भारत में 'मॉब लिंचिंग' का पहला बड़ा मामला था ओडिशा में

  • 22 अप्रैल 2019
ग्राहम स्टेंसः वो शख्स जो पहली बार 'मॉब लिंचिंग' में मारा गया था!

सुबह के साढे ग्यारह बजे, ओडिशा के मयूरभंज ज़िले के बारिपदा बस स्टेशन के पास गाड़ी रोक हमने पूछा, "मयूरभंज लेप्रोसी होम किधर है?"

एक ठेले वाले ने जवाब दिया, "सामने चौराहे से आधा किलोमीटर बाद लेफ़्ट ले लीजिएगा, सहिबो का सेंटर आ जाएगा".

मैंने कहा, "भैया, लेप्रोसी होम जाना है किसी सेंटर नहीं."

इस बार चिड़चिड़ा कर जवाब मिला, "बोला न, सहिबो का सेंटर वही है."

दोबारा पूछने की हिम्मत नहीं की मैंने और पहुँचे तो एक बड़ा सा गेट मिला जिस पर लिखा था, "1902 में बनी ये इमारत महारानी लक्ष्मी देवी को समर्पित है."

भीतर घने पेड़ों के बीच एक साफ़ सड़क अंदर लेकर जाती है. तीन छोटी चर्च नुमा झोपड़ियाँ हैं, जिनके बग़ल में आम और कटहल के पेड़ों की छांव में कुछ महिलाएँ कच्चे आम काट रही, धूप में सुखा रहीं हैं.

ये वही लेप्रोसी शेल्टर होम (कुष्ठरोग निवारण केंद्र) है जहाँ आस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस ने अपना आधा जीवन बिताया था.

22 जनवरी, 1999 की दोपहर को यहीं ग्राहम स्टेंस ने कुष्ठरोगियों के साथ अपना आख़िरी भोजन किया था .

उसी रात, पास के कियोंझर ज़िले के मनोहरपुर गाँव में ग्राहम स्टेंस और उनके दो बेटों, फ़िलिप (10 वर्ष) और तिमोथी (8 वर्ष) की हत्या तब हुई जब एक उग्र भीड़ ने तीनों को उनकी जीप के साथ जला दिया था.

Image caption ग्राहम स्टेंस अपने बच्चों के साथ

इन लोगों को यक़ीन था कि "कुष्ठरोगियों की सेवा करने की आड़ में ग्राहम स्टेंस ग़रीब आदिवासियों का धर्मपरिवर्तन करवाते रहे हैं."

हालाँकि बाद में मामले की जाँच करने वाले वाधवा कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में इन सभी आरोपों को ग़लत बताया था.

लेकिन ये सब तब हुआ जब ग्राहम स्टेंस और उनके बेटे कियोंझर की एक सिमेटरी में अपनी क़ब्र में दफ़्न हो चुके थे.

Image caption निमाई हंसदा उन चश्मदीदों में से एक हैं, जिन्होंने ग्राहम स्टेंस को जलते देखा था

चश्मदीद

लेप्रोसी होम में बेसब्री से हमारा इंतज़ार 55 साल के निमाइ हंसदा कर रहे थे.

सबसे पहले हमें भोजन के लिए पूछा और कहा, "कुछ हुआ है क्या?"

मैंने कहा, "ग्राहम स्टेंस और उनके बेटों को गुज़रे हुए 20 साल हो गए".

निमाइ ने जवाब दिया, "सब यहीं हैं. कोई कहीं नहीं गया. हमारे भीतर ग्राहम स्टेंस आज भी ज़िंदा हैं, हमारी देख-रेख करने के लिए."

निमाइ का जन्म बारिपदा, ओडिशा के इसी लेप्रोसी शेल्टर होम में हुआ था क्योंकि उनके माँ-बाप कुष्ठरोग से पीड़ित थे और ग्राहम स्टेंस ही उनका इलाज कर रहे थे.

"माँ बताती थी कि जब मैं छह महीने का था तो ग्राहम मुझे एक ऊँगली से पकड़ कर उठा लिया करते थे", यह कहते हुए निमाइ की आँखें नम हो चलीं.

उन्होंने बताया, "22 जनवरी, 1999 को सहिब ने चावल और उबली सब्ज़ी खाई, फिर हम शहर के चर्च से सटे उनके घर गए. मनोहरपुर जाना था और उनके दोनों बेटों और बेटी ने भी जाने की ज़िद की. ग्राहम ने बेटी को माँ के साथ रुकने के लिए कहा और हमलोग दो जीपों में निकल गए."

भीड़ आई और मारने लगी...

ग्राहम स्टेंस और उनके बेटे मनोहरपुर के छोटे से चर्च में एक कार्यक्रम में भाग लेने पहुँचे थे. जिन लोगों ने उन पर हमला कर उनकी हत्या की, उन्हें शायद ये लगा था कि इसकी आड़ में धर्म-परिवर्तन जारी है.

निमाइ ने आगे बताया, "रात को खाना खा कर हम लोग गुड नाइट बोल सोने चले गए. ग्राहम और बेटे बड़ी जीप में मच्छरदानी लगा कर सो रहे थे और मैं भीतर घर में चला गया. बारह बजे के आसपास गाड़ी को मारने की आवाज़ें आने लगीं. निकला तो देखा गाड़ी के पास आदमी लोग जमा होकर गाड़ी को मार रहे हैं."

निमाइ के मुताबिक़ उन्होंने भीड़ के पास जाकर इसकी वजह पूछी.

उन्होंने बताया, "बस पूछा ही था कि उधर से कोई बोला, मारो-मारो उसे मार दो, और मुझे मारने लगे. मैं भागा, फिर कुछ पानी लेकर आया आग बुझाने के लिए. मुझे और मारा गया. उसके बाद मैंने गाँव वालों को बुलाकर उन्हें बचाने की कोशिश की, लेकिन तब तक टायर बर्स्ट करने लगा और हम कुछ नहीं कर सके".

मिनटों में ग्राहम स्टेंस और उनके बेटों की गाड़ी धू-धू कर जल उठी और जब तक गाँव की भीड़ जमा होने में देर हो चुकी थी.

Image caption कल्याण कुमार सिन्हा घटना स्थल पर पहुँचने वाले पहले पत्रकार थे.

ग्लैडिस की सहनशीलता

कल्याण कुमार सिन्हा उन दिनों से बारिपदा में पत्रकारिता करते रहे हैं और इन दिनों आकाशवाणी के संवाददाता हैं. अगली सुबह मनोहरपुर घटना स्थल पर पहुँचने वाले पहले पत्रकार कल्याण ही थे. उन्हें आज भी वो हल्की सर्द सुबह याद है.

"जब मैं वहाँ पहुँचा तो ज़्यादा लोग नहीं थे. इलाके से जले हुए टायर-पेट्रोल की दुर्गन्ध आ रही थी और साफ़ दिख रहा था कि ग्राहम और उनके बेटों को ज़बरन जीप में बाँधकर जला दिया गया है."

कल्याण सिन्हा के घटनास्थल पर पहुँचने से थोड़ा ही पहले ग्राहम की पत्नी ग्लैडिस स्टेंस पहुँची थीं और थोड़ी दूर बैठीं सिसक-सिसक कर रो रहीं थीं.

कल्याण ने बताया, "जिस एक चीज़ को मैं आज भी सलाम करता हूँ वो थी ग्लैडिस का धैर्य और सहनशीलता. मैंने पूछा किसने किया ये सब तो उन्होंने जवाब दिया था कि जिसने भी किया मैं उसे माफ़ करती हूँ क्योंकि ये ईश्वर कि मर्ज़ी रही होगी. ईश्वर भी कहता है क्षमा करो."

बजरंग दल से जुड़ा था दोषी

ग्राहम स्टेंस की हत्या के आरोप में हिंदू संगठन बजरंग दल के सदस्य रविंदर कुमार पाल उर्फ़ दारा सिंह को दोषी पाया गया था और उन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई थी.

बाद में दारा सिंह की हाईकोर्ट में रहम की अपील पर उनकी फाँसी की सज़ा को माफ़ कर आजीवन कारावास में बदल दिया गया.

इन दिनों दारा सिंह कियोंझर की एक जेल में हैं.

कई अन्य अभियुक्तों को पर्याप्त सबूत न होने के कारण अदालत ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया था.

ग्राहम स्टेंस और उनके बेटों की हत्या की जाँच करने वाले वाधवा कमीशन ने ग्राहम पर धर्मपरिवर्तन के आरोपों को ग़लत बताने के साथ ही इन हत्याओं में बजरंग दल की भी किसी तरह की भूमिका होने को ख़ारिज कर दिया था.

हालाँकि इन जघन्य हत्याओं को अब बीस साल हो चुके हैं लेकिन फ़ेक न्यूज़ और अफ़वाहों के चलते एक सुनियोजित तरीक़े से ऐसी घटना को अंजाम देना शायद पिछले चंद दशकों में पहला मामला था.

इस घटना ने न सिर्फ़ भारत बल्कि समूचे विश्व को झकझोर कर रख दिया था.

कुछ वैसे ही जैसे, पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारत में गोहत्या और गाय की तस्करी के आरोपों के चलते हुई सार्वजनिक हत्याओं की निंदा होती है.

जहाँ ग्राहम स्टेंस के मामले में भी फ़ेक न्यूज़ और अफ़वाहों का बड़ा रोल था, वहीं गाय से जुड़ी हिंसा के मामलों में भी इनकी विशेष भूमिका रही है. फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि उन दिनों व्हाट्सऐप और सोशल मीडिया के बदले पर्चों, बैनरों और भीड़ भड़काने वाली अफ़वाहों का चलन था.

Image caption शारदा टूदु

यादें

ग्राहम स्टेंस के लेप्रोसी शेल्टर होम में आज भी ऐसे मरीज़ हैं जिनका इलाज कर ग्राहम ने उन्हें ठीक कर दिया था.

शारदा टूदु एक ऐसी ही 75 साल की महिला हैं जिनके परिवार ने कुष्ठरोग हो जाने पर 25 वर्ष पहले उन्हें न सिर्फ़ घर बल्कि गाँव से निकला दिया था.

ग्राहम का नाम लेते ही वे रो पड़ीं और बोलीं, "वो हमारे भगवान थे क्योंकि हमारे अपनों की ठोकर पड़ने पर वो मुझे यहाँ लाए, मेरा इलाज किया और इज़्ज़त दी."

Image caption ग्राहम और ग्लैडिस की बेटी अब आस्ट्रेलिया में डॉक्टर बन चुकीं हैं और सिडनी में अपने पति के साथ रहती हैं.

अब कहां हैं ग्राहम का परिवार

ग्राहम और बेटों की हत्या के बाद पेशे से नर्स रहीं उनकी पत्नी ग्लैडिस स्टेंस ने वर्षों तक भारत को अपना घर बनाए रखा और कुष्ठरोगियों की सेवा करती रहीं.

भारत में पद्मश्री अवॉर्ड से नवाज़ी गईं ग्लैडिस ने 2004 में बीबीसी से कहा था, "भारत ही मेरा घर है, घर को कोई छोड़ता है क्या."

ग्राहम और ग्लैडिस की बेटी अब आस्ट्रेलिया में डॉक्टर बन चुकीं हैं और सिडनी में अपने पति के साथ रहती हैं.

क़रीब तीन वर्ष पहले ग्लैडिस भी वहीं चली गई थीं और तब से नहीं लौटीं.

लेप्रोसी होम में सभी को आज भी उनका इंतज़ार है.

चलने के पहले मैंने निमाइ हंसदा से पूछा, "क्या आपको पता है कि पिछले कुछ वर्षों में लिंचिंग या उग्र भीड़ के हमला किए जाने की घटनाएँ हुईं हैं?"

ग्राहम स्टेंस और बेटों की हत्या के चश्मदीद, निमाइ ने कहा, "सब पता है. ये सब नहीं होना चाहिए और शांति के साथ हर धर्म के लोगों को एक दूसरे के साथ रहना चाहिए. वरना नुक़सान ही होता रहेगा."

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