लोकसभा चुनाव 2019: इस बार क्यों ग़ुस्साया हुआ है सिंगूर-ग्राउंड रिपोर्ट

  • 23 अप्रैल 2019
बप्पा बंगाल

एक बाप-बेटे पाल्थी मार ज़मीन पर बैठे हैं और सामने रखी ढेरों फ़ाइलें और सरकारी काग़ज़ों को क़रीने से समेट रहे हैं.

पास ही रसोई में चावल और मछली का झोल पक रहा है. सामने रखे टीवी में एक बांग्ला न्यूज़ चैनल पर ख़बर आ रही है कि ममता बनर्जी और अमित शाह अलग-अलग तारीख़ों पर इलाक़े में चुनाव प्रचार करेंगे.

पैंतीस साल के बप्पा बंगाल ने पिता से कहा, "काओके वोट देबे ना", यानी किसी को भी वोट नहीं देना है इस बार.

पिता ने हामी भारी और रसोई की तरफ़ भात लेने बढ़ गए.

बप्पा के परिवार में कुल छह सदस्य हैं, जिसमें माँ-बाप, पत्नी के अलावा दो बच्चे भी शामिल हैं.

इनकी तीन पीढ़ियाँ पश्चिम बंगाल के सिंगूर में रहती आईं हैं और उनके मुताबिक़, "हमने हर चुनाव में बढ़-चढ़ कर हिस्सा भी लिया, लेकिन हासिल कुछ नहीं हुआ".

बप्पा हमारे साथ गाड़ी में बैठ कर अपने खेत पर ले गए.

उन्होंने कहा, "ये सब ज़मीन हमारी है, पूरे सात बीघा. मुझसे बोलते हैं आपका ज़मीन ठीक हो गया आप ले लो, मैं आया तो देखा मेरी ज़मीन ऐसे ही पड़ी हुई है."

मैंने पूछा आख़िर इस ज़मीन में आप खेती क्यों नहीं करना चाहते?

अब बप्पा की आवाज़ में गुस्साहट समा चुकी थी, "खेती कैसे करेंगे इस ज़मीन पर. पहले कैसी थी और अब कैसी हो गई है, इसको खेती के लायक बनाने के लिए ही डेढ़ दो लाख रुपए ख़र्च करने होंगे, कहाँ से लाएँगे".

मैंने थोड़ा आगे बढ़ कर खेत के भीतर जाकर देखा तो बप्पा की बात समझ आई. उनके खेत की ज़मीन में सीमेंट और पत्थर के टुकड़े मिल चुके हैं और मिट्टी का रंग भी वैसा नहीं रहा जैसा इस इलाक़े में होता है, गाढ़ा भूरा.

सिंगूर

बप्पा बंगाल सिंगूर के उन साढ़े तीन हज़ार किसानों में से एक हैं जिनको 2004 से 2005 तक इलाक़े में हुए ज़मीन अधिग्रहण के छह लाख रुपए मिले थे जो पिता और उनके भाइयों में बराबरी से बँट गए.

लेकिन आज वे उस दिन को कोसते है जब उनके परिवार ने राज़ी-ख़ुशी अधिग्रहण के लिए ज़मीन दे दी थी. दरअसल, 2007 में ये ज़मीन टाटा समूह को दी गई और यहाँ पर नैनो कार प्लांट लगा.

प्लांट लगाने के साथ स्थानीय लोगों की रोज़गार देने की भी बात हुई थी जिसपर अमल शुरू हो गया था.

बप्पा और सैंकड़ों स्थानीय लोगों को तीन महीने का पॉलीटेक्निक कोर्स भी मुफ़्त करवा दिया गया था.

ज़मीन मिली पर किसी काम की नहीं

लेकिन उसके बाद परिस्थियाँ पलट गईं. पूरी तरह चालू होने के पहले ही क़रीब 1,000 एकड़ तक फैली फ़ैक्टरी विवाद में फँसी और फिर यहाँ से हटा ली गई.

सिंगुर में टाटा की नैनो परियोजना के लिए सरकार ने किसानों की ज़मीन का अधिग्रहण किया था.

सरकारी आँकड़ों के मुताबिक, कोई 2400 ऐसे किसान थे जिनसे उस परियोजना के लिए जबरन ज़मीन ली गई थी.

इन अनिच्छुक किसानों की ज़मीन लौटाने के मुद्दे पर ममता बनर्जी ने इतना बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया था कि टाटा को कारोबार समेट कर गुजरात जाना पड़ा.

2008 में टाटा समूह ने सिंगूर स्थित अपने संयंत्र को पश्चिम बंगाल से हटाने का फ़ैसला किया था.

विरोध की अगुवाई करने वाली ममता बनर्जी ने 2011 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में सिंगूर को एक बड़ा मुद्दा बनाया और तब से सत्ता में हैं.

उस आंदोलन के दौरान ममता ने नारा दिया था, "माँ, माटी और मानुष" जो आज भी उनकी पार्टी के बैनरों पर दिखता है.

लेकिन जिनकी ज़मीन लौटा दी गई, उनकी शिकायत बरक़रार हैं.

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मलबे ने बंजर बना दिया

चारु चंद्र भी एक किसान हैं जिनकी स्थिति आसमान से गिरे और खजूर पर अटके वाली सी हो गई है.

उन्होंने बताया, "मैं यहीं पर पला-बढ़ा, कभी भी खेतों पर पानी नहीं जमा होता था क्योंकि ढाल दूसरी तरफ़ था. लेकिन जब यहाँ प्लांट को तोड़ा गया और मलबे को उठाया गया तो साथ में मिट्टी भी गई और मेरे खेत में अब कमर तक पानी भर जाता है.

सिंगुर भी जैसे थम सा गया है पिछले 11 सालों से. पश्चिम बंगाल के दूसरे इलाक़ों की तरह न तो यहाँ बड़ी दुकानें खुली हैं, न किसी तरह के कारख़ाने लगे हैं. स्थानीय लोगों के मुताबिक़ ज़मीनों के दाम भी ठहर गए हैं.

शहर के रेलवे स्टेशन के क़रीब मुलाक़ात मैनाक हाज़रा से हुई जो दक्षिण भारत में एमबीए के छात्र हैं और इन दिनों घर आए हैं.

मैनाक ने कहा, "सिंगुर में फ़ैक्टरी लगने और फिर उजड़ जाने से पहले तो हमारे राज्य की इमेज को ज़बरदस्त धक्का लगा. ये पर्सेप्शन हो गया कि बंगाल इज़ नॉट फ़ॉर इन्वेस्टमेंट. अगर एक बड़ी कंपनी जम जाती तो दूसरे एमएनसी भी आते, थोड़ी बहुत जॉब तो क्रिएट होती."

सीपीएम दूसरे नंबर पर

सिंगूर हुगली लोकसभा क्षेत्र के अन्तर्गत आता है और इसे ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस का गढ़ कहा जाता है.

तृणमूल पिछले दो लोकसभा चुनावों में इस सीट को जीत रही है और सीपीएम यहाँ दूसरे नम्बर पर रही है.

इस बार भाजपा ने इस सीट से फ़िल्म ऐक्ट्रेस लौकेट चटर्जी को उतारा है जिन्होंने अपने चुनाव प्रचार सिंगूर से ही शुरू किया.

उन्होंने ग्रामीणों से कहा, "तृणमूल ने आपको कहीं का नहीं छोड़ा. मुझे पता है आप लोग ममता बनर्जी से नाराज़ हैं. मुझे यानी भाजपा को वोट दीजिए, मोदी जी को दोबारा प्रधानमंत्री बनवाइए फिर देखिए इस जगह ख़ुशहाली लौट आएगी".

कुछ स्थानीय भी जो मानते हैं कि सिंगुर मामले पर सभी ने राजनीतिक रोटियाँ तो सेक लीं, लेकिन फिर यहाँ से आगे भी बढ़ गए.

Image caption डॉ. उदयन

ममता का गढ़

डॉक्टर उदयन दास सिंगूर टाउन के मशहूर डॉक्टर हैं जिनके यहाँ मरीज़ों की लंबी कतार लगी रहती है.

उन्होंने कहा, "सिंगूर एक ऐसा आंदोलन साबित हुआ जिससे फ़ायदा सिर्फ़ नेताओं को हुआ, आम लोगों की तकलीफ़ें कम होने के बजाय बढ़ ही गईं. जिन किसानों को मुआवज़ा नहीं मिल सका उन्हें सरकार हर महीने 2000 रुपए और दो रुपए प्रति किलो के रेट से 16 किलो चावल दे रही है. अब ये सोचिए कि अगर वो अपनी ज़मीन में धान उगा रहा होता तो कितने फ़ायदे में होता".

लेकिन सिंगूर से पिछले दो लोक सभा चुनावों से भारी मतों से जीतने वाली तृणमूल की उम्मीदवार रत्ना डे नाग के मुताबिक़, "सभी विपक्षी दल जानते हैं ममता दी ने सिंगूर और नंदीग्राम के लिए क्या किया है. यही वजह है कि हमारा जीतने का मार्जिन बढ़ता जा रहा है और आम लोगों का समर्थन भी. भाजपा वालों का काम है सिर्फ़ दुष्प्रचार करना".

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