गढ़चिरौली: नक्सल अभियानों में जवानों की जान दांव पर लगा रहे अफ़सर?

  • 3 मई 2019
प्रमोद भोयर
Image caption प्रमोद भोयर नक्सल अभियानों के लिए बनाए गए विशेष बल के जवान थे

'पामया' अब कभी वापस नहीं आयेंगे. शुक्रवार को उनके दोस्तों ने उनकी अस्थियाँ वायंगंगा नदी में विसर्जित कर दीं. घाट के किनारे जमा दोस्त और परिवार के लोग अपने प्रमोद भोयर को अंतिम विदाई देने जुटे थे.

दो किलोमीटर दूर महाराष्ट्र के नक्सल प्रभावित गढ़चिरौली ज़िले के वडसा में चारों तरफ़ मातम पसरा है. यहाँ प्रमोद भोयर का घर है जहां भीड़ जमा है.

वर्ष 1992 के सितंबर माह में कुरखेड़ा में माओवादियों द्वारा इसी तरह के किए गए विस्फोट में वडसा के देसाईनगर ने अपने एक और बेटे प्रदीप भोयर को खो दिया था.

प्रदीप भी महाराष्ट्र पुलिस के जवान थे और प्रमोद भी.. इसलिए यहाँ के लोगों पर मानो जैसे बिजली ही गिर गई हो. इत्तेफ़ाक से प्रदीप भी प्रमोद के चाचा ही थे.

प्रमोद के परिवार में एक-एक कर मौतों का सिलसिला दो साल पहले से शुरू हो गया था. सबसे पहले उनके पिता महादेव जी और फिर उनका भाई रविन्द्र का निधन.

प्रमोद की शादी भी दो साल पहले ही हुई थी. तीन महीने पहले उनके दो जुड़वां बच्चों में से एक मरा हुआ पैदा हुआ था.

मई की एक तारीख़ को वो हमेशा की तरह घर से काम पर निकले. मगर उन्हें पता नहीं था कि वो फिर लौटकर घर नहीं आयेंगे.

Image caption प्रदीप भोयर के नाम पर एक चौक का नाम रखा गया है

घर में कोई नहीं अब कमाने वाला

गुरुवार को जब उनका अंतिम संस्कार किया गया तो वडसा के हर दुकानदार ने अपनी दुकान बंद कर दी और अंतिम संस्कार के लिए भीड़ में शामिल हो गए.

घर में बिलखती हुई उनकी माँ बात करने की स्थिति में नहीं हैं. उनके लिए तो तीन-तीन हादसे एक के बाद एक होते चले गए. वो टूट चुकी हैं. पहले पति और फिर दो जवान बेटों को खोने की कसक उनके मन को रह-रह कर कचोटती है.

मेरी भी हिम्मत नहीं हुई कि उनसे कोई सवाल करूं. कुछ देर में आंसू पोंछते हुए वो कहने लगीं, "अब हमारा क्या होगा? हमारे घर में अब कोई कमाने वाला नहीं बचा है."

दूर बावर्चीखाने में प्रमोद की पत्नी मोहिनी के इर्द-गिर्द जमा महिलाएं उन्हें दिलासा देने की कोशिश कर रहीं हैं. उनकी गोद में तीन महीने का बच्चा भी ज़ोर-ज़ोर से रो रहा है. वो थोड़ी-थोड़ी देर में बेहोश हो जा रही हैं.

Image caption प्रमोद की पत्नी मोहिनी

ये मुश्किल की घड़ी है मगर देसाईनगर का पूरा मोहल्ला प्रमोद के घर मौजूद है. मगर किसी की भी बात इस परिवार को दिलासा नहीं दे पा रही है.

घर में प्रमोद के दोस्त भी जमा हैं. इन्ही में से एक बताते हैं, "एक दिन पहले ही प्रमोद को हमने कहा था तूने बहुत दिन से छुट्टी नहीं ली है. अब एक महीने की छुट्टी ले ले. उसने कहा कि अगले दिन वो छुट्टी के लिए आवेदन देगा. मगर अब हमारा पामया कभी वापस नहीं आयेगा. उसने दुनिया से ही हमेशा के लिए छुट्टी ले ली है."

Image caption प्रमोद का परिवार

अधिकारियों पर उठाए सवाल

विजय मेश्राम प्रमोद के जीजा हैं और पास ही में रहते हैं. घाट के किनारे वो और मोहल्ले के लोग जमा हैं. आपस में बात कर रहे हैं.

वो महाराष्ट्र पुलिस के महानिदेशक के बयान की चर्चा कर रहे हैं जिसमे उन्होंने कहा था कि 'पुलिस से ग़लती हो गयी'.

मेश्राम और घाट पर जमा लोग सवाल उठा रहे हैं कि हमेशा जवान ही क्यों नक्सली हिंसा के शिकार होते हैं? बड़े अधिकारी क्यों नहीं?

बीबीसी से बात करते हुए मेश्राम आरोप लगाते हैं कि डीएसपी के पास ख़बर आ गई थी कि कुरखेड़ा में माओवादी बड़ी संख्या में हिंसक वारदात को अंजाम दे सकते हैं. वो पूछते हैं, "अगर ऐसी सूचना थी तो फिर 15 जवानों को वाहनों में ठूंस कर क्यों भेजा गया."

कुरखेड़ा के स्थानीय लोग भी कहते हैं कि जिन जगहों पर बारूदी सुरंग या विस्फोटकों के होने का अंदेशा रहता है वहाँ पर पुलिस बल को वाहनों पर सवार होकर जाने की मनाही है. मगर आरोप लग रहे हैं कि गढ़चिरौली पुलिस के आला अधिकारियों ने जवानों को कोई चेतावनी नहीं दी थी.

एक आला अधिकारी के बारे में जवान बताते हैं कि जवानों को एक गाड़ी में ठूंस कर रवाना करने के बाद वो अधिकारी ख़ुद अकेले एक निजी वाहन में सवार होकर गए थे.

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Image caption बुधवार को हुए नक्सली हमले में 15 जवानों की मौत हुई थी

ऑपरेशन में हो रहा नियमों का उल्लंघन?

गढ़चिरौली से लगे हुए छत्तीसगढ़ के कांकेर ज़िले में स्थित 'काउंटर टेररिज्म एंड जंगल वारफेयर कॉलेज' के निदेशक ब्रिगडियर बीके पंवार ने बीबीसी से बातचीत के दौरान कहा कि ये आमतौर पर देखा जा रहा है कि किसी भी बड़े नक्सल विरोधी अभियान के दौरान पुलिस और सुरक्षा बलों के आला अधिकारियों द्वारा 'स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिजर' का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है.

वो कहते हैं, "जब भी अभियान चलाया जाना होता है तो ये अनिवार्य है कि जहां बारूदी सुरंग का ख़तरा हो या विस्फोटकों का ख़तरा हो, वहाँ पर जवानों को कभी वाहनों पर सवार कर नहीं भेजा जाना चाहिए था."

मई की एक तारीख़ को भी पुराडा थाने के दादानगर में भी ऐसा ही हुआ. माओवादियों ने पहले से धमकी दी और फिर सड़क निर्माण में लगी हुई एक कंपनी के तीन दर्जन वाहनों को फूँक दिया.

ये घटना भी थी और माओवादियों के द्वारा सुरक्षा बलों के लिए बिछाया हुआ जाल भी था. जानकारों का कहना है कि माओवादियों को पता था कि जब वो बड़े पैमाने पर हिंसा करेंगे तो फिर वहां पुलिस और सुरक्षा बल के जवान आयेंगे ही.

इसी मौक़े का फ़ायदा उठाकर उन्होंने रास्ते में ज़ोरदार विस्फोटकों को लगा दिया जिसमें जवानों के वाहन के परखच्चे उड़ गए.

पुलिस के जवान कहते हैं कि हर घटना एक जैसी ही है. मगर किसी घटना से कोई सबक नहीं लिया जाता और जवान बलि का बकरा बनते जा रहे हैं क्योंकि अगर अधिकारी अपने वाहन से जाते हैं तो 'रोड ओपनिंग पार्टी' लगाई जाती है जो विस्फोटकों को निष्क्रिय करती है. मगर जब जवान जाते हैं तो ऐसा नहीं होता.

प्रमोद के एक दोस्त ने कहा, "इसी वजह से कई ऐसे पामया हैं जो नौकरी करने निकले तो थे, मगर कभी लौट कर नहीं आये."

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