तमिलनाडु: जहाँ वोट खरीदने के लिए हैं तमाम जुगाड़

  • 16 अप्रैल 2019
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तमिलनाडु के वेल्लोर लोकसभा क्षेत्र से नकदी बरामद होने के बाद यहां मतदान रद्द कर दिया है. चुनाव आयोग ने इस संबंध में राष्ट्रपति को सिफ़ारिश भेजी थी, जिसकी मंज़ूरी मिलने के बाद बाद चुनाव आयोग से यह फैसला आया है.

दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु ने विभिन्न क्षेत्रों में शानदार काम करके मिसाल पैदा की है. भोजन से लेकर सामाजिक कल्याण की योजनाओं, संगीत, फ़िल्म तकनीक और उत्पादन तक में वह अग्रणी रहा है.

लेकिन मतदाताओं को रिश्वत लेकर लुभाने के मामले में नए आयाम स्थापित करने को लेकर भी इसकी छवि बेहद ख़राब है.

ऐसा नहीं कि भारत के अन्य राज्यों में मतदाताओं को पैसे या अन्य रूपों में रिश्वत नहीं दी जाती. कई उम्मीदवार पोलिंग स्टेशन तक लाने-ले जाने, खाने के पैकेट बांटने या फिर मैरिज हॉल में दावत का इंतज़ाम करने और कुछ रकम नकद देने जैसे काम करते रहे हैं.

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएस कृष्णमूर्ति ने बीबीसी हिंदी को बताया, "यह सब किया जाता रहा है मगर बड़ी ही चालाकी से. उस तरह से नहीं, जैसे तमिलनाडु में बड़े ही पेशेवर और व्यवस्थित ढंग से किया जाता है."

कृष्णमूर्ति ने कहा, "अब पूरे देश में ऐसा ही देखने को मिलता है. यह ट्रेंड आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और बिहार तक फैल गया है जहां पर बर्तन, साड़ियां और कपड़े आदि दिए जाते हैं. हां, पंजाब और हरियाणा अलग हैं जहां पर शराब चलती है.''

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ऐसे शुरू हुआ सिलसिला

तमिलनाडु में वोटरों को ललचाने का सिलसिला दस्तावेज़ों में भी हुआ और व्यावहारिक ढंग से भी.

अगर द्रविड़ पार्टियों डीएमके और एआईडीएमके में से कोई पार्टी अपने घोषणापत्र में टीवी सेट (2006) मुफ़्त में देने का वादा करती तो दूसरी पार्टी मिक्सर, ग्राइंडर और यहां तक कि बकरियां (2011) देने का वादा करके टक्कर देने की कोशिश करती.

अगर एक पार्टी ने स्कूली बच्चों को मिड डे मील में मिलने वाले अंडों की संख्या प्रति सप्ताह एक से बढ़ाकर दो करने का वादा किया तो दूसरी ने इसे तीन कर देने का वादा कर दिया.

समाज कल्याणा वाली योजनाओं से शुरू हुई यह होड़ मतदाताओं को अन्य तरीकों से रिश्वत देकर लुभाने में तब्दील हो गई.

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तमिलनाडु के पूर्व मुख्य निर्वाचन अधिकारी नरेश गुप्ता ने कहा, "कुछ स्थानों पर टोकन देने की परंपरा शुरू हुई जिन्हें लोग चुनाव के दौरान दुकानों में ले जाते और बदले में उन्हें घरेलू साज़ो-सामान मिल जाता. अगर सख़्ती बढ़ जाती तो चुनाव के बाद भी उन्हें टोकन पर सामान मिल जाता."

अनोखा तरीका

इसके बाद एक ऐसा फ़ॉर्मूला अस्तित्व में आया, जिसे कृष्णमूर्ति "पेशेवर और सुनियोजित तरीका" कहते हैं. यह फ़ॉर्मूला तिरुमंगलम विधानसभा सीट से निकला जहां पूर्व डीएमके प्रमुख एम. करुणनिधि के बेटे एम.के. अझागिरी प्रभारी थे.

मतदाता उस समय हैरान रह गए जब सुबह उनके दरवाज़े पर गिरे अख़बार में न सिर्फ़ समाचार और विज्ञापन वाले पर्चे थे, बल्कि नोटों वाला एक लिफ़ाफ़ा भी था. नोटों को मतदाताओं तक पहुंचाने का यह काम एक कई हिस्सों में बांटे गए बहुत ही व्यवस्थित सिस्टम के तहत किया गया था.

इसमें यह सुनिश्चित किया गया कि निगरानी रख रहे चुनाव अधिकारियों को भनक तक न लग सकी क्योंकि पैसे को बूथ स्तर पर ऐसे माध्यम से डिलीवर किया गया (अख़बार वाले) जिसके बारे में कोई सोच नहीं सकता था. जबकि इससे पहले पैसा देने का काम एक या दो शख़्स करते थे या फिर समूहों में यह काम किया जाता था.

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नरेश गुप्ता बताते हैं कि इससे पहले कई बार पैसा गाड़ियों में ले जाकर बांटा जाता था. मगर फिर समय बदल गया. गुप्ता कहते हैं, "पुलिस के लिए हर जगह हर चीज़ की जांच करना संभव नहीं था. पैसे बांटने का खेल तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश (आज के तेलंगाना वाले हिस्से समेत) और कर्नाटक में प्रमुखता से चल रहा था."

नए-नए प्रयोग

2013 में चुनाव अधिकारी यह देखकर हैरान रह गए जिन इलाक़ों में सब्ज़ियां उगती हैं, वहां पर बाहर से सब्ज़ियों से भरी गाड़ियां कुछ ज़्यादा ही आ रही हैं जबकि होना इसका उल्टा चाहिए था.

नाम गुप्त रखने की शर्त पर एक अधिकारी ने बताया, "हम यह जानकर परेशान हो गए गए सब्ज़ियों की टोकरियों के नीचे प्लास्टिक के थैले थे जिनमें बड़े ही करीने से नोटों के बंडल रखे गए थे."

पांच साल पहले मैंने ख़ुद कर्नाटक के बेल्लारी में देखा था कि मदताताओं को पोलिंग बूथ के पास जो वोटर पर्चियां दी जा रही थीं, उनके नीचे सिगरेट की तरह रोल किया गया लाल रंग का नोट था. इस चुनाव को "वोट के लिए लाल नोट" वाला चुनाव नाम दिया गया था.बेल्लारी वही इलाक़ा है जो अवैध लौह अयस्क की खदानों के मामले के लिए बदनाम है.

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इसी चुनाव में मौजूदा सरकार में वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री की जनसभा के लिए जिन लोगों को लाया गया था, वे ट्रकों से उतरे और सीधे एक शराब की दुकान में गए. वहां उन्होंने हस्ताक्षर वाली एक छोटी सी पर्ची दुकान में दी.

पर्ची लेते ही दुकान वाला तुरंत शराब का एक पव्वा, ख़ाली गिलास और पानी का मग काउंटर पर रख देता. पर्ची देने वाला वहीं खड़ा होकर शराब पीता और निकल जाता.

बदल गया है तरीक़ा

अब वे दिन चले गए जब उम्मीदवारों के नुमाइंदे रात के सन्नाटे में झुग्गियों वाले इलाक़ों में शराब के पव्वे बांटा करते थे. कर्नाटक के एक पूर्व राजस्व मंत्री ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "हाल के सालों में रिश्वत देने की प्रक्रिया में नाटकीय ढंग से बदलाव आया है."

हैदराबाद में रहने वाले विश्लेषक तंकसाला अशोककहते हैं, "एक बार चुनाव आयोग ने ख़ुद कहा था कि वोटों के लिए पैसे खर्च करने का सबसे ज़्यादा चलन आंध्र प्रदेश में है. एन टी रामा राव के निधन के बाद धन बल का चलन और ज़्यादा देखने को मिला क्योंकि वह अपनी करिश्मे के दम पर सत्ता में आए थे. इसके बाद वोटों को लुभाने के लिए रिश्वत देने के कई तरीके तलाश लिए गए हैं."

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लेकिन तिरुमंगलम वाला फ़ॉर्मूला तमिलनाडु में आम चलन बन गया. मगर 2016 में अरवाकुरिची और तंजावुर विधानसभा सीटों पर हुए मतदान को 2016 में मतदाताओं को तोहफ़े और पैसे बांटने के कारण रद्द कर दिया गया था.

एक साल बाद चुनाव आयोग ने आरके नगर क्षेत्र में बेतहाशा पैसा बंटने और एक कैबिनेट मंत्री व उनके सहयोगियों के पास इनकम टैक्स विभाग के छापे में संदिग्ध दस्वावेज़ मिलने पर उपचुनाव को रद्द कर दिया था. यह उपचुनाव उस समय मुख्यमंत्री रहीं जे जयललिता के निधन से सीट खाली होने पर हो रहा था.

गुप्ता ने कहा कि इन सब घटनाओं के कारण ऐसी स्थिति पैदा हो गई है जहां "लोगों ने पैसों की मांग करना शुरू कर दिया है और अभी भी यह सिलसिला जारी है."

राहत की एकमात्र बात यह है कि मतदाताओं ने पैसे मांगे, सभी राजनीतिक पक्षों से पैसे स्वीकार भी किए मगर वोट अपनी पसंद के उम्मीदवार को ही दिए.

नरेश गुप्ता ने कहा, "हमने देखा कि कुछ राज्यों में राजनीतिक दल हर पांच सालों में दूसी पार्टी द्वारा सत्ता से हटा दिए जाते हैं. राजस्थान और केरल इसके उदाहरण हैं."

मगर कृष्णमूर्ति एक मज़ेदार बात कहते हैं, "चुनाव आयोग कितने चुनाव रद्द कर सकता है? यह तो राष्ट्रीय बीमारी है जिसपर कठोर क़दम उठाना चाहिए क्योंकि देश के लोकतंत्र के भविष्य के लिए यह चिंता की बात है."

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