने वाली कांग्रेस आख़िरी वक़्त तक अपनी सूची तैयार नहीं कर पाई.

नौबत यहां तक आई कि नामांकन भरने के आख़िरी दिन भी टिकट न मिल पाने के कारण एक प्रत्याशी को निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में अपना पर्चा भरना पड़ा.

यही नहीं, 'एक परिवार, एक टिकट' नीति को ताक पर रखते हुए कम से कम पांच पिता-पुत्र जोड़ियों को टिकट दिए गए, जिनमें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष निरंजन पटनायक, विधानसभा में विपक्षी नेता नरसिंह मिश्र और पूर्व केंद्रीय मंत्री भक्त चरण दास जैसे पार्टी के शीर्ष नेता और उनके बेटे शामिल थे.

ख़ुद निरंजन दो विधानसभा सीटों, घसीपुरा और भंडारीपोखरी, से लड़ रहे हैं जबकि उनके बेटे नवज्योति बालेश्वर से सांसद प्रत्याशी हैं.

नरसिंह बोलांगीर से विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं और उनके पुत्र समरेन्द्र वहीं से लोकसभा चुनाव.

भक्त चरण कालाहांडी से लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं और उनका बेटे सागर भवानीपाटना से विधानसभा चुनाव के उम्मीदवार हैं.

स्वाभाविक था कि इस भाई-भतीजावाद के ख़िलाफ़ रोष उबल पड़ा. टिकट आवंटन में महिलाओं की उपेक्षा के ख़िलाफ़ महिला कांग्रेस की प्रमुख सुमित्रा जेना कांग्रेस भवन में धरने पर बैठ गईं.

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Image caption ओडिशा कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष निरंजन पटनायक

'ओडिशा कांग्रेस का भी विनाश हो जाएगा'

जब उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई तो उन्होंने पार्टी ही छोड़ दी. अपने इस्तीफ़े की घोषणा करते हुए उन्होंने कहा, "निरंजन पटनायक पार्टी को बर्बाद करने पर तुले हुए हैं. 2013 में उन्हें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाया गया था, वे उसका बदला ले रहे हैं और शकुनी की भूमिका निभा रहे हैं. जिस तरह द्रौपदी के आंसुओं से कौरवों का विनाश हुआ था, उसी तरह ओडिशा कांग्रेस का भी विनाश हो जाएगा."

सेवा दल, किसान सेल और युवा कांग्रेस के प्रमुखों ने भी अपने अपने पदों से इस्तीफ़ा दे दिया. पार्टी में बग़ावत के बारे में निरंजन ने इतना ही कहा, "140 सीटों में से क़रीब 90 में नए चेहरों को टिकट दिए गए हैं. हर सीट के लिए कई उम्मीदवार थे. ऐसे में असंतोष स्वाभाविक है. लेकिन मैं स्पष्ट करना चाहता हूं मेरी सिफ़ारिश पर किसी को टिकट नहीं दिया गया."

अचानक पार्टी छोड़नेवाले नेताओं का मानो तांता लग गया. विधायक, पूर्व सांसद और अन्य वरिष्ठ नेता दल छोड़कर जाने लगे. इनमें कुछ प्रमुख नाम थे- झारसुगुडा के विधायक नव दास, सुंदरगढ़ विधायक योगेश सिंह और सालेपुर विधायक प्रकाश बेहेरा.

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मुक़ाबला बीजेडी बनाम बीजेपी, कांग्रेस बस दूर से देखेगी

टिकट मिलने के बाद भी जगतसिंहपुर के पूर्व सांसद, पिपली के पूर्व विधायक युधिष्ठिर सामन्तराय और पूर्व मुख्यमंत्री जानकी बल्लभ पटनायक के पुत्र पृथ्वी बल्लभ समेत कम से कम पांच प्रत्याशियों ने चुनाव लड़ने से मना कर दिया.

कांग्रेस पर मंडरा रहे विश्वास के संकट का इस बात से भी पता चला कि टिकट न मिलने से कई बीजेडी और बीजेपी नेताओं ने पार्टी छोड़ी, लेकिन उनमें से किसी ने भी कांग्रेस की ओर रुख़ नहीं किया.

बीजेडी छोड़ने वाले बीजेपी में चले गए और बीजेपी छोड़ने वाले बीजेडी में.

नेताओं के बीच फैल रहे इस असंतोष का ज़मीनी स्तर के कार्यकर्ताओं के मनोबल पर भी ख़ूब पड़ा. कुछ ही हफ़्तों में कांग्रेस लगभग पूरी तरह से बिखर गई.

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक आशुतोष मिश्र कहते हैं, "एक समय था जब लग रहा था कि इस बार सचमुच त्रिकोणीय मुक़ाबला होगा. लेकिन अब कांग्रेस दयनीय स्थिति में आ गई है. अब यह स्पष्ट है कि ओडिशा में मुक़ाबला बीजेडी और बीजेपी के बीच होगा और कांग्रेस बस दूर से तमाशा देखेगी. एक आध सीटों पर- जैसे नबरंगपुर- में पार्टी अब भी जीत सकती है लेकिन वो भी सिर्फ़ इसलिए कि वहां पार्टी का उम्मीदवार अच्छा है."

हालांकि कांग्रेस ऐसी किसी सम्भावना से साफ़ इनकार कर रही है.

पार्टी के उपाध्यक्ष और प्रवक्ता जग्येंश्वर बाबू ने बीबीसी से कहा, "बीजेडी और बीजेपी के पास काले धन का पहाड़ है. इसलिए उनके पास तामझाम अधिक है. लेकिन चुप्पी बहुत कुछ कह जाती है. लोग सब देख रहे हैं और समझ रहे हैं. उन्हें पता है कि कौन उनके हितों की सुरक्षा कर सकता है. वैसे भी बीजेडी और बीजेपी एक दूसरे के नेता छीन रहे हैं और वोट काट रहे हैं. कांग्रेस का वोट जैसा का तैसा है."

बाबू के इस बयान को आप अतिशयोक्ति कहें या फिर सच्चाई से मुंह मोड़ लेना, लेकिन हालात देखकर इस समय इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि कांग्रेस ओडिशा में मेडल के लिए नहीं बल्कि रेस पूरी करने के लिए दौड़ रही है.

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