देवानंद से उर्मिला तक: कहानी पूरी फ़िल्मी है

  • 23 अप्रैल 2019
राजेश खन्ना

40 साल पहले…14 सितम्बर, 1979 का दिन था.

उस वक़्त के बंबई में ताजमहल होटल में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस हुई. वो इंदिरा गांधी की लगाई इमरजेंसी के बाद वाला दौर था जब जनता पार्टी का प्रयोग भी विफल हो चुका था.

दोनों पक्षों से नाराज़ कुछ लोगों ने मिलकर नए राजनीतिक दल 'नेशनल पार्टी' बनाने की घोषणा की. इस पार्टी के अध्यक्ष थे देव आनंद.

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Image caption देवानंद ने बनाई नेशनल पार्टी

पार्टी के 16 पन्नों वाले घोषणा पत्र में कहा गया, "इंदिरा की तानाशाही से त्रस्त लोगों ने जनता पार्टी को चुना, लेकिन निराशा हाथ लगी. अब यह दल भी टूट चुका है. ज़रूरत है, एक स्थायी सरकार दे सकने वाली पार्टी की, जो थर्ड आल्टरनेटिव दे सके. नेशनल पार्टी वह मंच है जहां समान विचार वाले लोग साथ आ सकते हैं."

इस पार्टी में वी शांताराम, विजय आनंद, आईएस जौहर, जीपी सिप्पी समेत कई फ़िल्मी हस्तियां जुड़ गईं. पार्टी ने लोकसभा चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया, रैलियां शुरूं हो गईं, भीड़ जुटने लगी. लेकिन धीरे-धीरे ये बात फैलने लगी कि फ़िल्म उद्योग के लोगों को इसका नुक़सान बाद में उठाना पड़ेगा.

एक-एक कर ज़्यादातर लोगों ने साथ छोड़ दिया. इस तरह देव आनंद का राजनीतिक सपना और पार्टी दोनों ख़त्म हो गई. लेकिन फ़िल्मी हस्तियों और राजनीति का ये पहला और आख़िरी मेल नहीं था. आज़ादी के पहले से ही कलाकारों का भारतीय राजनीति से नाता रहा है.

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Image caption सुनील दत्त और नरगिस

इंदिरा गांधी की हत्या और राजनीति में सितारे

80 के दशक में ही एक ऐसी राजनीतिक घटना हुई, जिसने फ़िल्मी दुनिया को भी प्रभावित किया. वो थी अक्टूबर, 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या. दिसंबर 1984 में चुनाव होने थे. राजीव गांधी ने अपने दोस्त और सुपरस्टार अमिताभ बच्चन और सुनील दत्त से चुनाव लड़ने के लिए कहा.

सुनील दत्त 1984 में चुनाव जीत गए और सांसद बनने के बाद 2005 में मरते दम तक कांग्रेस में ही रहे, भले ही पार्टी से उनका मन मुटाव भी हुआ.

जब सुनील दत्त ने चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया तो दिसंबर 1984 में घर में एक तरफ़ बेटी नम्रता दत्त और कुमार गौरव की शादी की तैयारियां चल रही थीं तो दूसरी ओर चुनाव अभियान की.

सुनील दत्त उन चंद हिंदी फ़िल्मी सितारों में से थे जो केंद्र में मंत्री भी बने और बतौर राजनेता उनकी बहुत इज़्ज़त थी. 2004 में पांचवी बार लोकसभा चुनाव जीतने वाले सुनील दत्त को खेल और युवा कल्याण मंत्री बनाया गया.

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जब चुनाव प्रचार में अमिताभ बच्चन को 'नचनिया' कहा गया

1984 में सुपरस्टार अमिताभ बच्चन का इलाहाबाद से हेमवती नंदन बहुगुणा से चुनाव लड़ना उस समय की सबसे बड़ी ख़बर थी.

वरिष्ठ पत्रकार राशिद किदवई अपनी किताब 'नेता अभिनेता' में लिखते हैं, "बहुगुणा क़द्दावर नेता थे. वो चुनाव प्रचार में अमिताभ को 'नौसिखिया', और 'नचनिया' बोलते थे. ये जया बच्चन ही थीं जिन्होंने अमिताभ के प्रचार अभियान में जान फूंकी और चुनाव जितवाया."

लेकिन राजनीति ने ऐसी करवट ली कि बोफ़ोर्स घोटाले में नाम आने के बाद सांसद अमिताभ का राजनीति से मोह भंग हो गया और उन्होंने राजनीति छोड़ दी. साथ ही उनकी गांधी परिवार से दूरी भी बढ़ने लगी. उसके बाद से अमिताभ बच्चन ने कभी सक्रिय राजनीति में हिस्सा नहीं लिया.

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राजेश खन्ना और आडवाणी में कांटे की टक्कर

अमिताभ बच्चन अकेले सुपरस्टार नहीं थी जिन्होंने राजनीति में किस्मत आज़माई. 1991 के चुनाव के समय अमिताभ फ़िल्मों और राजनीति दोनों से दूर हो चुके थे. ये लोकसभा चुनाव कांग्रेस के लिए अहम था.

उस समय राजीव गांधी ने राजेश खन्ना से नई दिल्ली में लालकृष्ण आडवाणी के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए आग्रह किया. ये महज़ संयोग था कि कभी राजेश खन्ना और अमिताभ एक तरह से प्रतिदंद्वी ही थे और बच्चन के बाद कांग्रेस से राजेश खन्ना चुनाव लड़ रहे थे. 1991 के चुनाव में राजेश खन्ना आडवाणी से सिर्फ़ 1,589 वोटों से हारे थे.

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Image caption सोनिया गांधी, राजीव गांधी, राजेश खन्ना

1991 की वो फ़ोटो ख़ासी चर्चित है जिसमें राजीव और सोनिया गांधी दिल्ली में निर्माण भवन चुनावी स्टेशन पर राजेश खन्ना को वोट डालने के लिए खड़े हैं. उनके पीछे राजेश खन्ना भी हैं.

राशिद किदवई अपनी किताब में लिखते हैं कि सार्वजनिक जीवन की ये राजीव गांधी की आख़िरी तस्वीर थी . इसके कुछ घंटों बाद एक आत्मघाती हमले में राजीव गांधी की मौत हो गई और 21 मई को राजेश खन्ना के साथ उनकी ये तस्वीर छपी.

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भाजपा से कांग्रेस तक पहुंचे शत्रुघ्न सिन्हा

जब 1992 में उपचुनाव हुआ तो राजेश खन्ना फिर नई दिल्ली से लड़े. उन्होंने अपने दोस्त और भाजपा में शामिल हो चुके शत्रुघ्न सिन्हा को हराया. शत्रुघ्न सिन्हा उन शुरुआती हिंदी कलाकारों में से थे जिन्होंने कांग्रेस के बजाय किसी विपक्षी दल के ज़रिए राजनीति में कदम रखा.

इमरजेंसी के दौरान वो जेपी से प्रभावित थे. लेकिन 90 के दशक में उन्होंने भाजपा का दामन थामा. राजेश खन्ना से वो लोकसभा चुनाव हार गए लेकिन आडवाणी-वाजपयी के वो काफ़ी करीब थे.

शत्रुघ्न शायद पहले हिंदी फ़िल्मी सितारे थे जो केंद्रीय मंत्री बने (2003-04) और कई बार सांसद भी. हालांकि मोदी शासन के बाद से शत्रु्घ्न अपनी ही पार्टी में अलग-थलग पड़े हुए थे. ये समय का चक्र ही है कि कभी इमरजेंसी का विरोध करने वाले शत्रुघ्न 2019 में कांग्रेस में शामिल हो गए.

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Image caption विनोद खन्ना

विनोद खन्ना: फ़िल्में, संन्यास और संसद

ये भी अजब इत्तेफ़ाक़ है कि हिंदी फ़िल्मों में 70-80 के दशक में साथ काम करने वाले कई सितारे राजनीति में आए. अमिताभ बच्चन और शत्रुघ्न सिन्हा के बाद तो विनोद खन्ना को राजनीति ख़ूब भाई.

80 के दशक में तो वे फ़िल्मों से संन्यास लेकर ओशो के पास चले गए थे. लेकिन पंजाबी परिवार से आने वाले विनोद खन्ना ने 1998 में गुरदासपुर, पंजाब से एक बाहरी होने के बावजूद लोकसभा चुनाव लड़ा.

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Image caption विनोद खन्ना

2009 का चुनाव छोड़ दिया जाए तो अपनी मौत तक वे वहां से सांसद रहे और विदेश राज्य मंत्री भी बने. उनके रहते इलाक़े में कई ब्रिज बने और उन्हें 'सरदार ऑफ ब्रिज' भी कहा जाने लगा.

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राजनीति में 'ड्रीम गर्ल'

जब विनोद खन्ना 1999 में भाजपा से चुनाव लड़ रहे थे तो उन्होंने हेमा मालिनी से उनके लिए प्रचार करने के लिए कहा. हेमा का राजनीति से कोई नाता नहीं था.

उन्होंने शुरुआती उलझन के बाद विनोद खन्ना के लिए प्रचार किया और यहीं से उनका अपना राजनीतिक सफ़र भी शुरु हुआ.

हेमा मालिनी जल्द ही भाजपा में शामिल हुईं और राज्य सभा सदस्य रहीं.

2014 लोकसभा चुनावों में मथुरा से उन्होंने जाट नेता जयंत सिंह को तीन लाख से ज़्यादा वोटों से हरा दिया था. लेकिन उनका कार्यकाल विवादों भरा रहा है. कभी वृंदावन की वृद्ध विधवाओं पर बयान को लेकर तो कभी उनकी कार से हुई दुर्घटना में मारी गई बच्ची पर बयान को लेकर.

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भीड़ में बोलने से डरने वाली जया बनीं नेता

महिला राजनेताओं की बात करें तो फ़िल्मी दुनिया से जया प्रदा ने भी अलग जगह बनाई. हिंदी और तेलुगू फ़िल्मों में जया प्रदा ख़ूब हिट थीं.

पांच फ़िल्मों में जया के हीरो रह चुके एनटीआर के कहने पर वे 1994 में तेलुगू देशम पार्टी में शामिल हो गईं. हालांकि जल्द ही वे पाला बदल चंद्रबाबू नायडू से जा मिलीं.

राजनीति का अनुभव न होने के कारण शुरू-शुरू में उनकी ख़ूब आलोचना भी होती थी. लेकिन धीरे-धीरे वो पार्टी की बड़ी प्रचारक बन गईं. 1996 में जया प्रदा राज्य सभा पहुंची.

उनके करियर में बड़ा मोड़ तब आया जब उन्होंने समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया.

"मुझे मालूम है कि रामपुर वाले बेटी को खाली हाथ नहीं भेजते"...भीड़ में बोलने से डरने वाली जया प्रदा के तेवर रामपुर में बदल चुके थे.

दक्षिण से आई जया प्रदा ने 2004 और 2009 में उत्तर प्रदेश के रामपुर से लगातार दो बार लोकसभा चुनाव जीत सबको हैरत में डाल दिया.

समाजवादी पार्टी में आज़म खान से उनकी हमेशा खटकती रही जिसके बाद वो सपा से अलग हो गईं. 2019 में जया ने भाजपा का दामन थामा है और रामपुर से ही चुनाव लड़ा.

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कांग्रेस की कौरवों से तुलना करने वाले राज बब्बर

समाजवादी पार्टी की बात चली है तो अभिनेता राज बब्बर का ज़िक्र भी ज़रूरी है. राष्ट्रीय नाट्य संस्थान (एनएसडी) के दिनों से ही वो अपने तीख़े तेवरों के लिए जाने जाते थे.

80 के दशक में राज बब्बर और स्मिता पाटिल का रिश्ता परवान चढ़ रहा था. स्मिता के पिता शिवाजीराव पाटिल कांग्रेस से जुड़े हुए थे. किताब 'नेता अभिनेता' में राशिद किदवई लिखते हैं, "1984 में जब सुनील दत्त कांग्रेस की ओर से चुनाव लड़ रहे थे तो शिवाजीराव के साथ बेटी स्मिता और युवा राज बब्बर भी गली-गली जाकर प्रचार करते थे."

हालांकि 1987 में वो वीपी सिंह के साथ हो लिए, जब उन्होंने राजीव गांधी से अलग हो जन मोर्चा का गठन किया. तब राज बब्बर ने कांग्रेस की तुलना कौरवों से की थी. पर जल्द ही राज बब्बर अलग हो सपा में चले गए.

ये बात और है सपा से भी उनकी ज़्यादा नहीं निभी. अंतत में वो उसी कांग्रेस में शामिल हुए जिसके लिए उन्होंने 80 के दशक में प्रचार किया था.

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Image caption पृथ्वीराज कपूर

नाटक से पटेल को विचलित करने वाले पृथ्वीराज कपूर

वैसे संसद की बात करें तो हिंदी फ़िल्मों से सबसे पहले ये सफ़र शायद अभिनेता पृथ्वीराज कपूर ने तय किया,जब 1952 में उन्हें राज्य सभा के लिए नामांकित किया गया.

समुंदरी (पाकिस्तान) में पैदा हुए पृथ्वीराज कपूर राजनीति से अछूते नहीं थे. आज़ादी से पहले तनाव वाले दौर में उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता पर एक दमदार नाटक बनाया था-'दीवार', जिसका मंचन कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सामने किया गया.

मधु जैन अपनी किताब कपूरनामा में लिखती हैं, "इस नाटक को देखने के बाद सरदार पटेल विचलित दिखे और कहा कि इस नाटक ने वो कर दिखाया जो कांग्रेस बरसों में न कर पाई. पटेल आधे घंटे तक बोलते रहे."

पृथ्वीराज कपूर का जवाहर लाल नेहरू से भी गहरा रिश्ता था. कपूरनामा में लिखे एक किस्से के मुताबिक़, "नेहरू ने एक बार पृथ्वीराज से कहा था कि जब तुम मेरे साथ चलते हो तो मेरी हिम्मत बढ़ जाती है."

उन दिनों फ़िल्मों से संसद में आने की वजह से उनकी आलोचना भी हुई लेकिन पृथ्वीराज कपूर संसद में जमकर बोलते थे और दिल्ली के प्रिंसेस पार्क में रहते हुए लोगों से मिलते थे.

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Image caption जवाहर लाल नेहरू के साथ दिलीप कुमार

नेहरू के कहने पर दिलीप कुमार ने किया प्रचार

पृथ्वीराज कपूर ने आवाज़ उठाई तो थिएटर कलाकरों को रेलयात्रा में 75 फ़ीसदी छूट दिलाने में कामयाबी मिली. कपूर ख़ानदान के बेहद करीबी रहे अभिनेता दिलीप कुमार किसी पार्टी का हिस्सा तो नहीं बने लेकिन वो भी नेहरू से बहुत प्रभावित थे.

1962 में नेहरू के कहने पर उन्होंने नार्थ बॉम्बे से वीके कृष्णा मेनन के लिए और जेबी कृपलानी के ख़िलाफ़ चुनाव प्रचार किया. उन्होंने युवा शरद पवार समेत कांग्रेस के कई नेताओं के लिए प्रचार किया था.

राजनीति की बात करें तो हिंदी फ़िल्मों से पहली महिला सांसद बनने का गौरव 1980 में नरगिस को मिला जो दिलीप कुमार के सथ कई फ़िल्मों में काम कर चुकी थी.

उस समय नरगिस फ़िल्में छोड़ समाज सेवा के काम में जुटी थी और इंदिरा गांधी ने उन्हें राज्य सभा में भेजा हालांकि 1981 में उनकी मौत हो गई.

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राजनीति में फ़्लॉप सितारे

राजनीति में विफलता की इबारत लिखने वाले भी कई हैं- मसलन धर्मेंद्र जो बीकानेर से सांसद बने लेकिन बाद में नाराज़ लोगों ने 'हमारा सांसद ग़ुमशुदा है' के पोस्टर लगाए.

फ़िल्मस्टार गोविंदा की राजनीतिक पारी भी फ़्लॉप साबित हुई हालांकि उन्होंने राम नाईक को हराया था.

हिंदी के अलावा दूसरी फ़िल्म इंडस्ट्री से भी फ़िल्मी सितारे राजनीति में आते रहे हैं. जयललिता, एमजीआर, करुणानिधि, एनटीआर...दक्षिण में तो इसका लंबा इतिहास रहा है.

ये कहना ग़लत नहीं होगा कि दक्षिण की राजनीति में फ़िल्मी सितारे ही ज़्यादा चमकते रहे हैं.

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Image caption राहुल गांधी के साथ उर्मिला मातोंडकर

जनता ने सिर-आंखों पर बिठाया, ठेंगा भी दिखाया

हर बार के चुनाव में नई फ़िल्मी हस्तियां राजनीति की ओर खिंची चली आती ही हैं मानो दोनों के बीच कोई ग्रैविटी पुल हो.

2014 में परेश रावल भाजपा में आए थे तो 2019 में उर्मिला मातोंडकर कांग्रेस से चुनावी मैदान में हैं और प्रकाश राज निर्दलीय.

राजनीति में नए होते हुए भी कई बार जनता ने इन सितारों को सिर-आंखों पर बैठाया है. लेकिन कई बार इसी पब्लिक ने इनके ग्लैमर और लोकप्रियता को ठेंगा भी दिखाया है.

राजेश खन्ना के अंदाज़ में कहें तो ये पब्लिक है, शायद सब कुछ जानती है...

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