लोकसभा चुनाव 2019: लालू यादव ने मुसलमानों के लिए क्या किया

  • 1 मई 2019
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लालू प्रसाद यादव बिहार के मुसलमानों की मजबूरी हैं या मज़बूती हैं? इस सवाल का जवाब इतना आसान नहीं है लेकिन इसे दो वाकयों से समझा जा सकता है.

1992 में बिहार के सीतामढ़ी में दंगा हुआ था. प्रोफ़ेसर प्रभाकर सिन्हा पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ की तरफ़ से इस दंगे की जांच करने गए थे.

प्रभाकर सिन्हा कहते हैं, ''मैं वहां कई मुसलमानों से मिला और सबने कहा कि लालू यादव मुख्यमंत्री ना होते तो हमलोग की जान नहीं बचती.'' सिन्हा कहते हैं कि मुसलमानों ने लालू राज में दंगाइयों से ख़ुद को सुरक्षित महसूस किया है और सुरक्षा की भावना ही मुसलमानों को लालू से अलग नहीं होने देती.

दूसरा वाकया बिहार के जाने-माने इतिहासकार ने नाम नहीं बताने की शर्त पर बीबीसी से साझा किया. उन्होंने कहा, ''मदरसे के शिक्षक लालू के पास वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर पहुंचे थे. जब वे लौटकर आए तो मैंने पूछा कि लालू जी ने क्या कहा? लालू ने उनसे कहा था, 'जान भी बचाएं और पैसा भी बढ़ाएं!' धर्मनिरपेक्षता के प्रति लालू की प्रतिबद्धता की एक सीमा थी.''

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वो कहते हैं, ''लालू को पता था कि मुसलमानों के साथ इस सीमा में भी बिहार में कोई खड़ा होने वाला नहीं है. आज की तारीख़ में लालू और उनकी पार्टी बिहार में मुसलमानों की मजबूरी हैं. नीतीश कुमार ने मुसलमानों का भरोसा जीता था लेकिन बीजेपी से दोस्ती के कारण लालू ही एकमात्र भरोसा बचे हैं. मुसलमानों के पास कोई विकल्प नहीं है.''

लालू यादव को 15 सालों तक सत्ता में बनाए रखने में 'माय' समीकरण यानी मुसलमान-यादव गठजोड़ की अहम भूमिका रही है. बिहार में मुसलमान 17 फ़ीसदी हैं और यादव भी क़रीब क़रीब इसी के आस-पास हैं. इस लिहाज़ से लालू को जिताने में यह ठोस वोट बैंक लंबे समय तक विरोधियों पर भारी पड़ता रहा.

जिस इतिहासकार का ऊपर ज़िक्र किया है वो ये भी मानते हैं कि मुसलमानों और यादवों की तादाद बिहार में लगभग बराबर होने के बावजूद 'माय' समीकरण में दोनों की हैसियत एक नहीं है.

वो कहते हैं, ''इस गठजोड़ में मुसलमान दूसरे पायदान पर ही रहे हैं. यहां यादव पहले नंबर हैं. इसे आप लोकसभा और विधानसभा चुनाव में आरजेडी से मिलने वाले टिकटों के आधार पर भी समझ सकते हैं.''

इस बार आरजेडी बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से 19 पर चुनाव लड़ रही है. इनमें से आरजेडी ने आठ यादव उम्मीदवारों को टिकट दिया है और पांच मुसलमानों को.

2015 के विधानसभा चुनाव में भी आरजेडी ने 48 यादवों को टिकट दिया था और इसकी तुलना में महज़ 16 मुसलमानों को उतारा था. आरजेडी में मुसलमानों और यादवों के बीच का यह असंतुलन हमेशा से रहा है.

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40 साल के मोहम्मद इलियास बेगूसराय के हैं. उन्हें लगता है कि न भाजपा का डर होता और न मुसलमान लालू के पिछलग्गू होते. मोहम्मद इलियास कहते हैं, ''मैं आरजेडी के साथ ही था. कन्हैया के आने के बाद मुझे बेहतर विकल्प दिखा और आरजेडी से ख़ुद को अलग कर लिया. बिहार में ऐसे मुसलमान बड़ी संख्या में हैं जो आरजेडी के विकल्प की तलाश में हैं. नीतीश कुमार ने एक उम्मीद जगाई थी लेकिन बीजेपी के साथ जाने से यह भरोसा भी अधूरा ही रह गया.''

लालू प्रसाद यादव जब 1997 में जेल गए तो उन्होंने अचानक से अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया था. राबड़ी देवी तब सक्रिय राजनीति में भी नहीं थीं. कई लोग मानते हैं कि अगर लालू उस वक़्त किसी मुस्लिम को मुख्यमंत्री बना देते तो उनका 'माय' समीकरण और मज़बूत होता लेकिन उन्होंने अपनी पत्नी को चुना.

क्या लालू यादव के मुख्यमंत्री बनने से मुसलमानों की आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति में कोई परिवर्तन आया? पटना के एक मुस्लिम स्कॉलर ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा, ''ऐसा बिल्कुल नहीं है कि मुसलमानों की आर्थिक और शैक्षणिक हालत सुधरी है. आपने सुरक्षा दी सही है. लेकिन यह सुरक्षा किसी के हमले से है. सुरक्षित रहने के लिए अस्पताल, घर, सड़क, पढ़ाई और दवाई की भी ज़रूरत पड़ती है. बिहार के मुसलमान आज भी इससे वंचित हैं.''

वो कहते हैं, ''आज तक कोई मुस्लिम नेतृत्व नहीं उभरा. आरजेडी में जो हैं भी वो पिछलग्गू की तरह हैं. हालांकि लालू के अलावा बाक़ी यादवों का भी वही हाल है. एक वक़्त में रंजन यादव और रामकृपाल यादव इनके प्रिय हुआ करते थे लेकिन आज की तारीख़ में पार्टी से बाहर हैं. मसला केवल बिहार का नहीं है. पूरे देश में मुस्लिम नेतृत्व संकट में है. फ़र्ज़ कीजिए कि कन्हैया कुमार कोई मुस्लिम युवा होता. हिन्दू है तब उसे देशद्रोही कहा जा रहा, मुसलमान होता तो क्या होता? किसी भी पार्टी को युवा मुस्लिम नेतृत्व बर्दाश्त नहीं है.''

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लालू और... समोसे में आलू !

आरजेडी के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी से पूछा कि लालू बिहारी मुसलमानों की मज़बूती हैं या मजबूरी तो उन्होंने कहा कि इसका जवाब इतना आसान नहीं है. वो कहते हैं, ''मुसलमानों को लालू ने सुरक्षा दी और इस पर किसी को शक नहीं है लेकिन अगर उनका विकास नहीं हुआ तो यह केवल मुसलमानों की बात नहीं है और यह केवल बिहार की भी बात नहीं है. देश में जो आर्थिक नीति चल रही उसके कारण ग़रीब और ग़रीब हो रहे हैं और अमीरों की अमीरी और बढ़ रही.''

कई लोग मानते हैं कि बिहार में मुसलमान और यादव भले मतदान के वक़्त एक साथ वोट डालते हैं लेकिन इनमें सामाजिक रूप से वो मेलजोल नहीं है. प्रोफ़ेसर प्रभाकर सिन्हा कहते हैं, ''1989 के भागलपुर दंगे में यादवों की भागीदारी अहम थी. मुख्य अभियुक्त कामेश्वर यादव को लालू ने सम्मानित किया था. लालू की धर्मनिरपेक्षता असंदिग्ध नहीं है.''

कामेश्वर यादव लंबे समय तक जेल में भी रहे थे लेकिन पटना हाई कोर्ट ने सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था.

लालू प्रसाद यादव को इस बात का श्रेय दिया जाता है कि उन्होंने अक्तूबर 1990 में लाल कृष्ण आडवाणी को गिरफ़्तार कर बिहार को सांप्रदायिक तनाव से बचा लिया था. सेक्युलर ख़ेमे में लालू के इस क़दम की आज तक सराहना होती है.

हालांकि लालू के क़रीबी रहे रंजन यादव कहते हैं कि लालू ने यह क़दम तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के कहने पर उठाया था.

रंजन यादव कहते हैं, ''माय मतलब मेरा और यह समीकरण लालू परिवार के लिए था न कि यादवों और मुसलमानों के लिए. लालू की जीत भले इस समीकरण से होती है लेकिन इसमें शामिल यादवों और मुसलमानों का कुछ भी भला नहीं हुआ.''

रंजन यादव कहते हैं, ''कहा जाता है कि लालू ने बिहार में सवर्णों के ख़िलाफ़ पिछड़ों और दलितों को आंख से आंख मिलाकर बात करने का साहस दिया लेकिन सच तो यह है कि यह एक स्वाभाविक सामाजिक प्रक्रिया है जिसे लंबे वक़्त तक रोककर नहीं रखा जा सकता था. लालू ने अपने परिवार के लिए ख़ूब किया और इसमें कोई विवाद नहीं है.''

प्रभाकर सिन्हा कहते हैं कि लालू ने मुसलमानों के लिए वही किया जो एक नेता वोट बैंक के लिए करता है. वो कहते हैं, ''यह काम देश की हर राजनीतिक पार्टी अपने वोट बैंक के लिए करती है.''

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