लोकसभा चुनाव 2019: शत्रु बनाम रविशंकर: पटना साहिब में कायस्थ वोटरों के बीच कौन किसे करेगा ‘ख़ामोश’ ?

  • 8 मई 2019
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फ़िल्म स्टार शत्रुघ्न सिन्हा और केंद्रीय क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद की उम्मीदवारी के साथ कायस्थ बहुल पटना साहिब लोकसभा क्षेत्र हॉट सीट में बदल चुका है.

सिन्हा और प्रसाद दोनों कायस्थ जाति से हैं और इस लोकसभा क्षेत्र में लगभग पांच लाख कायस्थ मतदाता हैं.

इस संसदीय क्षेत्र के दो हाई-प्रोफाइल प्रत्याशियों के बीच भाजपा के राज्यसभा सांसद आरके सिन्हा की भी बात हो रही है.

आरके सिन्हा उम्मीदवार तो नहीं हैं लेकिन उनको या उनके पुत्र ऋतुराज सिन्हा को पार्टी का टिकट न मिलने से भाजपा संगठन और कायस्थ समाज में ऐसी चर्चा है कि उनके समर्थक रविशंकर प्रसाद की मुश्किलें बढ़ा सकते हैं.

कायस्थ समाज में दोनों प्रत्याशियों को लेकर अलग-अलग राय हैं.

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डॉक्टर दिवाकर तेजस्वी कहते हैं,"हमारा समाज वस्तुनिष्ठता और बौद्धिकता के आधार पर वोट करता है. शत्रुघ्न सिन्हा न तो वाजपेयी सरकार के मंत्री के रूप में कामयाब रहे और न सांसद के रूप में वो जनता के लिए सुलभ रहे."

बैंक्वेट हॉल के कर्मी राजकुमार सिन्हा का मानना है, "केंद्र में इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ही सरकार बनेगी, लेकिन विपक्ष भी मज़बूत रहेगा. मेरी पसंद शत्रुघ्न सिन्हा हैं क्योंकि वे एक स्टार हैं. मेरी श्रद्धा उनके साथ जुड़ी है".

होटल और सीमेंट व्यवसायी शैलेन्द्र प्रकाश सिन्हा अखिल भारतीय कायस्थ महासभा के संस्थापक अध्यक्ष जयप्रकाश लाल के प्रपौत्र हैं.

उन्होंने कहा, " शत्रुघ्न सिन्हा दो बार सांसद रह चुके हैं. उनके काम को लोगों ने देखा है. रविशंकर प्रसाद केंद्र में मंत्री हैं. वो यहाँ के लिए ट्राइ-हॉर्स साबित होंगे".

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वर्ष 1887 में स्थापित अखिल भारतीय कायस्थ महासभा के एक धड़े के राष्ट्रीय अध्यक्ष कांग्रेस के नेता सुबोध कांत सहाय और कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष जदयू के नेता राजीव रंजन प्रसाद हैं.

दिलचस्प यह है कि कांग्रेस के नेता सुबोध कांत सहाय कांग्रेस प्रत्याशी शत्रुघ्न सिन्हा के साथ दिखते रहे हैं तो संगठन के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष और एनडीए में भाजपा के सहयोगी दल जदयू के नेता राजीव रंजन प्रसाद भाजपा प्रत्याशी रविशंकर प्रसाद का खुलकर समर्थन कर रहे हैं.

राजीव रंजन प्रसाद वर्ष 2015 के विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी से चुनाव हारे थे.

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राजीव रंजन प्रसाद कहते हैं, "महासभा चुनाव के दौरान मतदाताओं को दल विशेष के लिए वोट करने के लिए प्रेरित नहीं करता. आज जदयू एनडीए गठबंधन के साथ है इसलिए मैं बतौर एक जदयू कार्यकर्ता भाजपा उम्मीदवार का समर्थन कर रहा हूँ ".

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कायस्थ महासभा का दूसरा गुट रविनंदन सहाय को राष्ट्रीय अध्यक्ष और भाजपा के सांसद आरके सिन्हा को संगठन के अंतर्राष्ट्रीय प्रकोष्ठ के अध्यक्ष होने का दावा कर रहा है. रविनंदन सहाय की पारिवारिक पृष्ठभूमि कांग्रेस की रही है तो वहीं सांसद आरके सिन्हा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पुराने कार्यकर्ता हैं.

लोकसभा चुनाव में संगठन की भूमिका पर रविनंदन सहाय कहते हैं, "चूँकि दोनों मुख्य प्रत्याशी कायस्थ हैं इसलिए व्यक्तिगत सम्बन्धों की वजह से समाज बंटा हो सकता है. महासभा गैर-राजनीतिक संगठन है और किसी दल विशेष के लिए वोट करने के लिए यह कोई मंच नहीं है. समाज के विवेक पर यह निर्भर करता है कि वो किसे वोट करें."

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रविनंदन सहाय गुट लोकसभा चुनाव के उम्मीदवारों के नाम की घोषणा के पहले सांसद आरके सिन्हा को प्रत्याशी बनाये जाने की मांग कर चुका है. एक- दो दिनों के भीतर ही उनकी इस मांग का विरोध सुबोध कांत सहाय के गुट ने किया था.

इस संसदीय क्षेत्र के भाजपा और कांग्रेस प्रत्याशी दोनों ही संगठनों के प्रतिनिधियों से मिल चुके हैं.

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पांच विधानसभा (दीघा, कुम्हरार, पटना साहिब, फतुहा और बख्तियारपुर) क्षेत्र वाले इस संसदीय क्षेत्र में लगभग 20.51 लाख मतदाता हैं.

फिलहाल बतौर भाजपा के सांसद शत्रुघ्न सिन्हा इस क्षेत्र का संसद में लगातार दो बार प्रतिनिधित्व कर चुके हैं. रविशंकर प्रसाद वर्ष 2018 में चौथी बार राज्यसभा के सदस्य चुने गए थे और भाजपा संगठन में एक अपवाद की तरह उभरे थे.

राज्यसभा में इनका कार्यकाल वर्ष 2024 तक है. भाजपा से टिकट मिलने पर केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद और भाजपा से कांग्रेस में आये शत्रुघ्न सिन्हा को विरोध का सामना करना पड़ रहा है.

जटिल राजनीतिक परिस्थितियों में फंसी पटना साहिब लोकसभा सीट के बारे में वरिष्ठ पत्रकार नलिन वर्मा का मानना है कि पटना साहिब संसदीय क्षेत्र में दोनों प्रत्याशियों में तगड़ी लड़ाई तय है.

वे कहते हैं, "शत्रुघ्न सिन्हा स्टार हैं, दो बार लगातार सांसद रह चुके हैं और उनकी अपनी लोकप्रियता है. दूसरी ओर रविशंकर प्रसाद उस पार्टी से चुनाव लड़ रहे हैं जो पटना में मजबूत स्थिति में रही है. दोनों उम्मीदवारों के गठबंधन मजबूत स्थिति में हैं ".

वे आरके सिन्हा को चुनाव में तीसरा कोण मानने से इंकार करते हैं और कहते हैं, "आम तौर पर देखा गया है कि समर्थकों की भावनाओं पर नेता का कोई नियंत्रण नहीं रहता".

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