लोकसभा चुनाव 2019: क्या दिग्विजय सिंह को प्रज्ञा ठाकुर हरा पाएंगी- नज़रिया

  • 18 अप्रैल 2019
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मालेगांव ब्लास्ट की अभियुक्त साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को बीजेपी ने भोपाल से उम्मीदवार बनाया है. वो कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को चुनौती देंगी.

भोपाल लगातार भारतीय जनता पार्टी का गढ़ रहा है और बीजेपी से पहले ये जनसंघ का गढ़ था.

कुल मिलाकर यहां से कांग्रेस के केवल चुनिंदा प्रत्याशी जीते हैं. एक बार पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा और आख़िरी बार केएन प्रधान चुनाव जीते थे.

इस बात को भी तीन दशक हो गए हैं. इसलिए बीजेपी अपने गढ़ को इतनी आसानी से तो नहीं खोना चाहेगी.

यही कारण है कि बीजेपी ने साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को भोपाल से मैदान में उतारने का फ़ैसला किया.

बहुत अच्छा रिकॉर्ड न होने के बावजूद कांग्रेस ने एक सरप्राइज़ कैंडिडेट के रूप में दिग्विजय सिंह को यहां से अपना उम्मीदवार बना दिया.

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने पत्रकारों के साथ एक साधारण सी बातचीत के दौरान दिग्विजय सिंह के नाम की घोषणा कर दी थी.

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बीजेपी के दिग्गज नहीं लड़ना चाहते थे

ये घोषणा अचानक हुई थी, हालांकि इससे पहले ऐसी चर्चाएं हो रही थीं कि दिग्गज नेताओं को कठिन सीटों से लड़ना चाहिए.

यानी इसकी भूमिका तो पहले से बनाई जा रही थी. अब दिग्विजय का नाम घोषित हुए क़रीब 25 दिन बीत चुके हैं.

किसी भी चुनावी राजनीति में इतना समय किसी प्रत्याशी को स्वाभाविक रूप से बढ़त दे देता है.

दूसरी तरफ़ बीजेपी आजीब से असमंजस में फंसी हुई थी क्योंकि सारे दिग्गज नेता एक दूसरे पर ठीकरा फोड़ना चाहते थे.

इसमें शिवराज सिंह, उमा भारती, वर्तमान सांसद आलोक संजर, महापौर आलोक शर्मा और केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर तक के नाम आगे आए.

लेकिन इन सबके बावजूद ऐसा लगा कि कोई भी दिग्विजय सिंह के सामने आना नहीं चाहता था.

क्योंकि चुनाव के समय ध्रुवीकरण की जो स्थिति बनेगी उसमें यहां के क़रीब 5 लाख 10 हज़ार मुसलमान एक बड़ा फैक्टर साबित होंगे और ऐसे में कोई जोख़िम उठाना नहीं चाहता था.

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30 साल से कांग्रेस नहीं जीती है

इसके अलावा अभी बीते नवंबर में ही कांग्रेस की सरकार बनी है और भोपाल से जीते हुए दो विधायक कमलनाथ के मंत्रिमंडल में शामिल हैं.

ऐसे में बीजेपी के पास इस चुनाव को साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण करने के सिवाय कोई चारा नहीं बचा था.

हालांकि भोपाल दिग्विजय सिंह की परंपरागत सीट कभी नहीं रही. वो हमेशा राजगढ़ से लड़ते थे.

वहां से वो सांसद रहे, उनके भाई सांसद रहे. एक बार जब उनके सगे भाई लक्ष्मण सिंह बीजेपी में शामिल हो गए तो उन्होंने अपने कैंडिडेट से उन्हें हरवा दिया था.

अगर सही कहा जाए तो भोपाल बीजेपी के लिए सुरक्षित सीट रही है और पिछले 30 साल से कांग्रेस ने यहां जीत का मुंह नहीं देखा है.

ऐसे में अगर कहा जाए तो असल में दिग्विजय सिंह ने जोख़िम लिया है. लेकिन इस चुनाव में सिर्फ़ धार्मिक ही नहीं जातीय गणित का भी बहुत असर दिखेगा.

उदाहरण के लिए बीजेपी के वर्तमान सांसद आलोक संजर कायस्थ हैं और भोपाल मे कायस्थों की अच्छी ख़ासी संख्या है.

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कायस्थ वोटों पर दांव

इससे पहले मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव सुशील चंद्र वर्मा चार बार सांसद रहे, वो भी कायस्थ थे.

उनका ज़मीनी राजनीति से कोई नाता नहीं था न वो पार्टी कार्यकर्ता थे. नौकरी के बाद बीजेपी ने उन्हें टिकट दे दिया और वो लगातार चार बार सांसद रहे.

उन्हें सबसे निष्क्रिय सांसद कहा जाता है क्योंकि जीतने के बाद वो कभी क्षेत्र में जाते ही नहीं थे.

इन कायस्थ वोटों को अपनी ओर आकर्षित करने की अब दिग्विजय सिंह भरपूर कोशिश कर रहे हैं.

अभी कुछ दिन पहले ही भोपाल में कायस्थों के एक कार्यक्रम में दिग्विजय सिंह पहुंचे और बड़े ही साफ़ शब्दों में कहा कि "अगर आपके समाज के आलोक संजर को टिकट मिलता है तो मुझे बेशक वोट मत दीजिए. लेकिन अगर उन्हें टिकट नहीं मिलता है तो फिर आपका वोट मुझे मिलना चाहिए."

जब ये बात दिग्विजय सिंह कह रहे थे तो उनके दिमाग़ में कायस्थ वोटरों की बात ज़रूर रही होगी.

दिग्विजय सिंह के गुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती भोपाल में डेरा डाले हुए हैं और उनके पक्ष में प्रेस कांफ्रेंस कर रहे हैं.

दिग्विजय सिंह भोपाल के हर मंदिर में मत्था टेकने जा रहे हैं. उनके हर प्रचार अभियान ये कहीं न कहीं शामिल रहता है.

ऐसे में भोपाल की लड़ाई 'सॉफ़्ट हिंदुत्व बनाम हार्ड हिंदुत्व' की हो गई लगती है.

साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को अचानक पार्टी में शामिल करना और उसके कुछ घंटे बाद ही प्रत्याशी बनाने से यही संदेश जाता है.

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चुनाव में ध्रुवीकरण

प्रज्ञा ठाकुर ने भी टिकट की घोषणा होते ही कहा कि 'ये धर्म युद्ध है और दिग्विजय सिंह मेरे मुक़ाबले में कहीं नहीं हैं.'

एक और फैक्टर है जो दिग्विजय सिंह के पक्ष में जाता हुआ दिखता है, वो है आदिवासी समुदाय का रुझान.

पिछले विधानसभा चुनाव से ऐसा लगा कि जो आदिवासी परम्परागत वोटर कांग्रेस से दूर छिटक गया था, वो फिर उसकी तरफ़ लौट रहा है.

भोपाल के ग्रामीण इलाक़ों में गोंड आदिवासी बहुल आबादी है और उनका रुझान भी मायने रखता है.

लेकिन यहां निर्णायक वोटर मुसलमान और कायस्थ ही हैं. कायस्थ वोटर यहां दो से ढाई लाख के बीच हैं.

भोपाल के वोटरों का मिजाज़ तो भाजपा और संघ की ओर झुका हुआ पहले से है, इसलिए दिग्विजय सिंह के लिए ये चुनाव पहले भी आसान नहीं था.

लेकिन जिस तरह से बीजेपी साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को लेकर आई, उससे लगता है कि उसका इरादा इस चुनाव को हिंदू-मुस्लिम करा देने का है.

अब इस लड़ाई में कितना बीजेपी कामयाब होती है या कांग्रेस कामयाब होती है ये भी आगे आने वाले समय में साफ़ हो जाएगा.

लेकिन चुनाव प्रचार में दिग्विजय सिंह अपनी बढ़त बना चुके हैं अब वो अपने प्रचार अभियान के दूसरे राउंड के लिए निकल चुके हैं.

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