साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के ‘श्राप’ भाजपा को असमंजस में डालते रहेंगे: नज़रिया

  • 19 अप्रैल 2019
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पहले पार्टियां भ्रष्ट और अपराधियों को टिकट दिया करती थीं लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है जब 'आतंकवाद' से जुड़े मामले के अभियुक्त को किसी पार्टी ने टिकट दिया है.

भाजपा ने अपनी मातृत्व संस्था आरएसएस से आदेश मिलने के बाद भारतीय लोकतंत्र में पहली बार आतंकवाद से जुड़े मामले में अभियुक्त 48 वर्षीय साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को भोपाल से मैदान में उतारा है.

प्रज्ञा कह चुकी हैं कि पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ना 'धर्म युद्ध' है और संघ पहले ही दिग्विजय को 'आदतन हिंदू विरोधी' कह चुका है.

सत्तारूढ़ भाजपा अपने हिंदुत्व के नाम पर उठाए जा रहे ध्रुवीकरण कदमों के बारे में बिलकुल भी चिंतित नहीं है. भारतीय राजनीति में भाजपा की राजनीति राष्ट्रवाद पर अधिकतर केंद्रित रही है और उसमें उसने ऐसे शख्स को उतारा है जिस पर आतंकवाद के आरोप हैं.

हाल ही में ख़ूब बोलने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता है.

प्रज्ञा को उतारने का उद्देश्य

भारत ने पिछले साल आधिकारिक रूप से पाकिस्तान के ख़िलाफ़ तब विरोध जताया था जब हाफ़िज़ सईद की पार्टी ने चुनाव में उम्मीदवार उतारे थे. हालाँकि सईद के सभी उम्मीदवार हार गए थे. 30 साल से भोपाल सीट भाजपा का एक अपराजेय किला रही है.

अगर प्रज्ञा वहां से चुनाव जीत जाती हैं तो दुनिया को भारत का क्या संदेश जाएगा?

2019 का चुनाव किसी भी कीमत पर जीतने की मोदी और शाह की ललक ने भारत के असली और अहम आतंकी हमलों के मामलों को अदालत में कमज़ोर होने दिया है.

प्रज्ञा को चुनावी मैदान में उतारने के पीछे क्या मकसद है? इससे भाजपा का सबसे पहला और मुख्य मकसद पूरा हो गया है और वह है ध्रुवीकरण के मोड में पूरी तरह चले जाना. मोदी के प्रधानमंत्री कार्यालय में औसत ट्रैक रिकॉर्ड के बाद उनकी पार्टी 'सबका साथ, सबका विकास' के नारे को छोड़ चुकी है.

मोदी ने 'अच्छे दिन' का वादा किया था लेकिन भारत अब बिना क़ानून के राज में लिंचिंग और गिरती अर्थव्यवस्था का गवाह है.

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नए हिंदुत्ववादी चेहरे

मोदी के कार्यकाल में भाजपा ने हिंदुत्व के नए योद्धाओं को पैदा किया है. इनमें एक अतिवादी साधू योगी आदित्यनाथ अब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं. अब प्रज्ञा को भी मैदान में उतारा जा रहा है जबकि उसकी पार्टी के असली हिंदुत्ववादी नेता और संस्थापक लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे नेता वर्तमान राजनीतिक दौर से बाहर हो चुके हैं.

पार्टी में कभी अतिवादी लोग 'हाशिए' पर रहते थे लेकिन अब वे 'मुख्यधारा' में आ चुके हैं.

संभ्रांत वर्ग ने इस विभाजन को तैयार किया था और योगी के उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद यह ख़त्म हो गया. योगी आदित्यनाथ ने चुनाव प्रचार के दौरान 'अली बनाम बजरंगबली' के बारे में कई बार सांप्रदायिक टिप्पणियां कीं, पहले चरण के चुनाव के बाद चुनाव आयोग ने आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन में योगी को 72 घंटे के लिए चुनाव से प्रतिबंधित कर दिया.

सूत्रों का कहना है कि अमित शाह ने पूर्व मुख्यमंत्रियों शिवराज सिंह चौहान और उमा भारती दोनों से चुनाव लड़ने को कहा था लेकिन दोनों ने ही चुनाव लड़ने से मना कर दिया था.

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पहले चरण के बाद भाजपा हुई आक्रामक

प्रज्ञा ठाकुर को चुनाव में उतारने का फ़ैसला आरएसएस की मातृत्व संस्था संघ की ओर से आया है. पहले चरण के मतदान के बाद आए इस फ़ैसले को मोदी और शाह ने तुरंत स्वीकार भी कर लिया क्योंकि कुछ रिपोर्टों के अनुसार, पश्चिमी उत्तर प्रदेश की आठ सीटों पर हुए मतदान में महागठबंधन ने अच्छा प्रदर्शन किया है.

प्रमुख चुनावी एजेंसी सीएसडीएस ने 11 अप्रैल को पहले चरण के मतदान के बाद आंकलन किया है कि मोदी लहर लगभग समाप्त है जिसके बाद भाजपा मुश्किल में फंसती दिख रही है और उत्तर प्रदेश में पार्टी को 20 से 25 सीटें मिल सकती हैं. 2014 में भाजपा गठबंधन को 73 सीटें मिली थीं.

संघ परिवार के इस फ़ैसले से एक महत्वपूर्ण संदेश भी जाता है. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत, मोदी और शाह हिंदुत्व पर ख़ुद को कमतर नहीं दिखाना चाहते हैं और इससे अल्पसंख्यकों को यह भी संदेश जाता है कि उनके लिए नए भारत में कोई जगह नहीं है.

प्रज्ञा को उम्मीदवार बनाने के पीछे भाजपा का मकसद कट्टर मतदाताओं के वोट को सुनिश्चित करना और अधिक ध्रुवीकरण के पक्ष में वोट करने के लिए प्रोत्साहित करना है. कल दूसरे चरण के मतदान के बाद भाजपा ख़ासी चिंतित है और सांप्रदायिक कार्ड को आगे बढ़ा सकती है.

प्रज्ञा को मैदान में उतारकर भाजपा ने विपक्ष को चौंकाया है लेकिन वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं का कहना है कि वे भाजपा के जाल में नहीं फंसेंगे.

हमेशा सुर्खियों में रहने वाले दिग्विजय सिंह ने भाजपा के फ़ैसले पर अभी तक कोई टिप्पणी नहीं की है उनका कहना है वह कांग्रेस पार्टी के निर्देशों के बाद ही कुछ कहेंगे. बावजूद इसके उन्होंने भोपाल में प्रज्ञा का स्वागत किया है और कहा है कि वह स्थानीय मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करेंगे.

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Image caption हेमंत करकरे को मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया है

प्रज्ञा के बयान खलबली मचाते रहेंगे

भाजपा चौबीसों घंटे वाले अपने समर्थक समाचार चैनलों से ध्रुवीकरण सुनिश्चित करना चाहती है और वहां वह बार-बार कह रही हैं कि जेल में नौ सालों के दौरान उन्हें कैसे प्रताड़ित किया गया. फ़िलहाल वह ज़मानत पर जेल से बाहर हैं.

भाजपा की जय-जयकार करने वाले समाचार चैनल भी उसके जाल में फंसते दिख रहे हैं और वह 'प्रज्ञा बनाम दिग्विजय' की बहस कराने की कोशिश कर रहे हैं.

दिग्विजय सिंह यूपीए कार्यकाल में हुए बटला हाउस एनकाउंटर पर विवादित सवाल खड़े करने के लिए जाने जाते हैं और अभी भी मुख्यधारा के नेता हैं. वहीं, प्रज्ञा 2008 मालेगांव धमाके में अभियुक्त हैं.

मुंबई आतंकवाद निरोधी टीम के प्रमुख रहे हेमंत करकरे 26/11 चरमपंथी हमले के दौरान मारे गए थे. प्रज्ञा ने आज कहा है कि हेमंत को उनका 'श्राप' लगा था. करकरे को मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया था.

प्रज्ञा के बयान ने खलबली मचा दी है और शायद वह इस तरह से बयान देकर आगे भी खलबली मचाते हुए भाजपा को असमंजस मे डालती रहेंगी. वहीं, उनकी किसी से बराबरी भी नहीं हो सकती है.

(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है.)

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